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इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण भारत की एकता का निर्माणसरदार पटेल
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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण
(१४)
भारत में बने दूसरे जहाज* का जल-प्रवेश
दिल्ली,
२० जनवरी, १९४८।
सिन्धिया कम्पनी के डाइरेक्टर गण तथा नारियों और गृहस्थों,
मुझे बड़ी खुशी होती अगर मैं खुद विजगापत्तन के यार्ड पर पहुँच गया होता लेकिन मेरी शारीरिक अवस्था देख कर सिन्धिया कम्पनी ने जो यह प्रबन्ध करने की मेहरबानी की, इसके लिए मैं उनके प्रति आभार प्रदर्शित करना चाहता हूँ। कुछ कुदरत के हाथ की बात है कि जहाज पानी में तभी जा सकता है कि जब उसके योग्य मिनिट या समय आ जाए। तो वहाँ से जब तक हम को सिगनल नहीं मिलता है, तब तक यह बटन दबाने का काम मैं नहीं कर सकता। इसलिए आप लोगों का और मेरा समय व्यर्थ न जाए, इस इच्छा से, मुझे जो कुछ कहना है, वह मैं पहले ही कह देना चाहता हूँ। इस रस्म में हिस्सा लेने का मुझको मौका दिया, इसके लिए मैं सिन्धिया कम्पनी को धन्यवाद देना चाहता हूँ।
मेरा और सिन्धिया कम्पनी का परिचय बहुत दिनों का है, यहाँ मैं उसकी याद दिलाना चाहता हूँ। सिन्धिया कम्पनी ने जो काम किया है, वह काम बहुत कम लोगों को मालूम है। यहाँ जब पिछली परदेसी हुकूमत थी, उसके साथ
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(*इस जहाज का जल-प्रवेश सरदार पटेल ने दिल्ली बैठे-बैठे ही किया था। बटन दबाते ही जहाज पानी में उतर गया था।)
जिस प्रकार हमारी आजादी की लड़ाई चलती रही, उसी प्रकार बल्कि उसके साथ-साथ, सिन्धिया कम्पनी की अपने क्षेत्र में लड़ाई चलती रही। जैसी कुर्बानी हम लोगों को यहाँ करनी पड़ी, उसी प्रकार की कुछ दूसरे ढंग से, इन लोगों को भी करनी पड़ी। उनका इतिहास, जो लोग उसमें हित रखते हैं उन्हें मालूम है। और जब हम इस शिपिंग कम्पनी का इतिहास याद करते हैं तब ऊपर से इन्हें दबाने की कितनी कोशिश की गई, वह सारा इतिहास भी हमारे सामने खड़ा हो जाता है। और ऐसे मौके पर हमें सबसे पहले डयूटी कुरीन का स्मरण आता है, जो एक स्वदेशाभिमानी गृहस्थ था और जिसका नाम चिदम्बरम् पिल्लाइ था। उसे किन-किन तरीकों से दबाया गया, उसे कितनी-कितनी कठिनाइयाँ और मुसीबतें सहन करनी पड़ी, वह सब हमारे सामने आ जाता है।
सिन्धिया कम्पनी ने यह सब लड़ाइयाँ अच्छी तरह से और वीरता से लड़ी और आखीर में उनमें सफलता पाई, जैसे हमने भी सफलता पाई। उनका और हमारा काम एक ही साथ पूरा हुआ है। दूसरी तरह से उनका भी काम स्वाधीनता-प्राप्ति से शुरू होता है, और हमारा भी शुरू होता है। हमारी आजादी एक साल की है। उनका जो काम सफल हुआ है, वह भी एक साल से शुरू हुआ है, जब हमारे प्रधानमंत्री ने उनके बनाए पहले जहाज का जल-प्रवेश करवाया था। जैसी उनकी समस्याएँ हैं जैसी उनकी जरूरतें हैं और जैसी उनकी मुसीबतें हैं, ठीक वैसी ही हमारी भी हैं। सिन्धिया कम्पनी अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रही है, हाथ-पैर फेंक रही है और इधर-उधर से मदद की माँग कर रही है। हम भी यही कोशिश कर रहे हैं और चाह रहे हैं कि जिस किसी तरह से हम अपने पैरों पर खड़े हो जाएँ। हमें आशा है कि चन्द दिनों में हम इन सब मुसीबतों का मुकाबला कर लेंगे लेकिन हमारे खुद खड़े रहने की कोशिश में हमें सिन्धिया कम्पनी की फतहमन्दी की जरूरत है। क्योंकि उनके हित में हमारा हित भी समाया हुआ है। साथ ही हमारे हित में उनका हित है।
