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मनोविश्लेषण

सिगमंड फ्रायड

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :392
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8838
आईएसबीएन :9788170289968

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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद


प्रथम तो यह बात स्पष्ट थी कि रोगिणी अपने-आपको अपना पति बना रही थी। उसके एक कमरे से दूसरे कमरे में जाने का अनुकरण करके वह उसका अभिनय कर रही थी। दोनों में समानता बनाए रखने के लिए हमें यह मानना पड़ेगा कि उसने चारपाई और चादर के स्थान पर मेज़ और मेज़पोश को प्रस्तुत कर लिया। यह बिलकुल मनमानी बात मालूम हो सकती है, पर हमने स्वप्न-प्रतीकों पर व्यर्थ ही विचार नहीं किया। स्वप्नों में मेज़ बहुत बार चारपाई को निरूपित करती है। 'चारपाई और मेज़' का मिलाकर अर्थ विवाह है और इसलिए इनमें से एक आसानी से दूसरे के स्थान पर आ जाता है।

यह सब बात इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि मनोग्रस्तता-कार्य अर्थपूर्ण कार्य है; यह उस बहत महत्त्वपूर्ण दृश्य का निरूपण या आवत्ति प्रतीत होता है, पर इतने ही सादृश्य पर रुक जाना ज़रूरी नहीं; यदि हम दोनों स्थितियों के सम्बन्ध की अधिक बारीकी से पड़ताल करें तो शायद हमें कुछ और बात, अर्थात इस मनोग्रस्तता-कार्य के प्रयोजन का पता चल जाए। स्पष्टतः असली बात नौकरानी को बुलाने में है, जिसे वह लाल निशान दिखाती है, और उसके पति के इन शब्दों से किसी को उसकी नौकरानी की नज़रों में गिरा देना काफी है, उसकी बातों का वैषम्य दिखाई देता है।

इस प्रकार, जिसका अभिनय वह महिला कर रही थी, वह नौकर के सामने शर्मिन्दा नहीं होता और धब्बा जहां होना चाहिए. वहीं है। इसलिए हम देखते हैं कि उसने दृश्य को सिर्फ दोहराया नहीं है, बल्कि उस सिलसिले को जारी रखा है और उसमें संशोधन किया है, और उसे ऐसा रूप दे दिया है जो उसका होना चाहिए था। इससे एक और बात भी पता चलती है, और वह है उस परिस्थिति का संशोधन, जिसने वह रात इतनी कष्टदायक बना दी थी, और जिसके कारण लाल स्याही की आवश्यकता हुई, अर्थात् पति की नपुंसकता। इस प्रकार, मनोग्रस्तता-कार्य का अर्थ यह है, 'नहीं, यह सच नहीं है। वह नौकरानी की नज़रों में गिरा नहीं। वह नपुंसक नहीं था। स्वप्न की तरह यहां भी इस मनोग्रस्तता-कार्य में वह इस इच्छा को पूर्ण हुआ निरूपित करती है जिससे उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद उसके पति का मान पुनः कायम होने का प्रयोजन सिद्ध हो जाता है।

