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विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
इससे आप निश्चित रूप से यही समझेंगे कि इस तरह खुलेआम इन प्रश्नों पर विचार
करने से इनकार से यही पता चलता है कि आप आलोचना से बहुत डरते हैं या हठी, या
वैज्ञानिक जगत् में प्रचलित मुहावरे में कहा जाए तो, दुराग्रही हैं। इस पर
मेरा यह उत्तर है कि यदि आप इतने कठोर परिश्रम के बाद किसी निश्चय पर पहुंचे
हों तो उससे आपको कुछ दृढ़ता के साथ उस पर डटे रहने का अधिकार होना चाहिए।
इसके अलावा मैं यह कह सकता हूं कि अपने गवेषणा-कार्य के बीच में मैंने स्वयं
महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर अपने विचार बदले हैं, और सदा इस तथ्य को प्रकाशित
कर दिया है। इस स्पष्टवादिता या साफगोई का क्या परिणाम हुआ? कुछ लोगों ने
मेरे विचारों में स्वयं मुझ द्वारा किए गए संशोधनों को बिलकुल नज़रन्दाज़ कर
दिया, और वे आज भी उन विचारों के लिए मेरी आलोचना करते हैं जिनका अब मेरे लिए
वह अर्थ नहीं रहा। कुछ लोग यह परिवर्तन करने के कारण मेरी निन्दा करते हैं और
इसलिए मुझे भरोसा करने के अयोग्य बताते हैं। जो आदमी एक या दो बार विचार बदल
ले वह विश्वास का पात्र कैसे हो सकता है, क्योंकि उसका इस बार का कथन भी गलत
हो सकता है; पर जो आदमी अपनी एक बार कही हुई बात पर अड़ा रहे या उसमें आसानी
से हेर-फेर करने से इनकार कर दे, वह हठी या दुराग्रही है। ठीक है न? ऐसी
परस्पर विरोधी आलोचनाओं को देखते हुए सिवाय इसके क्या रास्ता है कि आदमी जैसा
है वैसा कहे, और उसे जैसा जंचे वैसा करे : मैंने ऐसा ही करने का फैसला किया,
और मैं बाद के अनुभव के अनुसार अपने सिद्धान्तों में परिवर्तन या संशोधन करने
में संकोच नहीं करता। अब तक मुझे अपने मूल दृष्टिकोण को बदलने के लिए कोई
उचित कारण नहीं मिला और मुझे आशा है कि इसकी कभी भी आवश्यकता नहीं होगी।
तो, अब मुझे आपके सामने स्नायुरोगों के प्रकटनों, अर्थात् प्रकट रूपों के
बारे में मनोविश्लेषण का सिद्धान्त पेश करना है। इस प्रयोजन के लिए सादृश्य
और वैषम्य दोनों ही के कारण सबसे अधिक आसानी इस तरह होगी कि ऐसा उदाहरण लिया
जाए जो हमारी पहले विचारित घटनाओं के सिलसिले में जुड़ा हुआ है। मैं एक
लाक्षणिक कार्य1 का उदाहरण दूंगा जो बहुत-से लोगों में मैं अपने परामर्शकक्ष
में देखता हूं। विश्लेषक उन लोगों की कोई मदद नहीं कर सकता, जो आध घण्टे के
लिए अपनी जीवन-भर की कष्ट-कथा सुनाने उसके पास आते हैं। वह अपनी गहरी जानकारी
के कारण दूसरों की तरह उसे यह राय नहीं दे सकता कि उनमें कोई खराबी नहीं है
और उन्हें थोड़ी-सी जल-चिकित्सा करा लेनी चाहिए। हमारे एक साथी ने एक बार
सलाह मांगने वाले रोगियों के बारे में पूछे जाने पर बहुत खुश होते हुए कहा था
कि मैं 'उन पर अदालत का इतना समय बर्बाद करने के लिए-इतने क्राउन जुर्माना कर
देता हूं।' इसलिए आपको यह सुनकर चकित न होना चाहिए कि अधिक-से-अधिक व्यस्त
मनोविश्लेषकों के पास भी सलाह मांगने वाले मरीजों की भीड़ नहीं लगी रहती।
मैंने प्रतीक्षा से स्थान और अपने परामर्श-कक्ष के बीच वाले साधारण दरवाजे के
अलावा बीच में एक और दरवाज़ा लगवा दिया है, और उसे नमदे से मढ़वा दिया है।
इसका कारण स्पष्ट है। होता सदा यह है कि जब मैं लोगों को प्रतीक्षा स्थान से
अन्दर बुलाता हूं तब वे इन दरवाज़ों को बन्द नहीं करते और अपने पीछे दरवाजों
को खुला छोड़ देते हैं। जब मैं ऐसा देखता हूं, तब कुछ कड़ाई से तुरन्त उस
रोगी से प्रार्थना करता हूं कि वह लौटकर पहले दरवाजे वन्द करे, चाहे वह कितना
ही सजा-धजा आदमी हो, या साज-सिंगार पर कितने ही घण्टे खर्च करने वाली स्त्री
हो। मेरे इस कार्य को अकारण और रौब दिखाने वाले समझा जाता है। कभी-कभी मेरा
कहना अनुचित भी हुआ है क्योंकि वह व्यक्ति ऐसा निकला जो स्वयं किवाड़ की
हत्थी नहीं पकड़ सकता था, पर अधिकतर मामलों में मेरा कार्य उचित था, क्योंकि
जो आदमी इस तरह का आचरण करता है और किसी डाक्टर के परामर्श-कक्ष का दरवाजा
प्रतीक्षा-कक्ष की ओर खुला छोड़ देता है, वह अशिष्ट आदमी है, और उससे
उदासीनता का व्यवहार करना ही उचित है। आप बाकी बात सुनने से पहले ही किसी
पक्ष में कोई धारणा मत बना लीजिए। रोगी दरवाजा केवल तभी बन्द नहीं करता जब वह
बाहर के कमरे में अकेला इन्तज़ार कर रहा है, पर जब दूसरे उससे अपरिचित लोग
वहां प्रतीक्षा कर रहे हों तब वह कभी भी दरवाज़ा खुला नहीं छोड़ता। इस दूसरी
स्थिति में वह बहुत अच्छी तरह जानता है कि डाक्टर से बातचीत के समय उसकी बात
किसी और के कान में न पड़ना उसके अपने लिए ही हितकर है और वह दोनों दरवाज़ों
को सावधानी से बन्द करना कभी नहीं भूलता।
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1. Symptomatic act
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