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मुद्राराक्षस संकलित कहानियां

मुद्राराक्षस

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :203
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7243
आईएसबीएन :978-81-237-5335

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कथाकार द्वारा चुनी गई सोलह कहानियों का संकलन...


'हिंदू जागरण अभियान' का छोटा-सा जुलूस लेकर गली से गुजरते हुए महाराजाधिराज का पोता संजय कुमार सिंह उर्फ मक्कू अतीक के बंदर को देखकर एकदम भड़क उठा। उसने सीना फुलाकर पान मसाले की पीक थूकते हुए जोरदार आवाज में ललकारा, “अबे ओ अतीक के बच्चे, बाहर निकल!"

अतीक बाहर ही खड़ा था। दबी आवाज में उसने पूछा, "क्या बात हो गई राजा भैया? मैंने तो आपकी झंडी लगा रखी है।"

"अबे, भगवा लगाकर कौन-सा एहसान किया तूने, ऐं? भगवा नहीं लगाएगा तब क्या पाकिस्तानी झंडा लगाएगा? ये बंदर तेरा है?" संजय कुमार सिंह उर्फ मक्कू ने पूछा।

"मेरा है राजा भैया! क्यों?"

"क्या नाम रखा है इसका?"

"इसका? इस हरामी का नाम क्या होता! पर मैंने इसका नाम जहीनुद्दौला रखा है।" कहकर अतीक हंसा, “साला बंदर होकर खासा जहीन है।"

तब तक उस 'राजा भैया' संबोधित किए गए तगड़े लड़के ने उसका गला पकड़ लिया। तीन-चार बहुत भद्दी गालियां देकर अपने साथियों से बोला, "हरामी श्री राम भक्त हनुमान को बंदर बता रहा है। अबे, ये बंदर है!"

देखते ही देखते वह थोड़ा-सा पिटा, ज्यादा नहीं। उन लोगों की रुचि पीटने
से ज्यादा अपनी बात का वजन सिद्ध करने में थी। सहसा राजा भैया को याद आया, "और हां, ये जहीनुद्दौला क्या नाम हुआ? ये बंदर मुसलमान है?"

गली में जमा हुई भीड़ भी इस तर्क पर चकित हुई। खुद अतीक भी बहुत जल्दी समझ गया कि बंदर मुसलमान नहीं है।

इस हादसे के बाद उस बंदर का नाम अतीक ने बदल दिया। अब उसने उसका सीधा-सा नाम 'नन्हे' रख दिया। परंतु इस 'नन्हे' नाम के साथ एक मुसीबत भी खड़ी हो गई। एक दिन वहुत सुबह पूरे शहर में उथल-पुथल मच गई। हर कोई आसपास के मंदिरों की मूर्तियों को दूध पिलाने भागा जा रहा था-औरतें, मर्द, बच्चे, बूढ़े, सभी। राजा के बगीचे की कॉलोनी में बने एक मंदिर में भी यही हो रहा था। लोग खुशी से उछल रहे थे-भगवान् दूध पी रहे हैं, सचमुच। लोग मूर्ति के मंह के पास चम्मच लगाते थे और दूध धीरे-धीरे गायब हो रहा था। संजय कुमार सिंह उर्फ मक्कू उर्फ राजा भैया व्यवस्था देख रहा था और दूध का इंतजाम भी। सारे शहर में ही नहीं, सारे देश में यह हो रहा था या किया जा रहा था।

पर इससे न अतीक का कोई संबंध था, न ही उसके बंदर नन्हे का। अतीक अपने बंदर को हर सुबह सरकारी डेयरी से मिलने वाले सस्ते दूध का डेढ़ रुपए वाला एक पैकेट देता था। जल्दी ही बंदर दांत से उसमें सूराख करके सीधे उसी से दूध पीना सीख गया था। कभी-कभी यह पैकेट अतीक उसके लिए मुचडू से भी मंगा लेता था। मुचडू पैकेट बंदर की तरफ उछाल देता था और बंदर हवा में किसी नट की तरह कालबाजी खाकर उसे थाम लेता था।

जिस दिन मंदिरों में मूर्तियां दूध पी रही थीं उस दिन सारे शहर में दूध गायब हो गया था। दूध पिलाने के लिए बेहाल लोगों की काफी मदद राजा भैया ने की थी। जहां कहीं भी दूध हो सकता था, वहां से वह जुटा रहा था। इसी बीच उसने देखा, अतीक दूध का एक नन्हा पैकेट लिए जा रहा है। राजा भैया ने किसी बाज की तरह उसे जा दबोचा, “अबे, तू ये दूध कहां लिए जा रहा है? कालाबाजारी करेगा?"
"क्या बात करते हैं राजा भैया!" अतीक घबराकर बोला, "मैं तो यह नन्हे के लिए ले जा रहा हूं।"

"नन्हे? नन्हे कौन बे?"

