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इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण

भारत की एकता का निर्माण

सरदार पटेल

प्रकाशक : प्रकाशन विभाग प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :350
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 62
आईएसबीएन :

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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण


आखिर इस बात को तो हमें ध्यान में रखना ही चाहिए कि हमें आजादी ऐसे समय में मिली है, जब कि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में हमारे चारों ओर समस्याओं का एक तूफानी समुद्र-सा फैला हुआ है। मनोवैज्ञानिक और भौतिक दोनों रूपों से युद्ध से शान्ति की ओर परिवर्तन बहुत देर से हुआ और इसका फल यह हुआ कि हम अब भी घबराहट और अनिश्चितता की परिस्थितियों में फँसे हुए हैं। हमारी सारी आर्थिक व्यवस्था बिगड़ गई है और हमारी नागरिकता की भावना एक ओर तो युद्ध की तबाहियों और दूसरी ओर युद्ध-जनित बड़े मुनाफों के कारण पतित हो गई है। युद्ध के कारण हर जगह बन्धन ढीले पड़ गए। इस कारण जरूरत से अधिक उत्साह से आजादी की एक विचित्र सी कल्पना व्याप्त हो गई है। वास्तव में यह आज़ादी नहीं, बल्कि उच्छृंखलता है। हमारी उदार अन्तर्भावनाओं में से जिम्मेदारी का वह गुण निकल गया है, जिसके बिना हमारे विचारों और कामों में न कोई व्यवस्था रह सकती है न कोई ढंग ही। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में भी आजकल जिस तरह एकमात्र शक्ति-नीति और आपसी संदेह का प्रभुत्व है, वह लड़ाई से पहले नहीं था।

हमारे अपने घर में भी जरा छोटे क्षेत्र में, वही दुःखदायक बातें नज़र आती हैं। उनके अतिरिक्त हमारी अपनी निजी समस्याएँ भी हैं। राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से हम इस समय एक गढ़े के किनारे खड़े हैं। एक भी गलत कदम उठाया कि तबाही अवश्यम्भावी है। हमारे रहने का खर्च असाधारण रूप से बढ़ गया है। हम जो पैदा करते हैं, वह उतना नहीं होता, जितने की जरूरत है। जरूरी चीजों को बाहर से मँगाना हमको बहुत महँगा पड़ रह है। इतना खर्च सहने की हममें शक्ति नहीं है। जो कुछ हमारे पास है, वह भी आसानी से और न्यायोचित हिस्से से सबको नहीं मिलता। हमारे कारबार पर और हमारे माली ढाँचे पर एक पक्षाघात सा गिर गया है। हमारे हाथ में सत्ता आने के साथ ही देश का बँटवारा हो जाने के कारण भी देश में अनेक कठिनाइयाँ और पेचीदा समस्याएँ खड़ी हो गई हैं। शासन को चलाने के प्रधान यन्त्र में भी योग्य आदमियों की कमी हो गई है। हमें शासन सम्बन्धी कामों और नीतियों को देश की नई सीमाओं के अनुकूल बनाना है। हमें अपने आर्थिक, भौगोलिक आदर्शवादी और सांस्कृतिक प्रश्नों को एक राजनीतिक तथ्य के आधीन करना पड़ रहा है। यह काम स्वयं ही अत्यन्त विशाल और दुष्कर है। इधर हमारी रक्षा की सर्विसेज भी अभी शैशवावस्था में हैं। उन्हें हमें मजबूत बनाना है और आवश्यक शस्त्र देने हैं। हमें एक ओर तो जमींदारों और जमीन को जोतने वाले किसानों के और दूसरी ओर मिल मालिकों और कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के बीच के सम्बन्धों को ठीक करना है। इस सब के साथ-ही-साथ हमें अपनी सीमाओं पर भी उत्तर में, दक्षिण में, पूर्व में और पश्चिम में सभी ओर हमें सावधान रहना है। एशिया के बाकी देशों में भी घरेलू झगड़े हो रहे हैं। कितने ही देशों में आपस में युद्ध छिड़े हुए हैं। मुल्क की आज़ादी के दुश्मन अक्सर अन्दर ही होते हैं, वे बाहर से कम आते हैं। हमको बड़ी सावधानी से अपने राष्ट्र की एकता, पूर्णता, और सुरक्षा का एक ओर तो अन्दर की फूट डालने वाली शक्तियों से बचाव करना है, दूसरी ओर बाहर वालों के आक्रमण के मनसूबों से अपने देश को बचाना हैं। राष्ट्रीय पुनर्निर्माण में दूसरे काम भी अभी हमें करने हैं। इनमें प्रधान हैं, अपने जीवन स्तर को ऊँचा करना और अपने राष्ट्रीय चरित्र को ऊँचा बनाना। पहले काम के लिए हमें अपनी प्राकृतिक शक्तियों से काम लेना है और साइन्स के साधनों से पूरा फायदा उठाना है। दूसरे काम के लिए हमें अपनी समस्त राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली को बिलकुल बदल देना होगा।

