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विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
व्याख्यान
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उपघातों पर बद्धता : अचेतन
मैंने पिछली बार कहा था कि हम अपना आगे का कार्य अब तक प्राप्त जानकारी के
आधार पर आगे बढ़ाएंगे, अपने मनों में उससे उत्पन्न सन्देहों के आधार पर नहीं।
अभी हमने ऊपर के उदाहरणों के विश्लेषण से उत्पन्न सबसे मनोरंजक निष्कर्षों पर
विचार आरम्भ भी नहीं किया है।
पहली बात : दोनों मरीज़ों ने यह धारणा पैदा की है कि वे अपने भूतकाल की एक
विशेष बात से बंधे हुए हैं, कि वे यह नहीं जानते कि अपने को उससे छुड़ाएं, और
इसलिए वे वर्तमान और भविष्य दोनों से विच्छिन्न हो जाते हैं; मानो वे अपनी
बीमारी में सबसे अलग रह जाते हैं; जैसे पुराने ज़माने में लोग अपने आश्रमों
या कुटियों में अकेले रहकर अपने बदकिस्मती के दिन बिता दिया करते थे। पहले
रोगी के मामले में उसका अपने पति से विवाह, जो असल में बहुत समय पहले खत्म हो
चुका था, उसके मन में जम गया था। अपने लक्षणों के द्वारा वह उस पति के साथ
अपना सम्बन्ध कायम रख सकी। उन लक्षणों में हमने ऐसी आवाजें सुनीं जो उस पुरुष
का समर्थन करती थी, उसे क्षमा करती थी, उसे ऊंचा उठाती थीं, और उसके अभाव में
शोक प्रकट करती थीं। यद्यपि वह युवती है और दूसरे पुरुषों को आकर्षित कर सकती
है, पर वह हर सम्भव वास्तविक और काल्पनिक सतर्कता रखती है जो उस पुरुष के
प्रति उसकी निष्ठा कायम रखेगी। वह अपरिचितों से नहीं मिलती, अपने बनाव-सिंगार
पर ध्यान नहीं देती; इसके अलावा वह जिस कुर्सी पर बैठ जाती है उससे आसानी से
नहीं उठ सकती, और वह अपना हस्ताक्षर नहीं करती और कोई उपहार नहीं दे सकती,
क्योंकि उसकी अपनी चीज़ और किसी को नहीं मिलनी चाहिए।
दूसरी रोगिणी, अर्थात् नौजवान लड़की में जवानी से बहुत पहले पिता से जो कामुक
अनुराग बन गया था, वह उसके जीवन में यह कार्य कर रहा है। उसने स्वयं भी यह
देखा है कि जब तक वह इस तरह बीमार है, तब तक वह विवाह नहीं कर सकती। हम यह
सन्देह कर सकते हैं कि वह विवाह के अयोग्य बनने और इस तरह अपने पिता के साथ
ही रह सकने के लिए इतनी बीमार हो गई है।
हमें यह प्रश्न पूछना ही होगा कि कोई व्यक्ति जीवन के प्रति ऐसा असाधारण और
अलाभकर रुख कैसे, किन साधनों से और किन प्रेरक भावों से प्रेरित होकर अपना
सकता है, यदि यह रुख स्नायुरोग में सर्वत्र दीखने वाला गुण हो और इन दो
मरीजों की कोई अपनी विशेषता न हो। सच्ची बात यह है कि यह ऐसा ही है। यह
प्रत्येक स्नायुरोग में पाया जाने वाला सामान्य लक्षण है, और इसका व्यावहारिक
महत्त्व बहुत अधिक है। ब्रायर की पहली हिस्टीरिया की रोगिणी इसी तरह उस समय
से बद्ध1 हो गई थी, अर्थात् बंध गई थी, जब उसका पिता बहुत रोगी था, और उसने
उसकी परिचर्या की थी। उसके अच्छा हो जाने के बावजूद वह तभी से कुछ हद तक जीवन
से विच्छिन्न रही है, क्योंकि यद्यपि वह स्वस्थ और चुस्त रही है, पर उसने
स्त्री का सामान्य जीवन-कार्य नहीं अपनाया। अपने प्रत्येक रोगी में विश्लेषण
करने पर हम देखते हैं कि लक्षणों और उनके अभावों ने रोगी को उसके जीवन से
किसी गुज़रे हुए ज़माने में पहुंचा दिया है। अधिकतर उदाहरणों में यह ज़माना
जीवन के इतिहास का बहुत आरम्भिक भाग, बचपन का काल या दूध पीते समय का ज़माना
