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मनोविश्लेषण

सिगमंड फ्रायड

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :392
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8838
आईएसबीएन :9788170289968

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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद



व्याख्यान

16

मनोविश्लेषण और मनश्चिकित्सा

एक साल के बाद फिर अपने विषय पर विचार करने के लिए आपको यहां देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है। पिछले साल मेरे व्याख्यानों का विषय 'गलतियों और स्वप्नों पर मनोविश्लेषण का प्रयोग' था। इस वर्ष मैं आपको स्नायुरोग-विषयक घटनाओं के बारे में कुछ ज्ञान प्राप्त कराना चाहता हूं-ये घटनाएं, जैसा कि आप शीघ्र ही देख लेंगे, हमारे पहले वाले विषय से बहुत-सी बातों में मिलती-जुलती हैं, पर शुरू करने से पहले मैं आपसे यह बात कह देना चाहता हूं कि इस बार मैं आपको अपने प्रति पिछले साल वाला रुख नहीं रखने दंगा। पिछले साल मैंने आपके निर्णय से सहमत हुए बिना कदम आगे बढ़ाने की कोशिश नहीं की थी। मैंने आपके साथ बहुत बहस की थी, आपके आक्षेपों को स्वीकार किया था, और आपको तथा आपकी 'स्वस्थ समझदारी' को निर्णायक माना था। अब ऐसा करना सम्भव नहीं और इसका कारण बिलकुल सीधा है। गलतियां और स्वप्न आपकी परिचित घटनाएं थीं। यह कहा जा सकता है कि उनका आपको उतना ही अनुभव था जितना कि मुझे, अथवा आप आसानी से उतना अनुभव हासिल कर सकते थे। परन्तु स्नायुरोगों का व्यक्त रूप आपके लिए अज्ञात क्षेत्र है। आपमें से जो लोग स्वयं डाक्टर नहीं हैं, वे मेरे दिए हुए विवरण से जो कुछ जान सकते हैं उसके अलावा उनके पास वहां पहुंचने का कोई तरीका नहीं, और जहां विवाद के विषय का ज्ञान न हो वहां बढ़िया से बढ़िया निर्णय-बुद्धि भी किस काम की?

परन्तु मेरे इस कथन का यह मतलब मत समझिए कि मैं यह व्याख्यान 'बाबा वाक्यम् प्रमाणम्' की तरह आपके सामने दूंगा, या आपसे इसे बिना शर्त मानने को कहूंगा। ऐसी गलत धारणा से आप मेरे साथ घोर अन्याय करेंगे। मेरा लक्ष्य निश्चयात्मक विश्वास पैदा करना नहीं है। मेरा लक्ष्य तो जांच-पड़ताल के लिए प्रेरित करना और पूर्वग्रहों, अर्थात् पहले से बने-बनाए संस्कारों को नष्ट करना है। यदि विषय की जानकारी न होने के कारण आप फैसला करने की स्थिति में नहीं हैं, तो न तो विश्वास करना चाहिए और न अविश्वास; सिर्फ ध्यान से सुनना चाहिए, और जो कुछ मैं कहता हूं, उसका असर अपने ऊपर पड़ने देना चाहिए। निश्चयात्मक विश्वास या आस्था इतनी आसानी से नहीं पैदा की जा सकती, और जब यह आसानी से पैदा की जाती है, तो वह शीघ्र ही बेकार और अस्थिर सिद्ध हो जाती है। इन मामलों पर ऐसे आदमी को विश्वास करने का हक नहीं है जिसने मेरी तरह वर्षों इस विषय का अध्ययन न किया हो और न ही नये और आश्चर्यजनक रहस्यों का उद्घाटन स्वयं अनुभव किया हो। तो बौद्धिक मामलों में एकाएक विश्वास, बिजली की तरह कायापलट, और क्षण-भर में मत-त्याग क्यों होते हैं। क्या आप यह नहीं देखते कि 'प्रथम दृष्टि का प्रेम' भावक्षेत्र से बहुत भिन्न मानसिक क्षेत्र से पैदा होता है। हम अपने मरीजों का मनोविश्लेषण के विश्वासी होना या इसके प्रति भक्ति रखना आवश्यक नहीं समझते। इससे हमें उन पर सन्देह होने लगेगा।

