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मनोविश्लेषण

सिगमंड फ्रायड

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :392
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8838
आईएसबीएन :9788170289968

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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद



इसी तरह रोगी की यह भूल न तो आकस्मिक है, न अर्थहीन और न महत्त्वहीन ही, क्योंकि इससे डाक्टर के प्रति रोगी के रुख का पता चलता है। वह उस बड़े वर्ग का व्यक्ति है जो ऊंची स्थिति के लोगों के पीछे फिरते हैं और उनसे आतंकित रहना चाहते हैं। शायद उसने टेलीफोन से यह पूछताछ की थी कि उसे किस समय मिलने का मौका प्राप्त होने की सम्भावना है, और वह यह आशा कर रहा था कि उम्मीदवारों की वैसी ही भीड़ लगी होगी जैसी युद्ध के दिनों में पंसारियों के यहां लगी रहती थी। वहां पहुंचने पर उसे खाली कमरा दिखाई देता है जिसमें बहुत मामूली ढंग की कुर्सियां पड़ी हैं, और वह स्तब्ध हो जाता है। वह डाक्टर के प्रति जो अनावश्यक आदर दिखाने की तैयारी करके आया था, उसे किसी तरह झाड़ फेंकना चाहता है और डाक्टर को सामान्य आदमी मानना चाहता है, और इसलिए वह प्रतीक्षा-कक्ष और परामर्श-कक्ष के बीच के दरवाज़े को बन्द करना भूल जाता है। वह यह जतलाना चाहता है, 'अरे, यहां तो कोई भी नहीं, और न कोई होगा, चाहे मैं कितनी ही देर बैठा रहूं!' वह मिलने के समय अशिष्ट और गर्वपूर्ण ढंग से व्यवहार करेगा, यदि उसे तेज़ झटका देकर शुरू में ही उसकी पूर्वधारणा को न रोक दिया जाए।

इस छोटे-से लाक्षणिक कार्य के विश्लेषण में ऐसी कोई बात नहीं है जो आप पहले से नहीं जानते, अर्थात् यह निष्कर्ष है कि यह आकस्मिक घटना नहीं है बल्कि इसमें कुछ प्रेरक कारण, अर्थ और आशय है, कि इसका सम्बन्ध एक मानसिक प्रसंग से है जो स्पष्ट रूप से बताया जा सकता है, और कि इससे एक और भी महत्त्वपूर्ण मानसिक प्रक्रम का हल्का-सा संकेत मिलता है; पर सबसे बड़ी बात यह है कि इससे यह बात सूचित होती है कि इस प्रकार निर्दिष्ट प्रक्रम का इसे वहन करने वाले व्यक्ति की चेतना को ज्ञान नहीं है, क्योंकि जिन रोगियों ने दोनों दरवाजे खुले छोड़े उनमें से एक भी यह मानने को तैयार न होता कि वह अपनी उपेक्षा द्वारा मुझे हीन जतलाना चाहता था। शायद उनमें से बहुतों को खाली प्रतीक्षा-कक्ष में घुसने पर निराशा की भावना का ध्यान आया होगा, पर इस भावना और इसके बाद वाले लाक्षणिक कार्य का सम्बन्ध निश्चित रूप से उनकी चेतना के बाहर रहा।

अब एक लाक्षणिक कार्य के इस छोटे-से विश्लेषण को एक रोगी पर किए गए प्रेक्षण के साथ रखा जाए। मैं ऐसा उदाहरण दूंगा जो मुझे अच्छी तरह याद है, और वह थोड़े-से शब्दों में रखा भी जा सकता है। किसी वृत्तान्त के लिए थोड़े विस्तार से कहना आवश्यक है।