इस महिला के बारे में मैं आपको और जो भी कुछ बता सकता था, वह सब इस अर्थ के साथ मेल खाता है। या अधिक सही रूप में कहें तो हम उसके बारे में और जो भी कुछ जानते हैं, उस सबसे उस मनोग्रस्तता-कार्य का, जो वैसे बिलकुल समझ में नहीं आता था, यही अर्थ सूचित होता है। वह वर्षों से अपने पति से अलग थी और उससे कानूनन तलाक लेने का इरादा कर रही थी। पर अपने मन में उसके उससे मुक्त होने की कोई सम्भावना नहीं हो सकती थी। वह अपने-आपको उसके प्रति निष्ठावान होने के लिए मजबूर कर रही थी। वह दुनिया से और सब व्यक्तियों से अपने को खींचकर अलग ले गई जिससे उसे प्रलोभन पैदा न हो, और अपने कल्पनालोक में उसने उसे माफ कर दिया और आदर्श रूप में प्रतिष्ठित किया। उसके रोग का असली भीतरी रहस्य यह था कि इस तरह पड़ोसियों की द्वेषपूर्ण कानाफूसी से बच सकती थी, अपने को पति से अलग रहने को उचित ठहरा सकती थी, और अपने पति को अपने से अलग रहते हुए सुख से जीवन बिताने का मौका दे सकती थी। इस प्रकार किसी हानि रहित मनोग्रस्तता-कार्य के विश्लेषण से हम सीधे रोगी के सबसे अन्दर वाले रहस्य पर पहुंच जाते हैं, और साथ ही हमें सामान्य मनोग्रस्तता-रोग का रहस्य बहुत कुछ पता चल जाता है। मुझे यह मंजूर है कि आप इस उदाहरण पर कुछ समय लगाएं क्योंकि इसमें ऐसी दशाएं एक जगह मौजूद हैं जिनकी सब उदाहरणों में आशा करना युक्तिसंगत नहीं। इस लक्षण का निर्वचन रोगिणी ने विश्लेषक की सहायता या हस्तक्षेप के बिना एकाएक खोज लिया था, और इसका एक ऐसी घटना से सम्बन्ध था, जो बचपन से भूले हुए समय की नहीं थी, जैसा कि आमतौर पर हुआ करती है, बल्कि वह रोगिणी के वयस्क जीवन में हुई थी और उसे स्पष्ट रूप से याद थी। आलोचक लक्षणों के हमारे निर्वचन पर आदतन जो आक्षेप किया करते हैं, वे सब यहां पर बिलकुल असंगत हैं। पर सदा हमारा भाग्य इतना अच्छा नहीं होता।

एक बात और, क्या आपको यह अनुभव हुआ कि यह निर्दोष मनोग्रस्तता-कार्य हमें इस महिला के सबसे अधिक निजी और गोपनीय मामलों में सीधे ही पहुंचा देता है? स्त्री के लिए अपनी सुहागरात की कहानी कहने से बढ़कर गोपनीय कोई बात नहीं है, और क्या यह आकस्मिक बात है और क्या इसका कोई विशेष अर्थ नहीं है कि हम सीधे ही उसके यौन जीवन के भीतरी रहस्यों पर पहुंच जाते हैं? निश्चित रूप से इसका यह कारण हो सकता है कि मैंने यही उदाहरण चुना। इस प्रश्न पर जल्दी में फैसला न कीजिए, बल्कि, दूसरे उदहारण पर विचार कीजिए जो बिलकुल दूसरी तरह का है और उस तरह के उदाहरणों, अर्थात् सोने से पहले किए जाने वाले कृत्यों के उदाहरणों, में से है।

