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मनोविश्लेषण

सिगमंड फ्रायड

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :392
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8838
आईएसबीएन :9788170289968

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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद



व्याख्यान

17

लक्षणों का अर्थ

पिछले व्याख्यान में मैंने आपको बताया था कि क्रियात्मक मनश्चिकित्सा किसी एक लक्षण के वास्तविक रूप या उसकी वस्तु के बारे में बिलकुल नहीं सोचती, पर मनोविश्लेषण अपनी बात यहां से ही शुरू करता है, और उसे यह निश्चय हो चुका है कि स्वयं लक्षण का कोई अर्थ होता है, और यह रोगी के जीवन के अनुभवों से सम्बन्धित है। स्नायुरोगों के लक्षणों का अर्थ सबसे पहले जे० ब्रायर ने हिस्टीरिया के एक रोगी का अध्ययन और सफल इलाज करते हुए (1880-82) खोजा था, और तब से वह केस प्रसिद्ध हो गया है। यह सही है कि पी० जेनेट स्वतन्त्र रूप से उसी परिणाम पर पहुंचा था। सच तो यह है कि प्रकाशन पहले फ्रांसीसी अनुसंधानकर्ता (जेनेट) के ही परिणामों का हुआ, क्योंकि ब्रायर ने अपने प्रेक्षण दस-ग्यारह वर्ष के बाद में (1893-94) प्रकाशित किए, जब हम दोनों इकट्ठे कार्य करते थे। प्रसंगतः, हमारे लिए यहां कोई बड़े महत्त्व की बात नहीं कि वह खोज किसने की; क्योंकि आप जानते हैं कि प्रत्येक खोज एक से अधिक बार की जाती है और कोई खोज एक ही बार में पूरी नहीं हो जाती। और न पात्रता के अनुसार सफलता मिलती है। अमेरिका का नाम कोलम्बस के नाम पर नहीं पड़ा। ब्रायर और जेनेट से पहले महान् मनश्चिकित्सक लारेट ने यह विचार प्रकट किया था कि पागलों के भ्रमों का भी कुछ अर्थ निकल सकता है, यदि हम उनका अर्थ लगाना जानते हों। मैं मानता हूं कि स्नायविक लक्षणों की व्याख्या करने के कारण जेनेट को बहुत ऊंचा मान देने को उत्सुक था, क्योंकि वह उन्हें रोगी के मन पर छाए हुए 'अचेतन मनोबिम्बों' की अभिव्यक्तियां मानता था, पर जब से जेनेट ने अनुचित चुप्पी साध ली है, मानो उसके लिए अचेतन कहने का एक तरीका-मात्र था, और उसके मन में कोई 'वास्तविक' या 'यथार्थ' बात नहीं थी; तब से जेनेट के विचार मेरी समझ में नहीं आते, पर मैं समझता हूं कि उसने मुफ्त में ही बहुत बड़ा श्रेय छोड़ दिया है।

तो गलतियों और स्वप्नों की तरह स्नायविक लक्षणों का भी अर्थ होता है, और उनकी तरह ये भी जिस व्यक्ति में दिखाई देते हैं, उसके जीवन से सम्बन्धित होते हैं। यह एक महत्त्वपूर्ण बात है, जो मैं कुछ उदाहरणों से आपके सामने स्पष्ट करना चाहता हूं। मैं जोर देकर कह ही सकता हूं, सिद्ध नहीं कर सकता, कि प्रत्येक केस में यही बात होती है। स्वयं प्रेक्षण करने वाले किसी भी आदमी को इसका निश्चय हो जाएगा। कुछ कारणों से मैं यह उदाहरण हिस्टीरिया के केसों में से नहीं लूंगा, बल्कि एक और प्रकार के स्नायुरोगों में से लूंगा जो इससे उत्पत्ति की दृष्टि से नजदीकी सम्बन्ध रखते हैं, और उनके बारे में मैं कछ आरम्भिक शब्द कहना चाहता हूं। यह चीज़, जिसे हम मनोग्रस्तता-रोग1 कहते हैं, हिस्टीरिया की तरह आम नहीं है। यह उतना शोर मचाकर सामने नहीं आता, बल्कि इस तरह व्यवहार करता है कि जैसे यह रोगियों का निजी मामला है। इससे प्रायः कोई शारीरिक लक्षण नहीं दिखाई देते और इसके सब लक्षण मानसिक क्षेत्र में पैदा होते हैं। मनोग्रस्तता-रोग और हिस्टीरिया उस स्नायविक रोग के दो रूप होते हैं जिसके अध्ययन पर मनोविश्लेषण का पहले निर्माण हुआ, और इसके इलाज को हमारी चिकित्सा-ली अपनी विजय समझती है। पर मनोग्रस्तता-रोग में मानसिक से शारीरिक पर रहस्यमय छलांग नहीं होती, और मनोविश्लेषण की गवेषणाओं से हिस्टीरिया की अपेक्षा यह कहीं अच्छी तरह स्पष्ट हो गया है। हम यह समझने लगे हैं कि स्नायविक रचना की कुछ प्रमुख बातें इससे अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।

