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इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण

भारत की एकता का निर्माण

सरदार पटेल

प्रकाशक : प्रकाशन विभाग प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :350
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 62
आईएसबीएन :

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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण


(15)

इलाहाबाद युनिवर्सिटी का कन्वोकेशन भाषण  

२५ नवम्बर, १९४८

गवर्नर साहिबा, वाइस चांसलर साहब, नवस्तातको, विद्यार्थियो और बहनों,

आपने इस कन्वोकेशन में इकट्ठे हुए मान्य जनों के सामने प्रवचन देने के लिए मुझे बुला कर, और मुझको 'डाक्टर आफ लाज' की डिग्री देकर मेरा जो सम्मान किया है, उसके लिए मैं आपका आभारी हूँ। जब मैं उन मान्य व्यक्तियों और योग्य पुरुषों का ध्यान करता हूँ, जिन्होंने पूर्व काल में आपके सामने प्रवचन दिए हैं और जिन्हें आपकी तरफ से आनरेरी डिग्रियाँ मिली हैं, तो मैं अपने आपको एक अपरिचित समाज में पाता हूँ। स्कूल कालेज की पढ़ाई में मैंने कोई खास नाम पाया हो, मैं कोई ऐसा दावा नहीं करता। मैंने जो कुछ पाठ पढ़े हैं, वे जीवन के महान विश्वविद्यालय में पड़े हैं। मैं विद्वान होने का कोई दावा नहीं करता। कला या साइन्स के विशाल गगन में भी मैंने कोई उड़ान नहीं भरी है। मेरा काम तो कच्ची झोपड़ियों में और गरीब किसानों के खेतों, ऊसर जमीनों या शहरों के गन्दे मकानों और मोरियों में रहा है। सार्वजनिक जीवन में भी मैं कोई नीतिज्ञ या कोई पालिटीशन नहीं, बल्कि मार्क एन्टनी की तरह एक सीधा-सादा अक्खड़ आदमी रहा हूँ। आज ये सम्मानित उपाधि आपने मुझे दी है। वह मेरे दिल और दिमाग के किन्हीं विशेष गुणों की प्रशंसा में नहीं, बल्कि साधारण आदमियों के उन गरीब वर्ग के मर्द-औरतों के सम्मान में दी है, जिनकी सेवा करने का गौरव मुझे मिला है।

जब पिछले साल हमारे राष्ट्र के नेता हमारे प्रधानमंत्री ने आपके कन्वोकेशन में प्रवचन दिया था उस समय बड़ी अदल-बदल और उथल-पुथल हो रही थी। पंजाब में जो कांड हुए थे, उनकी बाढ़ में तो हम लगभग बह गए थे। तब हमारी बुद्धि संदेह और निराशा से मलिन हो गई थी और हमारे दिलों पर क्रोध और बुरी भावनाओं का राज्य था। प्रधान मन्त्री ने उस समय कुछ खास उद्देश्यों का जिक्र किया था और हमारे सामने चाल-चलन से नियम रखे थे। उस समय वह फैली हुई शक्तियों पर विजय पाने का मार्ग बताते थे। आज सौभाग्य से हम उस काली घड़ी में से निकल आए हैं, जो कि आजादी पाने के इतनी जल्दी बाद ही निर्मम विधि ने हम पर डाली थी। हमारे इतिहास में हमको यह सबसे भारी धक्का लगा था। मगर अपनी सच्ची अन्तर्भावना और सच्ची श्रद्धा के बल से हमने उसे सहार लिया। कभी-कभी ऐसा मालूम होता था कि हमारी आज का आधार ही भारी खतरे में पड़ गया है। फिर भी उसे हमने जिस किसी तरह सँभाल लिया था।

आज मैं बड़ी गम्भीरता से आपसे पूछता हूं कि क्या हमने उस आजादी का असल मतलब समझा है, जो वर्षों की कोशिशों के बाद और इतने दुख झेल कर हमने पाई? क्या हमने अपने आपको इस काबिल बनाया है कि आजादी के साथ जो ज़िम्मेदारियाँ हम पर आ गई हैं उन्हें हम निभा सकें? मैं चाहता हूँ कि आप गम्भीरता से इस बात को सोचें कि क्या हमारे चलन में आजादी के प्रेमियों की सच्ची भावना पाई जाती है? क्या हम अपने कर्तव्य और अनुशासन का ध्यान रखते हैं? उसी तरह काम कर रहे हैं, जैसा हम उस समय करते थे, जब हम आजादी की लड़ाइयाँ लड़ रहे थे? आप में से हर एक को यह देखना चाहिए कि आज़ादी ने हमारे लिए क्या-क्या समस्याएँ खड़ी कर दी हैं और आप उन्हें हल करने में क्या मदद कर रहे हैं। अगर हर एक देशवासी अपना फर्ज अदा करने लगे तो राष्ट्र उन समस्याओं को पक्के और असरदार ढंग से सुलझा सकेगा। अनुभव से सीखना बड़ा महँगा पड़ता है। पर अनुभव से भी अगर हमने कुछ न सीखा, तो निश्चय ही हम बरबादी और तबाही की ओर चले जाएँगे।