एक उन्नीस वर्ष की अच्छी तरह पली-पुसी हुई हाशियार लड़की, जो अपने माता-पिता की एकमात्र सन्तान थी, और शिक्षा तथा बौद्धिक कार्य में उनसे बढ़कर थी, बड़ी चपल और उत्साही लड़की थी; पर कुछ वर्षों से वह बड़ी चिड़चिड़ी हो गई थी, जिसका कोई कारण दिखाई नहीं देता था। वह विशेष रूप से अपनी माता से बहुत चिड़चिड़ाती थी, असन्तुष्ट और निरुत्साहित थी तथा अनिश्चय और सन्देह की वृत्तिवाली हो गई थी। और अन्त में वह कहने लगी कि मैं चौराहों और चौड़ी सड़कों पर अकेली नहीं चल सकती। हम उसकी जटिल दशा पर बहुत बारीकी से विचार नहीं करेंगे। इसके कम-से-कम दो निदान हो सकते हैं, 'अगोरा-फोबिया' (खुले मैदान की भीति) और 'मनोग्रस्तता-रोग'; पर हम उन कार्यों की ओर ध्यान देंगे जो यह नौजवान लड़की सोने से पहले किया करती थी और जिनसे उसकी माता को बड़ी परेशानी पैदा हुई। एक अर्थ में यह कहा जा सकता है कि प्रत्येक सामान्य अवस्था वाला व्यक्ति सोने से पहले कुछ बंधे-बंधाए काम करता है या कम-से-कम उसे कुछ ऐसी अवस्थाओं की आवश्यकता होती है जिनके बिना उसे सोने में बाधा पड़ती है। जाग्रत जीवन से नींद में पहुंचने के लिए एक नियमित सूत्र बना लिया जाता है जो हर रात उसी तरह दोहराया जाता है पर स्वस्थ व्यक्ति को नींद की जिस भी अवस्था की ज़रूरत है, उसकी बुद्धिसंगत व्याख्या की जा सकती है, और यदि बाहरी परिस्थितियों के कारण कोई परिवर्तन आवश्यक हो जाए तो बिना समय बरबाद किए आसानी से अपने-आपको उसके अनुकूल बना लेता है पर अस्वस्थ कृत्य अपरिवर्तनीय होता है। अधिक-से-अधिक त्याग करके भी इसे किया जाता है। इसे बुद्धिसंगत प्रेरक भावों से ढक लिया जाता है, और इसमें तथा स्वस्थ कृत्य में सिर्फ यह ऊपरी भेद दिखाई देता है कि इसे करते हुए कुछ विशेष सावधानी रखी जाती है। पर बारीकी से जांच करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि इसे पूरी तरह नहीं ढका जा सकता है, और उस कृत्य में कुछ ऐसे काम भी होते हैं जो तर्कसंगत नहीं ठहराए जा सकते और कुछ तो बिलकुल तर्कविरुद्ध होते हैं। अपनी रात की सतर्कताओं का प्रेरक कारण बताते हुए हमारी रोगिणी यह कहती है कि रात में मुझे पूरी शान्ति चाहिए, और शोर की कोई सम्भावना मैं नहीं रहने देती। इसके लिए वह दो काम करती है : अपने कमरे की बड़ी घड़ी बन्द कर देती है, और शेष सब घड़ियां, यहां तक कि अपनी छोटी-सी कलाईघड़ी भी कमरे से बाहर कर देती है। फूलों के गमले और गुलदस्ते सावधानी से मेज़ पर रख दिए जाते हैं ताकि वे रात में नीचे गिरकर और टूटकर उसकी नींद खराब न कर सकें। वह जानती है कि शान्ति कायम रखने के लिए ये सतर्कताएं मिथ्या उपाय हैं। छोटी घड़ी की टिक-टिक चारपाई के साथ वाली मेज़ पर रखी होने पर भी सुनाई नहीं दे सकती और हम सब जानते हैं कि पेंडुलम वाली घड़ी की नियमित टिक-टिक से नींद कभी खराब नहीं होती बल्कि उससे नींद पैदा होने की सम्भावना अधिक है। वह यह भी मानती है कि उसका यह भय कि रात में अपने स्थान पर रखे हुए गुलदस्ते और गमले अपने-आप नीचे गिर जाएंगे, और टूट जाएंगे, बिलकुल असम्भाव्य है। इसी तरह, उसके कुछ और कार्यों में शान्ति के लिए आग्रह उसका उद्देश्य नहीं होता। असल में तो वह यह व्यवस्था करके कि उसके सोने के कमरे और उसके माता-पिता के सोने के कमरे का दरवाज़ा आधा खुला रहे (जिसके लिए वह दरवाजे में कई तरह की चीजें रख देती है), वह शोर के आने के लिए रास्ता खोलती हुई प्रतीत होती है। पर सबसे महत्त्वपूर्ण काम स्वयं बिस्तर से सम्बन्ध रखते हैं। बिस्तर के सिरहाने वाला गोल तकिया या मसनद लकड़ी के पलंग के पिछले हिस्से को नहीं छूना चाहिए। छोटा तकिया गोल तकिये से ठीक विकर्ण की स्थित में होना चाहिए, और किसी में नहीं। इसके बाद वह अपना सिर इस समचतुर्भुज के बीचोंबीच लम्बाईनुमा रख देती है। रजाई ओढ़ने से पहले उसे हिलाना ज़रूरी है, जिससे उसमें भरे हुए पंख पैरों की तरह चले जाएं पर वह इसे फिर दबाकर फैलाती है और सारे में कर देती है।

