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भारत की एकता का निर्माण

सरदार पटेल

प्रकाशक : प्रकाशन विभाग प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :350
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 62
आईएसबीएन :

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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण


अब जो लड़ाइयाँ आपने लड़ी, बड़ी सफलता और बड़ी कुशलता से लड़ी। इसलिए मैं आपको धन्यवाद देना चाहता हूं। उसका सबूत तो पिछले साल उसी समय मिल गया था, जब प्रधान मन्त्री ने अपना पहला जहाज पानी में उतारा था। बहुत दिन नहीं हुए, जब विदेशी वेस्टिड इन्टरैस्टों (विदेशी हितों) ने, हमारे मुल्क में, बहुत समय से पैर जमा कर बैठी हुई विदेशी सरकार की मदद से, हमारे इस उद्योग को रोकने की ओर इसे रौंदने की काफी कोशिश की थी। बालचन्द भाई ने मुझे मेरा वह भाषण याद दिलाया, जो आज से दस साल पहले सिन्धिया हाउस की ओपनिंग सेरिमनी (उद्घाटन समारोह) करते हुए, मैंने दिया था। आज आप की यह उन्नति देखकर मुझे बड़ी खुशी होती है। तब मैंने जो कुछ कहा था, वह सम्पूर्ण सही निकला है। आज हिन्दुस्तान की सरकार पर वह धब्बा नहीं है, जिसकी उसने याद दिलाई है। तो सिन्धिया कम्पनी ने अपने सीधे रास्ते पर खड़े रह कर, सीधे मार्ग पर चलने की कोशिश की, उसमें जो रुकावटें थीं वे सब निकल गईं। मुझे उम्मीद है कि अब उनके रास्ते में कोई ऐसी रुकावट नहीं आएगी, जिससे आगे की प्रगति अटकानी पड़े।

इस मौके पर मुझे कुछ ज्यादा कहने को नहीं है। लेकिन आखिरी धन्यवाद से पहले मैं उन मजदूरों, कारीगरों और स्टाफ के लोगों से, जिन लोगों की तरफ से मुझको मानपत्र दिया गया है, दो शब्द कहना चाहता हूँ। मैंने इसका भी डर नहीं रखा है कि मुझे कोई गैर समझेगा, और इसकी मुझे परवाह भी नहीं है। लेकिन बड़ी मुहब्बत से हर मौके पर मैंने मजदूरों को सावधान किया है और साफ-साफ बात की है? क्योंकि जो साफ बात कहता है, वही अपना सच्चा हितकर है, यह हमें समझना चाहिए। तो मुझे मजदूरों की तरफ से जो मानपत्र दिया गया है, उसके लिए मैं उनको धन्यवाद देना चाहता हूँ। लेकिन मैं बड़े प्रेम से एक सलाह भी उन्हें देना चाहता हूँ कि यदि कूएँ में पानी नहीं होगा, तो हमारे गुजरात में एक कहावत है कि, जो हमारा 'ध्वारा' यानी चौबच्चा है (जिसमें से जानवर पानी पीते हैं) में भी पानी नहीं आएगा। तो हमारा प्रथम कर्तव्य यह है कि जिस इण्डस्ट्री के साथ हमारा पाला पड़ा है, जिससे हमें रोटी पैदा करनी है, उस इण्डस्ट्री को किसी भी तरह से चोट न लगे, उसका किसी तरह से बिगाड़ न हो। इतना सँभाल के जितना माँग सकते हैं, उतना माँगना चाहिए। वह हमारा हक है। और उस हक के लेने-देने में अगर ज्यादा-से-ज्यादा मदद आज कोई गवर्नमेंट कर सकती है, तो कांग्रेस गवर्नमेंट ही कर सकती है। क्योंकि हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई में मजदूरों ने जो साथ दिया है, उसको हम कभी भूल नहीं सकते हैं। और आखिर आजादी की लड़ाई लड़ कर हिन्दुस्तान की आजादी लेने का हमारा उद्देश्य क्या था? जब हमारे मुल्क में गरीब-सें-गरीब लोगों को, जो मजदूरी करते हैं, मेहनत करते हैं, और पसीना बहा कर अपनी रोटी पैदा करते हैं, आज्ञादी का स्वाद न मिले, तब तक आजादी का कोई मतलब नहीं, कोई फल नहीं। हमेशा हमारी यही कोशिश रहेगी कि आपको ज्यादा-से-ज्यादा मिले। लेकिन ऐसी गलती कभी न करना, जैसा बार-बार और जगह-जगह पर किया जाता है। आपके यहाँ भी दो-तीन महीने की एक स्ट्राइक हुई थी, ऐसा मुझे स्मरण है। उसमें लाखों रुपये का नुकसान हुआ था। चाहे एम्प्लायर्स (मालिक) की गलती हो और चाहे हमारी गलती हो, हमें ऐसी जिद कभी नहीं करनी चाहिए, जिससे देश का नुकसान हो। जैसा महात्मा गान्धी जी ने पहले से अहमदाबाद के मजदूरों से मंजूर करवाया था, उसी तरह अपने झगड़ों का फैसला हमें पंचायत से करना है। वही सबसे अच्छा तरीका है और आज अपनी सरकार से बढ़कर कौन पंचायत आप लोगों के हित में सबसे अच्छी होगी? यह तो आप की अपनी सरकार है। आज मजदूरों को सलाह देनेवाले बहुत लोग ऐसे हैं, जो अपनी नेतागिरी के लिए ज्यादा-से-ज्यादा माँग करवाते है और फिर फसाद करवाते हैं। आपके सच्चे सेवक की हैसियत से मैं कहता हूँ कि आपने मुझे जो मानपत्र दिया है, वह अगर सही हो, वह अगर दिल से हो, तो मेरी बात पर अच्छी तरह सोचिए और अपनी सरकार की, अपने लोगों की और अपने मुल्क की सहानुभूति कभी न गुमाइए। अगर आप जनता के हित को भी सामने रखकर अपना काम करेंगे तो आपका हमारा साथ हमेशा रहेगा।

