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विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
इस प्रकार हम देखते हैं कि स्नायुरोग में बहुत-सी उलझनें, बड़ी विविधता और
अनेक निर्धारक कारक हैं। पर हमारा विचार है कि उपघात सम्बन्धी दष्टिकोण को
मिथ्या मानकर छोड़ना ज़रूरी नहीं होगा, और कि यह दूसरी जगह ही ठीक तरह जंच
जाएगा और इसका समन्वय करना होगा।
यहां फिर हमें अपना पहले वाला रास्ता छोड़ना होगा। इस समय हम इससे बहुत आगे
नहीं पहुंच सकते और इसको सन्तोषजनक रीति से आगे चलाने से पहले हमें बहुत कुछ
सीखना पड़ेगा, पर उपघातों से बद्धता के विषय को छोड़ने से पहले यह समझ लेना
चाहिए कि यह घटना स्नायुरोगों के अलावा और बहुत-से क्षेत्रों में व्यक्त होती
है। प्रत्येक स्नायुरोग में ऐसी बद्धता होती है, पर प्रत्येक बद्धता से
स्नायुरोग नहीं सूचित होता, या प्रत्येक बद्धता का स्नायुरोग से सम्बन्ध होना
आवश्यक नहीं, या प्रत्येक बद्धता स्नायुरोग में ही नहीं पैदा होती। दुःख किसी
भूतकाल की चीज़ पर भावबद्धता का मूल रूपों1 और आदर्श उदाहरण है और
स्नायुरोगों की तरह इसमें भी वर्तमान और भविष्य से पूर्ण विच्छेद की अवस्था
हो जाती है। पर साधारण आदमी भी दुःख और स्नायुरोग में स्पष्ट भेद करता है।
दूसरी ओर, ऐसे स्नायुरोग रोग भी हैं जिन्हें दुःख के अस्वस्थ रूप कहा जा सकता
है।
ऐसा भी होता है कि किसी उपघातज अनुभव से, जिसने व्यक्ति के जीवन के सारे
ढांचे को जड़ से हिला दिया हो, उसका जीवन पूर्णतया स्थिर हो गया हो और उस तरह
उसने वर्तमान और भविष्य में सारी दिलचस्पी छोड़ दी हो और वह स्थायी रूप से
भूतकाल के चिन्तन में ही डूबा रहता हो। पर ऐसे दुःखी लोगों का स्नायुरोगी बन
जाना आवश्यक नहीं। इसलिए एक विशेषता स्नायुरोगियों में सदा होने पर भी, और
इसके अर्थपूर्ण होने पर भी, इसका स्नायुरोग में उचित से अधिक महत्त्व नहीं
समझना चाहिए। अब हमारे विश्लेषण से निकले दूसरे निष्कर्ष पर विचार कीजिए। इस
निष्कर्ष पर बाद में कोई मर्यादा लगाने की आवश्यकता नहीं होगी। पहली रोगिणी
से हमने उसके अर्थहीन मनोग्रस्तता-कार्य की, और इसके सिलसिले से वह जिन
घनिष्ठ स्मृतियों को याद करती थी, उनकी बात सुनी है। हमने दोनों के सम्बन्ध
पर भी विचार किया और स्मृति के साथ इसके सम्बन्ध-सूत्र को देखकर इस
मनोग्रस्तता-कार्य का प्रयोजन भी अनुमान से निकाला। पर एक बात को हमने पूरी
तरह उपेक्षित कर दिया, जबकि इस बात पर अधिक-से-अधिक ध्यान देने की आवश्यकता
है। जब तक रोगिणी यह कार्य करती रही, तब तक वह यह नहीं जानती थी कि इसका
पिछले अनुभव से किसी भी तरह सम्बन्ध है। दोनों बातों का सम्बन्ध-सूत्र छिपा
हुआ था। वह यह बिलकुल सच्चा उत्तर दे सकती थी कि मैं यह नहीं जानती कि किसी
आवेग के वशीभूत होकर ऐसा करती हूं। तब एकाएक ऐसा हआ कि इलाज के प्रभाव से उसे
यह सम्बन्ध-सूत्र पता चल गया, और वह इसे कह सकी। पर तब भी उसे यह पता नहीं था
कि वह क्रिया करने में उसका क्या प्रयोजन था-उसका प्रयोजन भूतकाल की कष्टकारी
घटना को सुधारना और अपने प्रिय पति को अपनी नज़रों में ऊंचा उठाना था। उसे यह
समझने में और मेरे सामने स्वीकार करने में बहुत समय और प्रयास लगाना पड़ा कि
उसके मनोग्रस्तता-कार्य के पीछे ऐसा प्रेरक भाव ही क्रियाशील हो सकता था।
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1. Prototype
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