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इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण भारत की एकता का निर्माणसरदार पटेल
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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण
महाराष्ट्र की जितनी रियासतें थीं, उन लोगों ने तब तक अलग रहने का एक इन्तजाम किया था। जिसकी आधारभूत बात थी एक प्रकार का जवाबदार राजतन्त्र अपनी प्रजा को देना, और काम चलाना। लेकिन इस सम्बंध में जो काम की शुरुआत हो गई थी, उसका असर महाराष्ट्र पर पड़ा और वहाँ जितने नौजवान राजा थे, वे सब मेरे पास आए और कहने लगे कि हम तो बम्बई राज्य में मिलना चाहते हैं। हम इस तरह से अलग नहीं रहना चाहते। मैंने कहा कि आपको मुबारकवाद है। उन्होंने कहा कि हम तो यह करना चाहते हैं लेकिन क्या आप हमको ऐसा करने देंगे? मैंने कहा कि क्यों नहीं? तब उन्होंने कहा कि कुछ और राजा कहते हैं कि क्योंकि उन लोगों ने कांग्रेस के साथ इस प्रकार का समझौता कर लिया है कि उन्हें अलग रहना है, तो इस प्रकार पृथक कायम रहने से उन्हें रक्षण मिलेगा। मैंने कहा कि यह बात तो गलत है। कांग्रेस ने किसी के साथ न ऐसा समझौता किया है, न कोई ऐसा बन्दोवस्त किया है और न किसी को इस प्रकार की गारण्टी दी है।
तब सब राजाओं का एक डेपुटेशन आया और मैंने उनको समझाया कि यदि आप यह समझते हैं कि छोटी-छोटी रियासतें एक प्रकार अपनी प्रजा को जवाबदार राज्यतन्त्र का अधिकार देकर अपने पृथक् भविष्य को कायम रखने की गारण्टी ले लेंगी, तो आप का यह ख्याल गलत है। वह बन नहीं सकता। जवाबदार राज्यतन्त्र कोई हँसी खेल नहीं है। रेस्पांसिबिल गवर्नमेंट (उत्तरदायी सरकार) का मायना यह नहीं है कि हमारे मुल्क में इस प्रकार के छोटे-छोटे टुकड़े बनाकर हम अँग्रेजों के रेस्पांसिबिल गवर्नमेंट की नकल करेंगे। वह तो हमारे मर जाने की बात हो जाएगी। इस तरह से नहीं हो सकता। यह न आपके इंटरेस्ट (हित) में है और न हमारे। आपको मिल जाना ही तो मिलो। नहीं तो भविष्य में यदि कभी आप प्रोटेक्शन (सुरक्षा) के लिए सेण्ट्रल गवर्नमेंट (केन्द्रीय सरकार) के पास या कांग्रेस के पास आना चाहेंगे तो आपको कोई रक्षण नहीं मिलेगा। तब सेण्ट्रल गवर्नमेंट भी आपको प्रजा के सामने इस प्रकार का रक्षण नहीं देगी। क्योंकि अब युग बदल गया है। उससे तो यही अच्छा है कि आप अपने आप ही समझ-बूझ कर किसी राज्य में शामिल हो जाओ।
तब उन लोगों ने मान लिया और कहा कि आप जो कहते हैं, वही ठीक बात है। पीछे गुजरात के सब राजा भी मिल गए। इस प्रकार सब रियासतें मिलने लगीं। उन पर किसी का भी दबाव नहीं था। इसका एक उदाहरण आपको देना चाहता हूँ। मयूरभंज के महाराजा मेरे पास आए और कहने लगे कि मैंने अपनी प्रजा को वचन दिया है कि हम तुम्हें जवाबदार राजतन्त्र देनेवाले हैं। इसके लिए हमारे यहाँ आजकल चुनाव भी चल रहा है। उन्होंने कहा कि उन लोगों को इस प्रकार का वचन देने के वाद अगर मैं उसमें से हट जाऊँ, तो मेरे ऊपर वचन भंग करने का आरोप आएगा। तब मैंने कहा कि मैं किसी पर दबाव नहीं डालूंगा। आप खुशी से अलग रहिए। लेकिन पीछे आपको पछताना पड़ेगा। तब मुझे याद करोगे। वह अलग रहे। आज तक भी वह अलग है। लेकिन आज जब ये रियासतें उसमें मिल गई, तब से वह अपने राज्य में अभी तक नहीं गए और न वहाँ जाना ही चाहते हैं। जब तक उनका राज्य उसमें न मिल जाए, तब तक वह वहाँ नहीं जाएँगे। अनुभव से उनको मालूम हो गया कि उसमें कोई मिठास नहीं है। तो अब वहाँ रेस्पांसिबिल गवर्नमेंट के जो लोग थे, जिन्हें प्रतिनिधि मण्डल कहा जाता है, उन्होंने कहा कि हमें उड़ीसा में मिला दो। लोग भी यही कहते हैं। महाराजा का दिल भी उन्होंने देख लिया, और वे खुद भी चाहते हैं। तो अनुभव से उन लोगों को यह सब मालूम हुआ।
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- वक्तव्य
- कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
- लखनऊ - 18 जनवरी 1948
- बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
- बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
- दिल्ली - 18 फरवरी 1948
- पटियाला - 15 जुलाई 1948
- नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
- गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
- बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
- नागपुर - 3 नवम्बर 1948
- नागपुर - 4 नवम्बर 1948
- दिल्ली - 20 जनवरी 1949
- इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
- जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
- हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
- हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
- मैसूर - 25 फरवरी 1949
- अम्बाला - 5 मार्च 1949
- जयपुर - 30 मार्च 1949
- इन्दौर - 7 मई 1949
- दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
- बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
- कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
- दिल्ली - 29 जनवरी 1950
- हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950