एक युवा अफसर ने, जो कुछ दिनों की छुट्टी लेकर घर आया था, मुझसे अपनी सास का इलाज कराने के लिए कहा। उसकी सास बड़ी सुखदायक परिस्थितियों में रह रही थी, पर फिर भी अपने और अपने परिवार के जीवन में एक निरर्थक विचार द्वारा कड़वाहट भर रही थी। मैंने देखा कि वह 53 वर्ष की मधुर और सरल स्वभाव वाली महिला थी, और उसने बिना संकोच अपने बारे में निम्नलिखित वृत्तान्त बताया : वह अपने विवाह से बड़ी सुखी है और अपने पति के साथ जो एक बड़ी फैक्टरी का मैनेजर है, देहात में रहती है। उसका पति हद से ज़्यादा दयालु है। उन्होंने 30 वर्ष पहले प्रेम-विवाह किया था और तब से उनमें कभी मनमुटाव, झगड़ा या क्षणभर की भी ईर्ष्या नहीं पैदा हुई थी। उसके दोनों बच्चों का विवाह बहुत अच्छी जगह हुआ, पर उसका पति अपनी कर्तव्य-भावना के कारण अब भी कार्य में जुटा हुआ है। एक वर्ष पहले एक अविश्वसनीय और उसकी समझ में न आने वाली बात हुई। उसे किसी ने बिना नाम के पत्र लिखकर यह सूचित किया कि उसका गुणी पति एक नौजवान लड़की से सांठ-गांठ कर रहा है; और उसने तुरन्त इस बात पर विश्वास कर लिया-तब से उसका सुख नष्ट हो गया है। विस्तृत विवरण कुछ-कुछ इस प्रकार था : उसके यहां एक नौकरानी थी जिसके साथ वह अपनी निजी बातचीत काफी खलकर किया करती थी। इस नौजवान औरत के मन में एक और लड़की के प्रति बड़ी तीव्र घृणा थी, जो खास अच्छे घर की न होते हुए भी जीवन में उसकी अपेक्षा अधिक सफल हुई थी। दूसरी नवयुवती ने नौकरी करने के बजाय व्यापार-कार्य की शिक्षा हासिल की थी, और वह फैक्टरी में नौकर हो गई थी, जहां कुछ कर्मचारियों को बाहर का काम करने के लिए भेजने के कारण कुछ स्थान खाली हो गए थे, और इस तरह वह अच्छे पद पर पहुंच गई थी। वह फैक्टरी में रहती थी, सब भलेमानसों को जानती थी और उसे लोग 'मिस' कहकर पुकारते थे। जो औरत ज़िन्दगी में पिछड़ गई थी, वह अपनी सहपाठिन पर तरह-तरह के दोष लगाया करती थी। एक दिन हमारी रोगिणी और उसकी नौकरानी एक बड़ी उम्र के आदमी के बारे में बातचीत कर रही थीं, जो उनके घर आया था, और जिसके बारे में यह कहा जाता था कि वह अपनी पत्नी के साथ नहीं रहता है और उसने एक रखैल रखी हुई है। क्यों रखी हुई है, यह वह नहीं जानती थी, पर उसने एकाएक कहा : 'इस भयंकर किसी बात की मैं कल्पना भी नहीं कर सकती कि मेरा पति रखैल रखता है। अगले दिन डाक से उसे बनावटी लिखावट में लिखा हुआ प्रेषक के नाम से रहित एक पत्र मिला, जिसमें यही सूचना दी गई थी जिसकी उसने अभी कल्पना की थी। उसने, शायद ठीक ही, यह निष्कर्ष निकाला कि वह पत्र लिखना उस जनलखोर नौकरानी का काम था, क्योंकि जिस स्त्री को उसके पति की रखैल बताया गया था वह वही लड़की थी जिससे यह नौकरानी बड़ी घृणा करती थी। यद्यपि उसे तुरन्त यह षड्यन्त्र समझ में आ गया और वह अपने चारों ओर ऐसे कायरतापूर्ण दोषारोपण इतने अधिक देख चुकी थी कि उन पर बिलकल विश्वास नहीं करती थी. पर तो भी इस पत्र से हमारी रोगिणी बहत उत्तेजित हो गई और उसने बुरा-भला कहने के लिए अपने पति को तुरन्त बुलवाया। पति ने हंसते हुए इस दोषारोपण का खण्डन किया, और अपने पारिवारिक चिकित्सक को (जो फैक्टरी का डाक्टर भी था) बुलवा भेजा और उसने इस दुखी महिला को शान्त करने की कोशिश की। उन्होंने जो अगला कदम उठाया, वह भी बहुत तर्कसंगत था। नौकरानी को बर्खास्त कर दिया गया, पर जिसे रखैल बताया गया था उसे कुछ नहीं कहा गया। रोगिणी का कहना है कि तब से मैंने इस मामले पर शान्ति से विचार करने की कोशिश की है, और मैं उस पत्र की बातों पर विश्वास नहीं करती, पर यह धारणा कभी बहुत गहरी नहीं गई, और न कभी बहुत दिन कायम रही। उस नवयुवती का नाम सुनकर या सड़क पर उसे देखकर ही सन्देह, पीड़ा और निन्दा का. नया दौर शुरू हो जाता है।