मनोग्रस्तता-रोग2 इस रूप में होता है; रोगी के मन में ऐसे विचार भरे रहते हैं, जिनमें उसकी वास्तव में दिलचस्पी नहीं होती, वह ऐसे आवेग अनुभव करता है जो उसे अपरिचित मालूम होते हैं, और ऐसी क्रियाएं करने को प्रेरित होता है जिनसे उसे आनन्द नहीं मिलता, पर जिनसे हटने का सामर्थ्य भी उसमें नहीं है। विचार (मनोग्रस्तियां या आबसेशन) अपने-आपमें अर्थहीन या रोगी के लिए बिना दिलचस्पी के हो सकते हैं; वे प्रायः बिलकुल मूर्खता-भरे होते हैं। उनसे विचार का तनावपूर्ण सकेन्द्रण शरू होता है, और यह विचार रोगी को थका देता है. और रोगी बडी अनिच्छा से इसके अधीन होता है। उसे अपनी इच्छा के विरोध में चिन्ता और कल्पना करनी पड़ती है, मानो वह उसके लिए ज़िन्दगी या मौत का सवाल है। वह अपने जो आवेग देखता है, वे भी वैसे ही मूर्खतापूर्ण और निरर्थक प्रतीत हो सकते हैं, परन्तु अधिकतर उनमें कोई भयानक चीज़ होती है जैसे भयंकर अपराध करने के लिए उत्प्रेरणा, और इसलिए रोगी उन्हें न केवल अपरिचित की तरह अस्वीकार करता है, बल्कि डरकर उनसे दूर भागता है, और प्रतिषेधों, सावधानियों और रुकावटों द्वारा उन पर अमल करने की सम्भावना से अपनी रक्षा करता है। सच्चाई तो यह है कि वह एक बार भी इन आवेगों को कार्यरूप में परिणत नहीं करता। पलायन और सतर्कता सदा विजयी होती है। जो कार्य वह वास्तव में करता है वह बड़े हानिरहित और निश्चित रूप से तुच्छ कार्य होते हैं जिन्हें मनोग्रस्तीय कार्य कहा जाता है जो अधिकतर रोज़ के सामान्य कामों की आवृत्ति और ज़रा धूमधाम से किए गए कार्य ही होते हैं और इस तरह इन सामान्य आवश्यक क्रियाओं-सोना, नहाना-धोना, कपड़े पहनना, घूमने जाना आदि-को बड़े श्रमसाध्य और कठिन कार्य बना देता है। अस्वस्थ विचार आवेग और क्रियाएं मनोग्रस्तता-रोग के अलग-अलग प्ररूपों और उदाहरणों में एक ही अनुपात में नहीं मिले होते। इसके विपरीत, नियम यह है कि इन अभिव्यक्त रूपों में से एक प्रधान होता है, और उसके नाम पर रोग का नाम पड़ता है; पर इसके सब रूपों में जो सामान्य अंश है वह काफी असंदिग्ध है।

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1-2. Obsessional neurosis। इसे अंग्रेजी में Compulsion neurosis भी कहते हैं।

