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विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
देने में कितना अधिक कार्य कर सकते हैं। असल में यह वही चीज़ है जो
कामविकृतियों में व्यक्त होती है; फर्क इतना ही है कि काम-विकृतियों में यह
असंदिग्ध रूप से और बिना कठिनाई के पहचानी जा सकती है, जबकि हिस्टीरिया में
हमें लक्षण का निर्वचन करना पड़ता है, और तब हम वह विकृत काम-आवेग व्यक्ति की
चेतना में नहीं बताते, बल्कि उसके व्यक्तित्व के अचेतन भाग में बताते हैं।
मनोग्रस्तता-रोग के विशिष्ट लक्षण के बहुत-से प्ररूपों में से अधिक
महत्त्वपूर्ण प्ररूप वे हैं जो विकृत उद्देश्यवाली यौन प्रवृत्तियों के एक
समूह, अर्थात् पीड़कतोषसमूह, की अनुचित शक्ति के कारण पैदा होते हैं।
मनोग्रस्तता-रोगों की संरचना के अनुसार ही ये लक्षण मुख्यतः इन इच्छाओं से
बचाव का काम करते हैं, अथवा वे सन्तुष्टि और अस्वीकृति के बीच मौजूद द्वन्द्व
को प्रकट करते हैं। पर सन्तुष्टि भी चुप नहीं बैठी रहती। यह जानती है कि रोगी
के व्यवहार में चक्करदार रास्ता पड़कर और विशेष रूप से अपने को स्वयं यंत्रणा
देकर कैसे अपने को आगे बढ़ाया जाए। इस स्नायु-रोग के और रूप बहुत अधिक
'चिन्ता' और सोचते रहना है; इनसे उन कार्यों का, जो प्रकृत रूप में यौन
सन्तुष्टि की तैयारी के कार्य हैं, अतिरंजित कामुकीकरण1 प्रकट होता है, जैसे
देखने की छ्ने की और अन्दर की बात जानने की इच्छा। इसी कारण इस रोग में
स्पर्श के भय और मनोग्रस्तीय 'धोने' का इतना अधिक महत्त्व हो जाता है।
मनोग्रस्तता-क्रियाओं का बहुत बड़ा भाग हस्तमैथुन की प्रच्छन्न रूप में
पुनरावृत्ति और रूप-भेद होता है और यह स्वीकार किया जाता है कि यौन कल्पनाओं
की जो विविध उड़ानें हैं, उन सबमें एक वही कार्य एकसमान मौजूद रहता है।
काम-विकृत और स्नायु-रोग का सम्बन्ध अधिक विस्तार से दिखाना कुछ भी कठिन नहीं
है, पर मैं समझता हूं कि मैंने अपने प्रयोजनों के लिए काफी कह दिया है। पर
लक्षणों के निर्वचन में विकृत काम-प्रवृत्तियों के बारे में इतनी जानकारी हो
जाने के बाद हमें मनुष्य जाति में उसकी बारंबारता और तीव्रता को बहुत अधिक
महत्त्व देने से बचना चाहिए। आपने सुना है कि प्रकृत यौन सन्तुष्टि की कुंठा
से स्नायु-रोग पैदा हो सकता है। वास्तविक जीवन में इस कुंठा के कारण आवश्यकता
यौन उत्तेजन के अप्रकृत रास्ते अपनाने को मजबूर हो जाती है। बाद में आप समझ
सकेंगे कि यह कैसे होता है; कम-से-कम आप इतना तो समझ जाएंगे कि इस तरह के
एकसाथ अवरोध से विकृत आवेगों का बल बढ़ जाएगा और अब वे तब की अपेक्षा अधिक
शक्तिशाली हो जाएंगे जबकि वास्तविक रूप में प्रकृत यौन-सन्तुष्टि में कोई
रुकावट नहीं होती। प्रसंगतः, ऐसी ही बात व्यक्त काम-विकृतियों में भी दिखाई
देगी। बहत-से उदाहरणों में वे नैसर्गिक काम-वृत्ति की प्रकत सन्तष्टि में
अनचित रूप से बड़ी कठिनाइयों के कारण पैदा या सक्रिय होती हैं, और ये
कठिनाइयां अस्थायी दशाओं या स्थायी संस्थाओं से पैदा होती हैं। दूसरे
उदाहरणों में विकृत प्रवृत्तियां निश्चित रूप से ऐसी अवस्थाओं से बिलकुल
स्वतन्त्र होती हैं। ऐसा लगता है कि मानो वे सम्बन्धित व्यक्ति के लिए
स्वाभाविक यौन जीवन हैं।
शायद आप थोड़ी देर के लिए यह समझ रहे होंगे कि इन सब बातों से प्रकृत और
विकृत यौन वृत्ति के सम्बन्ध स्पष्ट होने के बजाय और अस्पष्ट होने लगते हैं;
पर यह बात मन में रखिए। यदि यह बात सही है कि यौन सन्तुष्टि के मार्ग की
वास्तविक बाधाएं या इसके विषय में कुण्ठा उन लोगों में विकृत प्रवृत्तियों को
ऊपर के तल पर ले आती हैं जिनमें अन्यथा ऐसी कोई प्रवृत्ति न दिखाई देती, तो
हमें यह निष्कर्ष मानना ही होगा कि इन लोगों में कोई ऐसी चीज़ है जो उन
काम-विकृतियों को अपनाने को तैयार है, या आप कहना चाहें तो ये प्रवृत्तियां
उनमें गुप्त रूप में अवश्य मौजूद हैं। इस प्रकार मैंने जिन दो नये प्रेक्षणों
की बात कही थी, उनमें से दूसरे पर हम आ जाते हैं। मनोविश्लेषण की जांच-पड़ताल
से यह पता चला है कि बच्चों के यौन जीवन की पड़ताल करना आवश्यक है, क्योंकि
लक्षणों के विषय में जो संस्मरण और साहचर्य सामने आते हैं, वे सदा शैशव के
आरम्भिक वर्षों पर लौटा ले जाते हैं। जो बात हमने इस तरह खोजी थी, उसके एक-एक
अंश की पुष्टि बालकों के प्रत्यक्ष प्रेक्षण से हो चुकी है। इस प्रकार यह पता
चला है कि सब विकृत यौन प्रवृत्तियों का मूल बचपन में मिलता है। बालकों में
वे सब विकृत प्रवृत्तियां ग्रहण करने का झुकाव होता है और वे अपनी अपरिपक्वता
के अनुसार अलग-अलग मात्रा में उन सबके वशीभूत होते हैं, और उन्हें अपनाते
हैं। संक्षेप में, विकृत यौन प्रवृत्ति शैशवीय यौन प्रवृत्ति ही है, जो अब
अधिक बड़े रूप में और अपने घटक-अवयवों में खण्डित होती है।
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1. Sexualization
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