होता है, यद्यपि यह बात बेतुकी लगती है।
हमारे स्नायुरोगियों के इस व्यवहार से बहुत सादृश्य रखने वाला रोग तथाकथित
उपघातज स्नायुरोग2 है, जिसे युद्ध ने कुछ समय से इतना आम बना दिया है। ऐसे
उदाहरण युद्ध से पहले रेलवे दुर्घटनाओं तथा जीवन को खतरा पैदा करने वाले
दूसरे डरावने अनुभवों के बाद भा होत थे। उपघातज स्नायुरोग मूलतः वे स्नायुरोग
नहीं है जो स्वयं पैदा होते हैं, जिनकी हम विश्लेषण द्वारा खोज करते हैं और
जिनका हम इलाज करते हैं। आज तक हमें अपने अन्य विषयों सम्बन्धी विचारों से
उनका सम्बन्ध जोड़ने में सफलता नहीं हुई। बाद में मैं आपको यह दिखाने की आशा
करता हूं कि इसमें क्या रुकावट पड़ती है। फिर भी उनमें एक बात पर पूरी सहमति
है जिस पर बल दिया जा सकता है। उपघातज स्नायुरोगों से यह बहुत अच्छी तरह
प्रकट हो जाता है कि उनके मूल में उपघात सम्बन्धी घटनाओं के समय से बद्धता
होती है। ये रोगी अपने स्वप्नों में सदा उपघात वाली स्थिति पैदा करते हैं।
हिस्टीरिया जैसे दौरों वाले मामलों में जिनमें विश्लेषण हो सकता है, यह
प्रतीत होता है कि उस दौरे में वह स्थिति पूरी की पूरी फिर उत्पन्न हो जाती
है, मानो यह व्यक्ति अभी तक उस स्थिति को पूरी तरह हल नहीं कर सकेगा, मानो यह
काम अभी उसके सामने सचमुच अधूरा पड़ा है। हम उसके इस रुख को पूरी संजीदगी से
स्वीकार करते हैं। इससे उस मार्ग का संकेत मिलता है जिसे हम मानसिक प्रक्रमों
का आर्थिक अवधारण कह सकते हैं। 'उपघात सम्बन्धी' शब्द का इस आर्थिक अर्थ के
अलावा, असल में, और कोई अर्थ नहीं है। उस अनुभव को हम उपघातज, अर्थात् चोट से
पैदा होने वाला कहते हैं जो बहुत थोड़े-से समय में मन पर उद्दीपन की इतनी
अधिक मात्रा ला देता है कि उसका प्रकृत साधनों से स्वीकरण3 या विशदन नहीं
किया जा सकता और इसलिए मन में मौजूद ऊर्जा के वितरण में स्थायी विक्षोभ पैदा
हो जाते हैं।
इस सादृश्य को देखकर हम उन अनुभवों को भी उपघातज में गिना देना चाहते हैं,
जिनसे हमारे स्नायुरोगी बंधे हुए प्रतीत होते हैं। इस प्रकार, हमें स्नायुरोग
की एक सरल अवस्था मिल जाएगी। इसकी उपघातज रोग से तुलना न हो सकेगी और यह
अभिभूत करने वाले भावात्मक अनुभव को पचाने की असमर्थता से पैदा होगा। असल
में, ब्रायर ने और मैंने 1893-95 में अपने नये प्रेक्षणों को एक सिद्धान्त का
रूप दिया था। वह कुछ ऐसे ही रूप में था। उपर्युक्त पहले मरीज़ का मामला,
जिसमें एक युवा औरत अपने पति से अलग हो गई है, इस वर्णन में बहुत अच्छी तरह
जंच जाती है। वह अपने विवाह की अव्यवहार्यता को 'विजय' नहीं कर सकी और अब भी
उस उपघात से बंधी हुई थी; पर दूसरे नौजवान लड़की वाले केस से, जो अपने पिता
से बंधी हुई थी, तुरन्त यह पता चलता है कि यह सूत्र काफी व्यापक नहीं है। एक
ओर तो छोटी लड़की का अपने पिता के प्रति बाल्यकालीन प्रशसाभाव ऐसा आम अनुभव
है और इतना अधिक पाया जाता है कि यदि यहां 'उपघातज' शब्द का प्रयोग करें तो
वह निरर्थक हो जाता है; दूसरी ओर, केस के इतिहास से पता चलता है कि इस पहले
यौन बन्धन को रोगी ने उस समय बिना कोई बाहरी लक्षण प्रकट किए बिलकुल हानिरहित
ढंग से पार कर लिया और वह कई वर्षों बाद ही मनोग्रस्तता-रोग के रूप में प्रकट
हुआ।
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1. Fixated
2. Traumatic neurosis
3. Assimilation
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