निश्चित रूप से यह पागलपन का रोग है। मैं समझता हूं कि मनश्चिकित्सा की अजीब-से-अजीब कल्पना भी इस जैसी कोई चीज़ नहीं बना सकती थी, और यदि हम इसे रोज़ आंखों से न देखते होते तो हमारे लिए इस पर विश्वास करना भी बड़ा कठिन था। पर आप यह न समझिए कि ऐसे रोगी को यह सलाह देकर कि अपना ध्यान इधर-उधर न होने दो, इन मूर्खतापूर्ण मनोबिम्बों की ओर कोई ध्यान न दो, और इन अर्थहीन कार्यों के बजाय कोई काम की बात करो, आप उसे कुछ लाभ पहुंचा सकते हैं। यह तो वह स्वयं ही करना चाहता है, क्योंकि उसे अपनी दशा का पूरी तरह पता है। अपने मनोग्रस्तता-लक्षणों के बारे में वह आपकी राय से सहमत है और वह बड़ी खुशी से अपनी राय देता भी है; बात सिर्फ इतनी है कि उसका अपने ऊपर वश नहीं है। मनोग्रस्तता की अवस्था में की जाने वाली क्रियाओं को एक इस तरह की ऊर्जा से पोषण मिलता है जिसकी समकक्ष चीज़ प्रकृत मानसिक जीवन में सम्भवतः कोई भी नहीं है। उसके सामने सिर्फ एक रास्ता है-वह विस्थापन कर सकता है और विनिमय यानी अदल-बदल कर सकता है; एक मूर्खतापूर्ण मनोबिम्ब के स्थान पर वह दूसरा, कुछ हल्के प्रकार का मनोबिम्ब ला सकता है, एक सतर्कता या प्रतिषेध से वह दूसरे पर जा सकता है। धूमधाम से किए जाने वाले एक कार्य के स्थान पर वह दूसरा कार्य कर सकता है। वह अपनी अनिवार्यता या बाध्यता की भावना को विस्थापित कर सकता है, पर वह इसे दूर नहीं कर सकता। यह सारे लक्षणों को विस्थापित करने का सामर्थ्य, जिसमें उसके मूल रूप जड़ से बदल जाते हैं, इस रोग की मुख्य विशेषता है। इसके अलावा, यह बात भी खास है कि इस अवस्था में मानसिक जीवन में व्याप्त 'विरोधी मान' (ध्रुवत्व)1 में खास तौर से तीव्र भिन्नता दिखाई देती है, विध्यात्मक और निषेधात्मक दोनों प्रकार की बाध्यताओं के साथ-साथ बुद्धि के क्षेत्र में संशय दिखाई देता है, जो क्रमशः फैलता जाता है और अन्त में वह उस बात में भी होने लगता है जो प्रायः निश्चित मानी जाती है। ये सब बातें मिलकर ऐसी स्थिति बना देती हैं जिसमें निर्णय-बुद्धि घटती जाती है, ऊर्जा का नाश होता है, और आज़ादी कम होती है, और यद्यपि मनोग्रस्तता का रोगी भी हमेशा शुरू में ऊर्जस्वित स्वभाव का होता है, प्रायः बहुत-सी रायें रखता है और आमतौर से औसत से अधिक बुद्धि वाला होता है, पर उसका आचार सम्बन्धी परिवर्धन काफी अधिक हुआ होता है; वह बहुत धर्मभीरु और अधिकतर सही होता है। आप कल्पना कर सकते हैं कि परस्पर विरोधी गुणों और अस्वस्थ व्यक्त रूपों के इस गोरखधन्धे में अपने पांव जमाए रखना काफी श्रमसाध्य काम है। इस समय हमारा ध्येय इस रोग के कुछ लक्षणों का अर्थ लगाना-मात्र है।

शायद हमारे पिछले विवेचन को देखते हुए आप यह जानना चाहेंगे कि मनोग्रस्तता-रोग के बारे में आजकल की मनश्चिकित्सा क्या कहती है। इसका बहुत मामूली-सा कार्य है। मनश्चिकित्सा ने अनेक तरह की बाध्यताओं के नाम रख दिए हैं पर वह उनके बारे में और कुछ नहीं कहती। इसके बदले वह इस बात पर जोर देती है कि जिन व्यक्तियों में ये लक्षण दिखाई देते हैं, वे 'पतित'1 होते हैं। इससे हमें अधिक सन्तोष नहीं होता। इससे हम उनका सिर्फ मूल्य आंकते हैं-यह तो व्याख्या के बजाय निन्दा है। मैं समझता हूं कि मनश्चिकित्सा हमें यह बताना चाहती है कि प्ररूप अर्थात् वास्तविक सामान्य रूप से पतित हो जाने पर लोगों में स्वभावतः सब तरह से विषमताएं पैदा हो जाती हैं। अब हम भी यह मानते हैं कि जिन लोगों में ऐसे लक्षण होते हैं, वे दूसरे मनुष्यों से प्ररूप में कुछ-न-कुछ भिन्न होते हैं, पर हम यह जानना चाहते हैं कि क्या वे दूसरे स्नायुरोगियों, अर्थात् हिस्टीरिया वाले या पागल लोगों की अपेक्षा अधिक 'पतित' होते हैं? इस तरह स्वरूप-निर्देश करना अत्यधिक साधारण वर्णन है। जब हम यह देखते हैं कि ऐसे लक्षण असाधारण योग्यता वाले उन नर-नारियों में पाए जाते हैं, जिन्होंने अपनी पीढ़ी पर अपने चिह्न छोड़े है, तब यह सन्देह होने लगता है कि क्या ऐसा कहना ज़रा भी उचित है? उनकी अपनी विवेकबुद्धि और जीवन-चरित लेखकों की असत्यपरायणता के कारण हमें आदर्श महापुरुषों के भीतरी स्वभाव के बारे में प्रायः बहुत कम जानकारी होती है, पर कभी-कभी ऐसा अवश्य होता है कि उनमें से कोई, सचाई के बारे में एमिल जोला की तरह मतांध होता है, और तब हमें उन बहुत सारी असाधारण मनोग्रस्तता वाली आदतों का पता चल जाता है, जिनमें उसने सारे जीवन कष्ट उठाया।