भाइयो और बहनो, मुझे आशा है कि मैने आपको इस बात का काफी परिचय दे दिया हूँ कि एक राष्ट्र की हैसियत से और विश्व के नागरिक होने के नाते हमारे सामने जो समस्याएँ है, वे कितनी कठिन और नाजुक हैं। अब हमें यह सोचना चाहिए कि क्या हम इन समस्याओं की विशालता और जल्दी-से-जल्दी उनको सुलझाने की आवश्यकता को पूरी तरह समभते द्रुए अपने कर्तव्य-पथ की ओर चल रहे हैं? मेरा विचार था कि ऐसी घड़ी में हम अपना पूरा ध्यान अपनी एकता और अपने सामूहिक बल पर देंगे। मगर इसकी जगह हम अपनी शक्तियों को व्यर्थ के अन्तर्प्रान्तीय डाह में खो रहे हैं और छोटी-छोटी भाषाओं के आधार पर पृथक-पृथक इकाइयाँ बनाने की बात सोच रहे हैं। बार यह सब कुछ उस समय किया जा रहा है जब कि हमें राष्ट्र की माँग और उसकी जरूरतों की ओर अपना पूरा ध्यान देना चाहिए। इस समय जब कि हम सबको मिल कर एक हो जाना चाहिए था, हम अलग-अलग होने की कोशिश कर रहे हैं और यह भी किसी महत्वपूर्ण विचारों के भेद के कारण नहीं, बल्कि स्वयं नेता बनने की इच्छा के आधार पर।

आज तो इस बात की आवश्यकता है कि हम अपनी सारी शक्ति लगाकर ज्यादा-से-ज्यादा औद्योगिक कारखाने खड़े करें। परन्तु उसकी जगह हम धमकियाँ देकर और हड़तालें संगठित कर अपनी पैदावार में भारी कमी कर रहे है। इस तरह हम अपनी औद्योगिक उन्नति को रोक रहे हैं और देश को नुकसान पहुँचा रहे हैं। हम अपने गड़े धन को दवाऐ बैठे हैं जब कि हमारा यह परम कर्तव्य है कि हम उसे राष्ट्र के हित के लिए पैदावार के काम में लगाएँ और वह किसी से पीछे न रह जाएँ। आज हमारा मजदूर वर्ग भी धन पैदा करने से पहले ही उसके बँटवारे पर झगड़ा करने लगा है। इस समय, जब कि हमें ज्यादा-से-ज्यादा बचत करनी चाहिए और अपने साधनों से बड़ी किफायत से काम लेना चाहिए, हम अनावश्यक खर्च कर रहे हैं और अपने आराम और आसाइश की गैर जरूरी चीजों पर, जिनके बिना हमारा काम मजे में चल सकता है, रुपया गवाँ रहे हैं। साथ ही हम लोगों में नैतिक मूल्यों की अनुभूति स्पष्ट रूप से कम हो गई है। लड़ाई के समय की जो अनैतिकता फैल गई थी, उसके कारण घूसखोरी और बेईमानी अभी तक जोरों पर है। हम नागरिकता के प्रारम्भिक कर्तव्य और जिम्मेवारियाँ भी नहीं जानते। कानून की साख बनाए रखने की बजाय हम अपने रोज के जीवन में उसे तोड़ते हैं। अनुशासन, ऊँचा चरित्र और शारीरिक तन्दुरुस्ती ये तीनों एक स्वस्थ राष्ट्र जीवित चिन्ह हैं। आप अपने अन्दर देखिए और बताइए आप में ये तीनों चीजें कहाँ तक हैं? जीवन के किसी भाग को लीजिए, विद्यार्थी, अध्यापक मजदूर, नौकरी देनेवाले, व्यापारी, सरकारी नौकर, राजनीतिज्ञ चाहे आप कोई भी हों, आप अपने से एक प्रश्न कीजिए कि क्या आप एक स्वस्थ राष्ट्र के नागरिकों की तरह काम कर रहे हैं? मुझे विश्वास है कि इसका जवाब पक्की तरह हाँ में बहुत कम जगह मिलेगा। हम सबको शरम के साथ यह मानना पड़ेगा कि हमने जरूरत के समय अपने राष्ट्र का साथ नहीं दिया।

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    अनुक्रम

  1. वक्तव्य
  2. कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
  3. लखनऊ - 18 जनवरी 1948
  4. बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
  5. बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
  6. दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
  7. दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
  8. दिल्ली - 18 फरवरी 1948
  9. पटियाला - 15 जुलाई 1948
  10. नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
  11. गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
  12. बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
  13. नागपुर - 3 नवम्बर 1948
  14. नागपुर - 4 नवम्बर 1948
  15. दिल्ली - 20 जनवरी 1949
  16. इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
  17. जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
  18. हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
  19. हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
  20. मैसूर - 25 फरवरी 1949
  21. अम्बाला - 5 मार्च 1949
  22. जयपुर - 30 मार्च 1949
  23. इन्दौर - 7 मई 1949
  24. दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
  25. बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
  26. कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
  27. दिल्ली - 29 जनवरी 1950
  28. हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950

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