मैं उसके कृत्य की और छोटी-मोटी बातें छोड़ देता हूं। उनसे हमें कोई नई बात नहीं पता चलेगी, और हम अपने प्रयोजन से बहुत दूर निकल जाएंगे। पर आप यह मत समझिए, कि यह सब बिलकुल बिना बाधा के हो जाता है। हर काम के साथ यह चिन्ता लगी रहती है कि यह सब उचित रीति से नहीं हुआ, इसकी जांच की जाए और इसे ठीक किया जाए। पहले उसे अपनी एक सतर्कता पर शक होता है और फिर दूसरी पर, और परिणाम यह होता है कि वह लड़की सोने से पहले एक-दो घण्टा लगा देती है और भयभीत माता-पिता को भी नहीं सोने देती।

इन कष्टों का विश्लेषण उतनी आसानी से नहीं होगा जितनी आसानी से पहली रोगिणी के मनोग्रस्तता-कार्य का हो गया था। मैंने इसके निर्वचन के बारे में कुछ संकेत और सुझाव पेश किए जिन पर उसने सदा स्पष्ट इनकार किया या घृणा और सन्देह प्रकट किया, पर अस्वीकृति की पहली प्रतिक्रिया के बाद के समय में उसने सुझाई गई सम्भावना का स्वयं विचार किया, उससे उत्पन्न साहचर्य नोट किए, स्मृतियां पैदा की, और सम्बन्ध-सूत्र कायम किए और अन्त में उसने उन्हें स्वयं निकालते हुए सब निर्वचन स्वीकार कर लिए। उसने जितना-जितना निर्वचन किया, उतना ही उतना वह अपनी मनोग्रस्तता वाली सतर्कताएं शिथिल करती गई और इलाज खत्म होने से पहले उसने सब कृत्य छोड़ दिए थे। मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि आजकल हम जिस तरह विश्लेषण-कार्य करते हैं, उसमें निश्चित रूप से यह नहीं होता कि किसी एक ही लक्षण पर तब तक लगातार जुटे रहें जब तक कि इसका अर्थ पूरी तरह स्पष्ट न हो जाए। इसके विपरीत, किसी एक बात को इस आशा पर बार-बार छोड़ देना पड़ता है कि शायद हम किसी दूसरे प्रसंग में नये सिरे से इस पर पहंच जाएं। इसलिए, उस लक्षण का जो निर्वचन मैं आपको बताने वाला हूं, वह उन सब परिणामों का मिला-जुला रूप है जो बीच में अन्य प्रश्नों पर विचार करते हुए सप्ताहों और महीनों में हासिल हुए थे।