"नन्हे, वही अपना बंदर।"

"बंदर! ये साला बंदरों को दूध पिलाएगा!"

उस दिन अतीक को और किसी पर नहीं, बंदर के उस बच्चे पर गुस्सा आया। वह गली में पहुंचा तो बंदर ने खुश होकर कलाबाजी लगाई। अतीक को लगा, वह उस पर एक ईंट दे मारे। बंदर शायद उसकी मनःस्थिति समझ गया। वह पानी के नलों में से एक में बंधा रहता था। उन्हीं नलों पर वह उदास होकर दुबक गया था। अतीक इसके बाद उससे इतना खीझ गया था कि उसने उसे नन्हे नाम से भी पुकारना बंद कर दिया था। पहले अपनी दुकान के कंप्यूटर के साथ-साथ बंदर से भी उसे लगाव था, पर अब उसका सरोकार सिर्फ कंप्यूटर तक ही रह गया था।

कंप्यूटर बिजली से काम करने वाली एक खासी विकसित मशीन है। अतीक किसी समय गली के अपने उसी तंग-से घर में छापेखानों के लिए छोटी-मोटी कंपोजिंग किया करता था। एक बार सऊदी अरब से लौटे उसके एक दोस्त ने उसे यह मशीन दिखाई। कुछ उधार और कुछ नकद जुटाकर अतीक ले आया। इसके जरिए वह कंपोजिंग से ज्यादा कुछ भी कर लेता था। इस मशीन ने मुचडू को भी आकर्षित. किया। कुछ दिन वह बड़ी लगन से उसकी सफाई करता रहा, फिर एक दिन हिम्मत करके उसने उस पर उंगलियां भी चलाईं। धीरे-धीरे अतीक से ज्यादा अच्छा काम वह खुद करने लगा, खास तौर से आकृतियां बनाने वाला काम। चूंकि पढ़ा-लिखा कुछ नहीं था, इसलिए इबारत में मार खा जाता था।

मुचडू कंप्यूटर पर काम करता था, पर मजदूरी या नौकरी नहीं। यह भी होता था कि वह सुबह थोड़ा-सा काम बिजली की उस मशीन पर करे, फिर थोड़ा काम दोपहर को किसी हलवाई की भट्ठी पर करे और शाम को मंगत की मसाला पीसने वाली मशीन की सफाई कर आए। एक और बहुत बड़ा काम उसे अनायास मिल गया था। गली के उसी बिजली के खंभे के तारों से उलझकर एक बार एक बंदर मरकर नीचे आ गिरा था। अगले रोज लोगों ने देखा, गली जहां बड़ी सड़क से मिलती है वहीं किनारे पर मुचडू एक नए सुर्ख कपड़े के टुकड़े पर बंदर की लाश लेकर बैठा है। लाश को उसने गेंदे के फूल की माला पहना दी थी।

शाम तक उसका वह लाल कपड़े का टुकड़ा सिक्कों से भर गया था। बंदर की लाश के लिए गली के ही अकरम ने विमान बनाने का सामान दे दिया। अकरम पतंगें बनाता था। अकरम के दिए पतले लाल-पीले कागज और बांस की फाड़ी हुई छड़ियों से नाव जैसा एक विमान बनाया गया और आसपास के लोग बड़ी श्रद्धा के साथ बंदर की वह लाश नदी के किनारे गाड़ आए थे। तब वहां राजा भैया ने कीर्तन भी कराया था।

मुचडू की मां ऐसे ही दिनों में वापस आई थी। ज्यादा लोगों ने उसे नहीं देखा था, पर जिक्र बहुत दूर तक हुआ। गुपचुप। किसी ने उसे उसके बाद नीचे उतरते नहीं देखा। कोई ऊपर भी नहीं गया, कोई बच्चा भी नहीं। इतने बरसों में अरहर से दाल बनने का काम भी बंद हो गया था। मुचडू की मां अब चक्की का गीत नहीं गाती थी। बहुत ज्यादा रात बीत जाने पर जो सुनाई देता था वह एक दूसरा ही गाना था, बहुत कुछ एक स्यापे जैसा। कभी-कभी बहुत ध्यान देने पर पता लगता था वह गा रही है-'पीठ देखो रे माई! मेरी पीठ देखो, जैसे धोबी का पाट, इस तरह मारा है।'

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