सिन्धिया कम्पनी के संचालकों ने भारत सरकार के पास एक आवेदन-पत्र भेजा है और वे बहुत जल्दी कुछ-न-कुछ जवाब चाहते हैं। मेरा इस प्रकार यहाँ उसका जवाब देना कहाँ तक सही होगा, वह मैं नहीं जानता हूँ। क्योंकि हमारे उद्योग मन्त्री भी यहाँ ही बैठे हैं, और उस कोने पर अन्य नाना मन्त्री भी यहां बैठे हैं उनकी सहानुभूति और उसकी सम्मति न हो, तो गवर्नमेंट की तरफ से किसी को कोई वायदा देना बड़ी मुसीबत हो जाती है और दें भी, तो भी सफल वही होता है, जिसमें सबकी सहमति हो। जब हमारे प्रधान मन्त्री ने पिछले साल आपको भरोसा दिया था, तो मेरी भी हिम्मत चलती है कि जो कुछ इशारा आपने किया है, उसके सम्बन्ध में यह कहूँ कि उस पर हम लोग बहुत सहानुभूति से और जितना हो सके उतना जल्दी, उसका फैसला करेंगे। क्योंकि हम जानते हैं कि जो वागबटा का काम है, शिपिंग इण्डस्ट्रीज का काम हुँ, वह सबसे बड़ा जरूरी काम है और इसीलिए गवर्नमेंट ने पिछले अप्रैल में एलान किया है, कि यह एक ऐसी इण्डस्ट्री है, जिसे गवर्नमेंट अपने हाथ में लेना चाहती है। और अगर सरकार ने अपने हाथ में ले लिया तो भी जो काम सिन्धिया कम्पनी ने किया है, जो योजना सिन्धिया कम्पनी ने बनाई है, उसको वह अच्छी तरह से आगे बढ़ाना चाहती है। उसे आगे बढ़ाने में सिन्धिया कम्पनी का भी साथ लेना है। और हम कुछ भी काम करें, शिपिंग इण्डस्ड्री में गवर्नमेंट और सिन्धिया कम्पनी की एक दूसरे की सहायता और परस्पर सहयोग के बिना यह उद्योग आगे चलनेवाला नहीं है। उनका जो अनुभव है, उसका हम पूरा फायदा उठाना चाहते हैं। हमारा और उनका सहयोग प्राप्त कर मुल्क को फायदा देना यही हमारी इच्छा है। आप भी यही चाहते हैं और हम भी यही चाहते हैं।
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- वक्तव्य
- कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
- लखनऊ - 18 जनवरी 1948
- बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
- बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
- दिल्ली - 18 फरवरी 1948
- पटियाला - 15 जुलाई 1948
- नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
- गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
- बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
- नागपुर - 3 नवम्बर 1948
- नागपुर - 4 नवम्बर 1948
- दिल्ली - 20 जनवरी 1949
- इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
- जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
- हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
- हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
- मैसूर - 25 फरवरी 1949
- अम्बाला - 5 मार्च 1949
- जयपुर - 30 मार्च 1949
- इन्दौर - 7 मई 1949
- दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
- बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
- कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
- दिल्ली - 29 जनवरी 1950
- हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950