धीरे-धीरे रोगिणी को यह समझ में आने लगा कि वह बड़ी और छोटी घड़ियों को रात के समय इसलिए बाहर कर देती है क्योंकि वे स्त्री-जननेन्द्रियों की प्रतीक हैं। घड़ियों को, जिनके बारे में हम जानते हैं कि उनके और भी प्रतीकात्मक अर्थ हो सकते हैं, आवर्ती प्रक्रम और नियमित मध्यान्तरों से सम्बद्ध होने के कारण यह जननेन्द्रिय का अर्थ प्राप्त होता है। कोई स्त्री यह शेखी बघार सकती है कि उसे मासिक धर्म घड़ी की तरह नियमित होता है। इस रोगिणी को विशेष भय यह था कि घड़ियां उसकी नींद खराब करेंगी। घड़ी की टिक-टिक की आवाज कामोत्तेजन के समय भगनासा की थरथराहट के तुल्य है। यह संवेदन, जो उसे परेशान करता था, उसे कई बार नींद से सचमुच जगा चुका था और अब भगनासा के पुनः खड़े होने का भय इस रूप में प्रकट होता था कि वह सब चलती हुई बड़ी और छोटी घड़ियों को अपने से दूर हटाने का नियम बनाए हुए थी। गमले और गुलदस्ते, और पात्रों की तरह, स्त्री-जननेन्द्रियों के प्रतीक हैं, इसलिए रात में उन्हें गिरने या टूटने से रोकने की सतर्कता भी अर्थशून्य नहीं। हम जानते हैं कि यह प्रथा बहुत व्यापक है कि सगाई के समय कोई बर्तन या तश्तरी तोड़ी जाती है। वहां मौजूद सब लोग एक-एक टुकड़ा लेकर प्रतीकात्मक रूप में यह स्वीकार करते हैं कि अब हमारा इस वधू पर कोई दावा नहीं है। यह प्रथा सम्भवतः एकपत्नी-विवाह के साथ पैदा हुई। रोगिणी ने अपने कृत्य के इस हिस्से पर भी कुछ स्मृति और साहचर्यों से रोशनी डाली। एक बार बचपन में वह कांच या चीनी मिट्टी के बर्तन ले जाते हुए गिर पड़ी थी, जिससे उसकी उंगली कट गई थी और उससे बुरी तरह खून बहने लगा था। जब वह बड़ी हुई और उसे मैथुन सम्बन्धी तथ्यों का पता चला तब उसे यह भय पैदा हो गया कि सुहागरात को उसके खून नहीं निकलेगा, और इस प्रकार वह अक्षतयोनि नहीं सिद्ध होगी। गुलदस्तों के टूटने के बारे में उसकी सतर्कता का अर्थ यह था कि वह अक्षतयोनि होने और सम्भोग के प्रथम कार्य के समय रक्तरंजित होने के प्रश्न विषयक सारी ग्रन्थि को अस्वीकार करती थी; वह रक्तरंजित होगी और वह रक्तरंजित नहीं होगी, इन दोनों चिन्ताओं को वह अस्वीकार करती थी। असल में, इन सतर्कताओं का शोर रोकने के साथ सिर्फ दूर का सम्बन्ध था।

एक दिन उसे अपने कृत्य की मुख्य बात उस समय सूझी जब एकाएक उसे अपना यह नियम समझ में आ गया कि वह गोल तकिये को चारपाई के पिछले हिस्से से नहीं छूने देती थी; उसने कहा कि गोल तकिया मुझे सदा औरत मालूम होता था और चारपाई का सीधा खड़ा हुआ पीछे का हिस्सा आदमी मालूम होता था। इसलिए वह मानो जादू करके आदमी और औरत को अलग रखना चाहती थी, अर्थात् मातापिता को अलग-अलग करना और उनका सम्भोग रोकना चाहती थी। उसके कृत्य के शुरू होने से वर्षों पहले उसने एक अधिक सीधे तरीके से यह लक्ष्य सिद्ध करने की कोशिश की थी। उसने भय का दिखावा किया था, या भय की प्रवृत्ति का लाभ उठाया था, जिससे उसके सोने के कमरे और उसके माता-पिता के सोने के कमरे के बीच का दरवाजा बन्द न किया जाए। वह नियम अब भी उसके मौजूदा कृत्य में सचमुच शामिल था। इस प्रकार, उसने अपने माता-पिता की बातचीत चुपके-चुपके सुन पाने का तरीका बना लिया था। इस कार्य में किसी समय उसे महीनों नींद नहीं आई थी। अपने माता-पिता को इस तरह परेशान करके ही वह सन्तुष्ट नहीं हुई थी, और कभी-कभी वह उस समय माता और पिता के बिस्तर में उनके बीच में सोने में भी सफल हुई थी। 'गोल तकिया' और चारपाई तब वास्तव में इकट्ठे नहीं मिल सके थे। जब अन्त में वह इतनी बड़ी हो गई कि माता-पिता के साथ उस बिस्तर में सुविधा के साथ नहीं सो सकती थी, तब उसने जान-बूझकर भय का दिखावा करके, और अपनी माता से अपना स्थान बदलकर तथा पिता के पास उसका स्थान लेकर वही प्रयोजन पूरा किया। निश्चित रूप से इस घटना से ही उसके कल्पनालोक का आरम्भ हुआ जिसका प्रभाव उसके कृत्य में स्पष्ट दिखाई देता था।

