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इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण भारत की एकता का निर्माणसरदार पटेल
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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण
लेकिन मध्यप्रान्त की सरकार और यहाँ के महाराजाओं ने बहुत सभ्यता और बहुत समझदारी से काम किया। उसके लिए मैं इन लोगों को मुबारकबाद देना चाहता हूँ। (तालियाँ) क्योंकि एक साल पूरा बीत गया, और मेरे पास एक भी शिकायत नहीं आई। न रैयत की ही तरफ से, न राजाओं की तरफ से और न गवर्नमेंट की तरफ से ही। यह बहुत खुशी की बात है। अब यह सब काम तो हुआ। छोटी-मोटी रियासतें सब मिल गई।
उसके बाद हैदराबाद का जो सवाल आया, वह तो आपके सामने ही है। जो अभी बना है, उसे बताने में आपका समय नहीं लूंगा। लेकिन कहने का मतलब यह है कि मेरे काम की जो कदर आप करते हैं, उसका समय अभी नहीं आया। यह तो थोड़े से समय में इतना परिवर्तन हो गया है। राजाओं ने त्याग किया, उन्होंने अपनी सत्ता छोड़ दी। जिसे अपनी कोई कीमती चीज छोड़नी पड़ती है, वही इस तरह के काम की कदर कर सकता है। जिसने कभी कोई त्याग नहीं किया वह उसकी पूरी कदर नहीं कर सकता। मेरे दिल में इन महाराजाओं के काम की पूरी कदर है और मैंने इन लोगों से हिन्दुस्तान सरकार की तरफ से वादा किया है कि आप लोगों की इज्जत और आप लोगों की जगह कायम बनी रहेगी। क्योंकि आपने पूरी सभ्यता से हिन्दुस्तान का साथ दिया है।
लेकिन मैंने जो अभी कहा था कि अभी कदर करने का समय नहीं आया उसका मतलब यह है कि अभी तो यह परिवर्तन मैप (नक्शे) का ही हुआ है। अभी हमें पता लगाना है कि दिल का परिवर्तन कितना हुआ है। जब यह काम चलता जाएगा, तब हमारी रियासतों के लोगों को मालूम पड़ेगा कि यह अच्छा हुआ है और इससे उनका भला हुआ। आज जो यह क्रान्ति हुई है, उसका मिठास जब उनको मिलेगा, तब वे उसकी कदर कर सकेंगे। बस्तर स्टेट की जो रिद्धि-सिद्धि है, वह जब निकलेगी तब लोगों को फायदा मिलेगा प्रान्त को फायदा मिलेगा, मुल्क को फायदा मिले तब लोगों को उस चीज का पता चलेगा। इसी तरह हमारी रियासतों में बहुत ही ऋद्धि-सिद्धि भरी हुई है। उस को हमें बाहर निकालना है और हिन्दुस्तान की नस में उसका खून देकर हिन्दुस्तान को ताकतवान बनाना है। तभी हमारे इस काम की कदर होनेवाली है। मुझे मानपत्र के देने का अवसर आज नहीं है, वह अवसर तो तब आएगा, जब यह सब काम सिद्ध हो जाएगा। अभी तो जैसा यह नक्शे का फेर-फार हुआ है, वही ठीक है।
जिस तरह से आप लोगों ने इस काम में मेरा साथ दिया उससे मुझे इतना फायदा मिला कि और जिस जगह काम में मुसीबत आती थी, वहाँ पर मैं आपका उदाहरण देता था। मैं उनसे कहता था कि भाई, यह करते हो। देखो मध्यप्रान्त के राजा-महाराजा, वहाँ की सरकार, और वहाँ के लोग किस तरह और किस खूबी से मिल कर काम करते हैं। उसी तरह से तुम भी काम करो। अब परदेसी यहाँ नहीं हैं। वे सब चले गए हैं। अब हमारे रास्ते में कोई रुकावट नहीं है। अब हमें आपस में मिलकर हिन्दुस्तान को मजबूत बनाना है। उससे काम में आप झगड़ा क्यों करते है? इस काम में इस झगड़े से क्या फायदा कि एक स्टेट बिहार में मिले या उडीसा में। और आपका काम देखकर और राजा भी मेरे पास आते हैं और कहते हैं कि भाई, हम तो और जगह पर राज्य के समूह में मिल गए थे। लेकिन हमें तो प्रान्त में मिल जाना है, क्योंकि वहाँ हमारी इज्जत भी बराबर रहती है, हमारी शान भी रहती है। वहीं हमको सुख मिलेगा। इसलिए हमको प्रान्त में मिला दो। हमें अलग नहीं रहना है। उसका कारण यही है कि आप लोगों का काम बहुत अच्छा चल रहा है।
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- वक्तव्य
- कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
- लखनऊ - 18 जनवरी 1948
- बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
- बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
- दिल्ली - 18 फरवरी 1948
- पटियाला - 15 जुलाई 1948
- नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
- गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
- बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
- नागपुर - 3 नवम्बर 1948
- नागपुर - 4 नवम्बर 1948
- दिल्ली - 20 जनवरी 1949
- इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
- जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
- हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
- हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
- मैसूर - 25 फरवरी 1949
- अम्बाला - 5 मार्च 1949
- जयपुर - 30 मार्च 1949
- इन्दौर - 7 मई 1949
- दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
- बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
- कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
- दिल्ली - 29 जनवरी 1950
- हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950