हम सबसे अच्छी बात यह समझते हैं कि उनमें हितैषी सन्देहवृत्ति का रुख बना रहे। इसलिए आपको प्रचलित मनश्चिकित्सा सम्बन्धी विचार के साथ-साथ मनोविश्लेषण की अवधारणाओं को भी अपने मनों में चुपचाप बढ़ते रहने का अवसर देना चाहिए, जिससे अन्त में ऐसा मौका आ सकता है कि ये एक-दूसरे पर असर डालें और मिलकर एक निश्चित राय का रूप ग्रहण कर लें।

दूसरी ओर आप यह कल्पना ज़रा भी न करें कि मैं आपके सामने जो मनोविश्लेषण का दृष्टिकोण पेश करूंगा, वह कोई अटकल या कल्पनावासी विचारप्रणाली है। इसके विपरीत, यह उन अनुभवों का परिणाम है जो या तो प्रत्यक्ष प्रेक्षणों पर या प्रेक्षण से निकाले गए निष्कर्षों पर आधारित हैं। ये निष्कर्ष पर्याप्त या उचित रीति से निकाले गए हैं या नहीं, इसका फैसला विज्ञान की भविष्य में होने वाली उन्नति से होगा। लगभग ढाई शताब्दी के बाद और इतनी आयु हो जाने के बाद मैं बिना आत्मप्रशंसा की भावना के यह कह सकता हूं कि इन प्रेक्षणों में जो कार्य करना पड़ा, वह विशेष रूप से कठिन, गहन और सारा ध्यान लगाने से होने वाला काम था। प्रायः मेरी यह धारणा बनी है कि हमारे विरोधी हमारे कथनों के इस मूलस्रोत पर विचार करने को तैयार नहीं थे, मानो वे उन विचारों को आत्ममिष्ठ, अर्थात विचारक की अपनी भावना का परिणाम मानते थे जिन पर कोई भी आदमी जब चाहे आपत्ति उठा सकता है। अपने विरोधियों की यह बात मुझे बिलकुल समझ में नहीं आतीशायद इसका कारण यह है कि डाक्टर लोग स्नायुरोगियों की ओर इतना कम ध्यान देते हैं, और उनकी बातों को इतनी असावधानी से सुनते हैं कि उनके लिए रोगियों के वचनों में कोई विशेष बात देख सकना या उनसे विस्तृत प्रेक्षण करना असम्भव हो गया है। मैं यहां आपको यह आश्वासन देना चाहता हूं कि मैं इन व्याख्यानों में विवादास्पद बातों का, विशेष रूप से व्यक्तियों का कोई उल्लेख नहीं करूंगा। इस कथन की सचाई मैं कभी अपने मन में नहीं बिठा सका कि 'द्वन्द्व या संघर्ष सब वस्तुओं का जनक है।' मेरा ख्याल है कि यह कथन यूनानी सोफिस्टों के दर्शन से पैदा हुआ है और उस दर्शन की तरह इसमें भी यह त्रुटि है कि इसमें द्वन्द्वात्मकता1 (या तर्क-पद्धति) को बहुत अधिक महत्त्व दे दिया गया है। इसके विपरीत, मुझे ऐसा लगता है कि तथाकथित वैज्ञानिक विवाद, कुल मिलाकर बिलकुल व्यर्थ है। और यह बात तो है ही कि प्रायः सदा बड़ी व्यक्तिगत रीति से किया जाता है। कुछ वर्ष पहले तक मैं गर्व से यह कह सकता था कि मैं वैज्ञानिक झगड़े में सिर्फ एक बार बाकायदा उलझा हूं और वह भी सिर्फ एक वैज्ञानिक लोवनफैल्ड (म्यूनिख वाले) के साथ। इस झगड़े का अन्त यह हुआ कि हम दोनों मित्र बन गए और आज तक मित्र हैं, पर मैंने बहुत समय तक यह परीक्षण फिर नहीं किया, क्योंकि मुझे यह निश्चय नहीं था कि इसका परिणाम यही होगा।

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1. Dialectics

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