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1. Opposite values (Polarities)



मनश्चिकित्सा ने इन लोगों को 'पतित महापुरुष' कहकर पिण्ड छुड़ा लिया। अच्छा किया; पर मनोविश्लेषण ने यह सिद्ध कर दिया कि इन असाधारण मनोग्रस्ततालक्षणों को दूसरे रोगों के लक्षणों की तरह, और उस तरह जैसे उन लोगों में, जो पतित नहीं हैं, स्थायी रूप से हटाया जा सकता है। स्वयं मुझे ऐसा करने में बहुत बार सफलता मिली है।

मैं मनोग्रस्तता-लक्षणों के विश्लेषण के सिर्फ दो उदाहरण दूंगा। इनमें से एक पुराना है, पर उससे अच्छा उदाहरण मुझे आज तक नहीं मिला, और एक हाल का है। मैं इन दो उदाहरणों तक ही सीमित रहूंगा, क्योंकि इस तरह का वर्णन बड़ा स्पष्ट होना चाहिए, और उसमें बहुत विस्तार में जाना होगा।

लगभग 30 वर्ष की आयु वाली एक महिला बड़े प्रबल मनोग्रस्तता-लक्षणों से पीडित थी। यदि दर्भाग्य ने मेरा काम न बिगाड दिया होता तो शायद मैं उसकी मदद कर सका होता-इसके बारे में शायद आगे चलकर मैं बताऊंगा। वह निम्नलिखित अजीब मनोग्रस्तता के कार्य एक दिन में कई बार करती थी। वह अपने कमरे में से दौड़कर पास वाले कमरे में चली जाती; वहां कमरे के बीच में रखी हुई मेज़ के पास एक विशेष स्थिति में खड़ी हो जाती, घण्टी बजाकर अपनी नौकरानी को बुलाती, उसे कोई मामूली-सा हुक्म देती, या बिना हुक्म दिए बाहर भेज देती, और फिर दौड़कर अपने कमरे में लौट जाती। इसमें निश्चित रूप से कोई भय पैदा करने वाली बात नहीं थी, पर इससे कुतूहल तो पैदा हो ही सकता है। इसकी व्याख्या विश्लेषक के बिना कुछ किए बड़े सरल और सीधे तरीके से सामने आई। मैं यह कल्पना भी नहीं कर सकता कि मुझे इस मनोग्रस्तता के अर्थ की शंका भी कैसे हो सकती, या इसकी व्याख्या भी मैं कैसे कर सकता था। मैंने रोगी से जब भी यह पूछा, 'तुम ऐसा क्यों करती हो? इसका क्या अर्थ है?' तब उसने यही उत्तर दिया, 'मैं नहीं जानती।' पर एक दिन, जब मैं उससे बहुत बड़े संकोच को, जिसमें एक सिद्धान्त का प्रश्न आता था, दूर करने में सफल हुआ; एकाएक वह जान गई, क्योंकि उसने मनोग्रस्तता के उस कार्य का इतिहास सुना दिया। लगभग दस वर्ष पहले, उसने अपने से बहुत अधिक आयु के एक आदमी से विवाह किया था, जो सुहागरात में नपुंसक सिद्ध हुआ था। वह उस रात सम्भोग का प्रयत्न करने के लिए अनेक बार अपने कमरे से दौड़कर उसके कमरे में गया, पर हर बार असफल रहा। सवेरे उसने क्रोध से कहा था, 'किसी आदमी को बिस्तर लगाने वाली नौकरानी की नज़रों में गिरा देना ही काफी है! और पास ही पड़ी लाल स्याही की बोतल लेकर उसने चादर पर उलट दी थी, पर ठीक उस स्थान पर नहीं उलटा था जहां ऐसा निशान हो सकता था। पहले मैं यह नहीं समझ सका कि इस स्मृति का प्रस्तुत मनोग्रस्तता-कार्य से क्या सम्बन्ध हो सकता है, क्योंकि मुझे दोनों स्थितियों में इसके अलावा और कोई समानता नहीं दिखाई दी थी कि एक कमरे से दूसरे कमरे में दौड़ने की, और शायद नौकरानी के घटनास्थल पर आने की बातें एक-सी हैं। तब रोगिणी मुझे साथ के कमरे में मेज़ के पास ले गई, जहां मैंने मेज़पोश पर एक बड़ा निशान देखा। उसने यह भी बताया कि मैं मेज़ के पास इस तरह खड़ी होती हूं कि जब नौकरानी अन्दर आए, तब वह इस निशान को अवश्य देख सके। इसके बाद प्रस्तुत मनोग्रस्तता-कार्य और सुहागरात की घटना के सम्बन्धसूत्र के बारे में कोई शक नहीं रह सकता था हालांकि अभी इसके बारे में बहुत कुछ जानना बाकी था।

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1. Degenerate

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