यदि गोल तकिये का अर्थ औरत था तो रजाई हिलाकर सब पंख पैरों की ओर लाने का, जिससे तली में एक उभार बन जाए, भी कुछ अर्थ था। इसका अर्थ था स्त्री को निषेचित करना, अर्थात् उसको गर्भाधान कराना। उसने गर्भावस्था को फिर भी दूर नहीं किया; क्योंकि वर्षों वह इस बात से डरी रही कि उसके माता-पिता के सम्भोग से कोई और बच्चा पैदा हो जाएगा और इस तरह उसका कोई प्रतिस्पर्धी आ जाएगा। दूसरी ओर, यदि बड़े गोल तकिये का अर्थ माता था तो छोटे तकिये का अर्थ पुत्री ही हो सकता था। तो यह तकिया बड़े तकिये पर टेढ़ा करके क्यों रखा जाता था, और उसका सिर ठीक इसके बीच में लम्बाईनुमा क्यों रखा जाता था? उससे आसानी से यह ध्यान आ जाता था कि दीवारों पर बनाए गए चित्रों में समचतुर्भुज का प्रयोग खुली स्त्री-जननेन्द्रियों को सूचित करने के लिए किया जाता है। पुरुष (पिता) का कार्य इस तरह वह स्वयं करती थी, और पुरुष-लिंग के स्थान पर अपना सिर रखती थी। (देखिए बधिया करने के लिए सिर काटने का प्रतीक)।

आप कहेंगे कि एक कुमारी लड़की के दिमाग में ये कैसे भयंकर विचार चल रहे हैं! मैं यह बात मानता हूं, पर यह न भूलिए कि मैंने ये विचार बनाए नहीं हैं, सिर्फ उन्हें उधाड़ दिया है। सोने से पहले इस तरह के कृत्य या कामकाज भी काफी विचित्र बात है, और काम-काज और उसकी कल्पनासृष्टि मे निर्वचन से जो सादृश्य और सम्बन्ध प्रकट हुआ है, उससे आप इनकार नहीं कर सकते। परन्तु मेरे लिए अधिक महत्त्व की बात यह है कि आप इस बात पर ध्यान दें कि यह काम-काज किसी एक ही कल्पनासृष्टि का परिणाम नहीं था, बल्कि इसमें कई कल्पनासृष्टियां मिली हुई थीं, जिनकी कहीं एक गांठ या बन्धन केन्द्र होगा। यह भी देखिए कि इस काम-काज की विस्तृत बातों से विध्यात्मक और निषेधात्मक दोनों रूपों में यौन इच्छाओं का पता चलता है। कुछ अंश में वे यौन इच्छाओं की अभिव्यक्ति हैं, और कुछ अंश में वे इनके विरुद्ध सफाई हैं।

इस काम-काज के विश्लेषण को रोगियों के दूसरे लक्षणों के सिलसिले में रखकर और भी बहुत-सी जानकारी प्राप्त की जा सकती है, पर इस समय हमारा वह प्रयोजन नहीं है। आपको, पिता के प्रति कामासक्ति, जो बहुत पहले बचपन में ही पैदा हो गई थी, और जिसने इस लड़की को परवश बना दिया था, के निर्देश से ही सन्तुष्ट हो जाना चाहिए था। शायद इसी कारण, वह अपनी माता से इतना वैर-भाव रखती थी। हम इस तथ्य को भी नज़रन्दाज़ नहीं कर सकते कि इस लक्षण से भी हम रोगिणी के यौन जीवन पर ही पहुंचेंगे। स्नायुरोगों के लक्षणों के अर्थ और प्रयोजन में हम जितना अधिक जाएंगे इस पर हमें उतना ही कम आश्चर्य होगा।