इस गुणवती स्त्री के 'केस' का रोग-चित्र यह है। मनश्चिकित्सा का बहुत अनुभव न रखने वाले को भी यह समझ में आ जाएगा कि दूसरे स्नायुरोगियों से इस केस में यह भेद है कि यह रोगिणी अपने लक्षणों को बहुत हल्के रूप में पेश करती थी, उन्हें प्रच्छन्न1 करती थी, अर्थात् छिपाती थी, और असल में उस गुमनाम पत्र से उसका विश्वास कभी नहीं हट सका।

अब प्रश्न यह है कि ऐसे केस में मनश्चिकित्सक का क्या रुख होता है। यह तो हम पहले ही जानते हैं कि जो रोगी प्रतीक्षा-कक्ष के किवाड़ बन्द नहीं करता, उसके लाक्षणिक कार्य के बारे में वह क्या कहेगा। वह इसे एक आकस्मिक घटना बताता है जिसमें मनोवैज्ञानिक दिलचस्पी की कोई बात नहीं है, और इसलिए उसके सोचने की कोई चीज़ नहीं है। पर इस ईर्ष्यालु महिला के केस में वह वही रवैया नहीं रख सकता। लाक्षणिक कार्य तो महत्त्वहीन दिखाई देता है, पर लक्षण इसे गम्भीर मामला बताता है। रोगिणी को इससे घोर कष्ट हो रहा है और एक परिवार के टूटने का भय है। इसलिए इसमें मनश्चिकित्सक की दिलचस्पी तो निर्विवाद रूप से होनी ही चाहिए। प्रथम तो, मनश्चिकित्सक लक्षण को किसी विशेष गुण से नामांकित करने की कोशिश करता है। यह महिला जिस मनोबिम्ब या विचार से अपने को पीड़ा दे रही है, उसे अर्थहीन नहीं कहा जा सकता। ऐसा सचमुच होता है कि बड़ी उमर के पति नौजवान स्त्रियों से सम्बन्ध कायम कर लेते हैं, पर इसमें कुछ और चीज़ है जो अर्थहीन और समझ में न आने वाली है। रोगिणी के पास यह कल्पना करने के लिए उस गुमनाम चिट्ठी के अलावा रत्ती भर भी आधार नहीं है कि प्रेमी और विश्वासपात्र पति भी उसी वर्ग का आदमी है जैसे समाज में आमतौर से पाए जाते हैं। वह जानती थी कि इस पत्र में कोई प्रमाण नहीं दिया गया है। वह इस पत्र के लिखे जाने का कारण सन्तोषजनक रीति से बता सकती है। इसलिए उसे अपने-आपसे कह सकना चाहिए कि मेरी ईर्ष्या बिलकुल निराधार है, और वह ऐसा कहती भी है, पर वह कष्ट इस तरह पा रही है, मानो वह अपनी ईर्ष्या को बिलकुल साधार मानती है। वह इस तरह के विचार, जिन पर यथार्थता का तर्क और दलीलें प्रभाव नहीं डाल सकती सर्वसम्मति से भ्रम1 कहलाते हैं। इसलिए यह भली महिला ईर्ष्या के भ्रम से कष्ट पा रही है। स्पष्टतः इस केस की सारभूत विशेषता यही है।

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1. Dissimulated

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