अब मुझे आपका ज्यादा समय नहीं लेना है। आज जो अपने मुल्क में यह दूसरा जहाज बना है, उसकी जल-प्रवेश-विधि करने का, इस रस्म में हिस्सा लेने का जों मौका आपने मुझे दिया, उसके लिए मैं आपको, सिन्धिया कम्पनी को और वालचन्द भाई को मुबारकवाद देना चाहता हूँ, धन्यवाद देना चाहता हूँ। मैं उम्मीद और प्रार्थना करता हूँ कि ये जहाज और इनके साथ जिनका कभी भी सम्बन्ध होगा, वे सब सुखी हों और आबाद हों। ऐसे नए-नए जहाज विजगापत्तन की गोदी में बहुत से बनें और जल्दी-जल्दी बनें, ऐसी उम्मीद भी हम रखते हैं। ये सब जहाज दुनिया के और देशों की बन्दरगाहों में पहुंचें और झंडे की इज्जत बढ़ाएँ, क्योंकि वह हमारे देश का झंडा है। हर जगह पर वे अपना नाम और अपनी कीर्ति कायम रखें। इतना कह कर मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ और आप सबसे भी चाहता हूँ कि आप सब भी यहीं प्रार्थना करें कि हमारा यह नया जहाज हिन्दुस्तान के बाहर सब मुल्कों के बन्दरगाहों में हिन्दुस्तान की इज्जत बढ़ाए और अपनी भी इज्जत बढ़ाए।

जयाहिन्द!

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    अनुक्रम

  1. वक्तव्य
  2. कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
  3. लखनऊ - 18 जनवरी 1948
  4. बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
  5. बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
  6. दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
  7. दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
  8. दिल्ली - 18 फरवरी 1948
  9. पटियाला - 15 जुलाई 1948
  10. नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
  11. गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
  12. बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
  13. नागपुर - 3 नवम्बर 1948
  14. नागपुर - 4 नवम्बर 1948
  15. दिल्ली - 20 जनवरी 1949
  16. इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
  17. जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
  18. हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
  19. हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
  20. मैसूर - 25 फरवरी 1949
  21. अम्बाला - 5 मार्च 1949
  22. जयपुर - 30 मार्च 1949
  23. इन्दौर - 7 मई 1949
  24. दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
  25. बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
  26. कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
  27. दिल्ली - 29 जनवरी 1950
  28. हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950

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