दो छंटे हुए उदाहरणों से मैंने आपके सामने वह दिखलाया है कि गलतियों और स्वप्नों की तरह स्नायविक लक्षणों का भी अर्थ होता है और उनका रोगी के जीवन की घटनाओं से निकट सम्बन्ध होता है। क्या दो उदाहरणों के बल पर मैं आपसे इस विशेष महत्त्वपूर्ण कथन पर विश्वास कर लेने की आशा कर सकता हूं? नहीं, पर क्या आप मुझसे यह आशा कर सकते हैं कि मैं आपको तब तक उदाहरण देता जाऊंगा जब तक आप कह न दें कि हमें विश्वास हो गया? यह भी नहीं। क्योंकि प्रत्येक केस का जितना विस्तृत और पूरा विवेचन करना पड़ता है, उसे देखते हुए मुझे स्नायुरोगों के सिद्धान्त में इस एक प्रश्न का सारे सत्र में प्रति सप्ताह पांच घण्टे लगाने होंगे। इसलिए मैं वे नमूने देकर ही सन्तोष करूंगा जो अपने कथन के साक्ष्य-रूप में मैंने दिए हैं, और विशेष जानकारी के लिए आपका ध्यान इस विषय के साहित्य की ओर खींचूंगा। ब्रायर के पहले केस (हिस्टीरिया) के लक्षणों का प्रसिद्ध निर्वचन तथाकथित डिमनेशिया प्रीकौक्स (अर्थात् स्वयंपोषी मनोवैकल्य) के बहुत अस्पष्ट लक्षणों का सी० जी० युंग द्वारा किया हुआ वह उल्लेखनीय विशदीकरण, जो उसने तब किया था जब वह सिर्फ मनोविश्लेषक था, और तत्काल भविष्यवक्ता बनने की आकांक्षा नहीं रखता था, और हमारी पत्र-पत्रिकाओं में आने वाले इस तरह के सब केस इसके लिए अच्छी अध्ययन-सामग्री हैं। इस तरह की खोज-बीन बहुत हुई है। स्नायविक लक्षणों का विश्लेषण, निर्वचन और अनुवाद मनोविश्लेषकों को इतना आकर्षक लगा है कि इसकी तुलना में उन्होंने स्नायुरोगों की दूसरी समस्याओं को कुछ समय के लिए भुला दिया है।