मैं आपको उस लड़ाई की कुछ बातें बताने लगा हूं, जिसके अन्त में हमने वह अनमोल निधि पाई, जो आज हमारे पास है। मुझे आशा है, आप उन्हें धीरज से सुनेंगे। सत्य और अहिंसा उस लड़ाई के प्रधान गुण थे। आत्मबलिदान, दुख और त्याग उन सिपाहियों के बैज थे, जिन्होंने यह लड़ाई लड़ी। सहिष्णुता और एकता हमारे संकेत शब्द थे और सेवाभाव हमारा पथ-प्रदर्शन करता था, स्वार्थ भावना नहीं। हमने घोर युद्ध किया, परन्तु स्वच्छता के साथ। संकुचित स्थानीय विचारों ने हमें कभी नहीं डिगाया, बल्कि हमने अपने देश के बड़े हितों को सदा अपने सामने रक्खा। शक्ति और अधिकार के पदों का हमारे लिए कोई आकर्षण नहीं था। हम छोटे-से-छोटे लोगों के साथ रहे। उन्हीं के साथ हमने सभी तरह के दुख भी उठाए और देश के बड़े-से-बड़े लोगों के साथ टक्कर ली। मैं यह सब कुछ डींग मारने के लिए नहीं कह रहा हूँ। बल्कि एक गर्व की भावना से यह सब आप को बता रहा हूं। क्योंकि जो कुछ मैंने कहा है वह, सब बीते समय के इतिहास के पन्नों पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है।

परन्तु आज देश का जो नक्शा हमारे सामने है, वह उससे कितना भिन्न है। ऐसा लगता है, मानो एक बरस में ही हममें से वह भावना और वह गुण निकल गए हैं, जो उस लड़ाई में थे। जो भावना हमने उस महान गुरू की प्रेरणा से और उसकी रहनुमाई में पाई थी, खेद है कि अब हमारा वह नेता हमारे साथ नहीं। उसका चला जाना, और उससे जो भारी चोट हमें लगी, ये दोनों स्वयं इस बात का फलस्वरूप थी कि हम उस मार्ग से हट गए थे, जो उसने हमारे लिए बनाया था और जिस पर एक वक्त हम ऐसी सफलता के साथ चले थे। अब तो ऐसा मालूम होता है कि हमें जालसाजियाँ करने में और सत्ता पाने के लिए दौड़धूप करने में आनन्द आता है। आज हमारे जो मुकाबले होते हैं, उनमे खेल के स्वस्थ नियमों का ध्यान न कर हम उन्हें गन्दा बना देते हैं। हम केवल चाल के रूप में सत्य को सराहते हैं, जब कि हमारे मिजाजों और दिलों पर हिंसा का राज है। हमारी बुद्धि और हमारे काम सिकुड़े मार्ग में ही चलते हैं। हमारे बड़े-बड़े उद्देश्य और देश के महान हित हमारी आंखों से ओझल होते जा रहे हैं। हमारे दिलों में गड़बड़ी और बेतरतीबी फैली हुई है। सिपाहियों का वह समस्त अनुशासन और जनता के प्रति अपने धर्म की भावना हम लोगों में कम होती जा रही है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि इस चित्र में मैं कोई बात बड़ा कर नहीं दिखा रहा हूँ। हाँ, जो परिवर्तन हुआ है, उस पर मैं जानबूझ कर जोर दे रहा हूँ। क्योंकि मैं समझता हूँ कि आज जो हालत है और जो समस्याएँ मुल्क के सामने हैं, उन्हें हम तभी सुलझा सकेंगे, जब कि हम उस भावना और उन गुणों पर और भी अधिक जोर दें, जिनसे बीते जमाने में हमें इतना लाभ हुआ था।

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    अनुक्रम

  1. वक्तव्य
  2. कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
  3. लखनऊ - 18 जनवरी 1948
  4. बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
  5. बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
  6. दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
  7. दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
  8. दिल्ली - 18 फरवरी 1948
  9. पटियाला - 15 जुलाई 1948
  10. नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
  11. गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
  12. बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
  13. नागपुर - 3 नवम्बर 1948
  14. नागपुर - 4 नवम्बर 1948
  15. दिल्ली - 20 जनवरी 1949
  16. इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
  17. जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
  18. हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
  19. हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
  20. मैसूर - 25 फरवरी 1949
  21. अम्बाला - 5 मार्च 1949
  22. जयपुर - 30 मार्च 1949
  23. इन्दौर - 7 मई 1949
  24. दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
  25. बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
  26. कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
  27. दिल्ली - 29 जनवरी 1950
  28. हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950

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