आपमें से जो भी व्यक्ति इस प्रश्न का अध्ययन करने के लिए आवश्यक परिश्रम करेगा वह साक्ष्य-सामग्री की प्रचुरता से निश्चय ही बहुत प्रभावित होगा, पर उसके रास्ते में एक कठिनाई भी आएगी। लक्षण का अर्थ, जैसा कि हम देख चुके हैं, रोगी के जीवन से सम्बन्धित होता है। वह लक्षण जितना व्यष्टितः बना होगा, उतना ही स्पष्टतः हम यह सम्बन्ध-सूत्र स्थापित करने की आशा कर सकते हैं। तब यह कार्य एक खास खोज बन जाता है क्योंकि उसे भूतकाल की स्थिति की प्रत्येक अनुपयोगी क्रिया और प्रत्येक अर्थहीन विचार, जिसमें वह विचार और क्रिया उचित होते, एक उपयोगी प्रयोजन सिद्ध करते हैं। उस रोगिणी का मनोग्रस्तता-कार्य, जो दौड़कर मेज़ पर पहंचती थी और नौकरानी को बुलाने के लिए घण्टी बजाती थी, इस तरह के लक्षण का सबसे बढ़िया नमूना है। पर एक सर्वथा भिन्न प्ररूप के लक्षण बहुत बार दिखाई देते हैं। ये वे लक्षण हैं जिन्हें हम रोग के प्रारूपिक1 लक्षण कहते हैं। ये प्रत्येक केस में प्रायः एक-से होते हैं। उनमें फर्क प्रायः दिखाई नहीं देते या बहुत ही थोड़े होते हैं; और इसलिए उनका रोगी के जीवन या उसके भूतकाल की विशेष स्थितियों से सम्बन्ध जोड़ना कठिन होता है। दूसरी रोगिणी के नींद से पहले के काम-काज बहुत-सी दृष्टियों से बिलकुल प्रारूपिक हैं, यद्यपि उसमें कुछ निजी विशेषताएं भी हैं, जिनके कारण, यह कहा जा सकता है कि उसका ‘ऐतिहासिक' निर्वचन भी हो सकता है, पर मनोग्रस्तता के सब रोगियों में आवृत्ति या दोहराना, अपनी कुछ क्रियाओं को अलग कर लेना और तालबद्ध व्यापार पाए जाते हैं। उनमें से बहुत-से लोग बहुत नहाते-धोते हैं। जो रोगी अगोराफोबिया (टोपोफोबिया अर्थात् स्थान-भीति के रोगी होते हैं-अब यह रोग मनोग्रस्तता-रोग नहीं माना जाता बल्कि इसे चिन्ता-हिस्टीरिया में गिना जाता है) में रोग-चित्त की वही विशेषताएं फिर पेश करते हैं, वे घिरे हुए स्थानों, चौड़े-खुले चौराहों, लम्बी सड़कों और गलियों से डरते हैं। यदि कोई उनके साथ हो, या कोई सवारी उनके पीछे आ रही हो तो वे रक्षित अनुभव करते हैं। तो भी, इतनी समानता रखते हुए अलग-अलग मरीजों में अपनी निजी दशाएं दिखाई देती हैं। आप उन्हें मनोवस्थाएं कह सकते हैं, जिनमें एक-दूसरे से बहुत असमानता होती है। कोई सिर्फ तंग गलियों से डरता है, कोई सिर्फ चौड़ी सड़कों से डरता है, कोई सिर्फ तब चल सकता है जब आसपास अधिक लोग न हों, और कोई तब ही चल सकता है जब चारों ओर लोग ही लोग हों। इसी तरह हिस्टीरिया में व्यक्तिगत विशेषताओं की प्रचुरता के अलावा सदा बहुत सारे सामान्य प्रारूपिक लक्षण होते हैं जो ऐतिहासिक ढंग से आसान निर्वचन करने में बाधा डालते प्रतीत होते हैं। हमें यह न भूलना चाहिए कि इन प्रारूपिक लक्षणों द्वारा ही हम निदान करने में अपना आधार बना सकते हैं। मान लीजिए कि हिस्टीरिया के किसी केस में हम पीछे की ओर चलते हुए किसी प्रारूपिक से किसी अनुभव तक या एक जैसे अनुभवों की श्रृंखला तक (उदाहरण के लिए हिस्टीरिया-वमन (उलटी) से घृणित प्रकार की भावनाओं की श्रेणी तक) सम्बन्ध जोड़ लेते हैं, तो किसी दूसरे केस में यह पता चल सकता है कि वमन (उलटी) पैदा करने वाले अनुभव पहले वाले अनुभवों से सर्वथा भिन्न हैं और ऊपर से वे कारण मालूम होते हैं, और इस तरह विभ्रम हो जाता है। पर ऐसा लगने लगता है जैसे किसी अज्ञात कारण से हिस्टीरिया के रोगियों को वमन (उलटी) अवश्य होनी चाहिए, और मनोविश्लेषण द्वारा प्रकाश में लाए गए ऐतिहासिक कारण बहाने-मात्र हैं, जो भीतरी आवश्यकता के कारण मौका मिलने पर अपनी प्रयोजन-सिद्धि के लिए अपना लिए गए हैं।

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1. Typical

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