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मनोविश्लेषण

सिगमंड फ्रायड

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :392
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8838
आईएसबीएन :9788170289968

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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद


अब आप काम-विकृतियों को बिलकुल दूसरे ही ढंग से देखेंगे और मनुष्य जाति के जीवन से उनके सम्बन्ध की उपेक्षा नहीं करेंगे। पर इन आश्चर्यकारक और अजीब बातों के ज्ञान से आपमें कितनी परेशानी के भाव पैदा होंगे! शुरू में निश्चित रूप से आप प्रत्येक बात का निषेध करना चाहेंगे। इस तथ्य का कि बालकों में यौन जीवन कही जा सकने योग्य कोई चीज नहीं होती है, हमारे प्रेक्षणों की यथार्थता का और बालकों के व्यवहार में उस चीज़ के साथ, जो बाद के वर्षों में विकृति कहलाती है, कोई सम्बन्ध देखने के हमारे दावे के औचित्य का आप विरोध करेंगे। सबसे पहले आपके विरोध के प्रेरक कारण आपके सामने रखूगा, और इसके बाद अपने वश करूंगा। यह कहना या समझना कि बालकों का कोई यौन जीवन नहीं होता अर्थात् उनमें यौन उत्तेजना, एक तरह की यौन आवश्यकताएं और सन्तुष्टि नहीं होती और उनमें ये बातें बारह और चौदह वर्ष की आयु के बीच एकाएक आ जाती हैं, और दृष्टियों के अलावा जैविकीय दृष्टि से भी वैसा ही असम्भाव्य, बल्कि बेहूदा होगा, जैसे यह कल्पना करना कि वे बिना जननेन्द्रियों के पैदा होते हैं और तरुणावस्था में उनमें जननेन्द्रियां फूटने लगती हैं। उनमें इस समय असल में जो चीज़ पैदा होती है वह है प्रजनन सम्बन्धी कार्य, जो उस समय शरीर और मन में मौजूद सामग्री का अपने प्रयोजनों के लिए उपयोग कर लेता है। आप यौन प्रवृत्ति और प्रजनन को एक-दूसरे से मिला रहे हैं और इस तरह आप यौन प्रवत्ति, काम-विकतियों और स्नाय-रोगों को समझने का रास्ता स्वयं बन्द कर रहे हैं। इसके अलावा, इस भूल में एक अर्थ भी है। कहने में अजीब मालूम होता है, पर इसका मूल कारण यह है कि आप सब कभी बालक रहे हैं, और बालकपन में आप शिक्षा के प्रभाव में रहे हैं। क्योंकि शिक्षा का एक सबसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक कार्य यह भी है कि वह नैसर्गिक यौन प्रवृत्ति को, जब वह प्रजनन सम्बन्धी कार्य के रूप में विकसित हो जाती है तब, संयत करे, सीमित करे, और व्यक्ति को नियन्त्रण में रखे (व्यक्ति का नियन्त्रण और समाज की आवश्यकता एक ही बात है), इसलिए समाज अपने हित को देखते हुए बालक के पूर्ण परिवर्धन को तब तक के लिए टाल देता है, जब तक कि वह बौद्धिक परिपक्वता की एक निश्चित स्थिति पर न पहुंच जाए, क्योंकि नैसर्गिक यौन प्रवृत्ति के पूर्ण रूप में क्रियाशील हो जाने पर शिक्षणीयता अर्थात् शिक्षा-प्राप्ति की योग्यता प्रायः खत्म हो जाती है। यदि ऐसा न किया जाए तो निसर्ग-वृत्ति सब रुकावटों को और परिश्रम से खड़े किए गए सभ्यता के ढांचे को तोड़-फोड़कर फेंक देगी। इसमें संयत करने का काम आसान भी नहीं है। इस दिशा में सफलता प्रायः बहुत कम होती है, और कभी-कभी बहुत अधिक भी होती है। मलतः समाज का प्रेरक भाव आर्थिक है क्योंकि इसके पास इतने साधन नहीं हैं कि यह अपने सदस्यों के बिना परिश्रम किए उनके जीवन का भरण-पोषण कर सके। इसलिए उसे यह यत्न करना पड़ता है कि इन सदस्यों की संख्या अधिक न बढ़ सके और उनकी शक्ति यौन व्यापारों से हटकर अपने कार्य पर लगी रहे-इसलिए जीवनधारण के लिए होने वाला नित्य और आदिकाल से चला आता हुआ संघर्ष आज तक चला आ रहा है।

अनुभव से शिक्षकों को यह पता चला होगा कि अगली पीढ़ी की यौन इच्छा को ढालने का कार्य तभी सफल हो सकता है जब तूफान फटने तक प्रतीक्षा करने के बजाय शुरू में ही उस पर असर डाला जाए और तरुणावस्था से पहले ही बालकों के यौन जीवन में दखल दिया जाए। इसलिए बालक के प्रायः सब शैशवीय यौन व्यापारों पर रोक लगा दी जाती है, या उन्हें अरुचिकर बना दिया जाता है। आदर्श यह रहा है कि बालक के जीवन को निष्काम या कामहीन बना दिया जाए; और धीरे-धीरे इसका यह नतीजा हुआ है कि हम इसे वास्तव में निष्काम मानने लगे हैं और विज्ञान भी इसे ऐसा ही बताता है। इसलिए प्रतिष्ठित विश्वासों और लक्ष्यों से कोई विरोध न होने देने के लिए बालकों के यौन व्यापार से आंख मींच ली जाती है और यह कोई छोटी सफलता नहीं है-और उधर विज्ञान इसकी दूसरे ढंग से व्याख्या करके सन्तुष्ट हो जाता है। छोटे बालक को शुद्ध और निर्दोष माना जाता है। जो इससे भिन्न बात कहे उसको मनष्य जाति की कोमलतम और पवित्रतम भावनाओं पर अविश्वास करने वाला कहा जाता है।

सिर्फ बालक इस रूढ़ प्रथा में कोई हिस्सा नहीं लेते। वे बड़ी चतुराई से अपनी पशु-प्रकृति पर जमे रहते हैं और आग्रहपूर्वक यह प्रदर्शित करते हैं कि 'शुद्धता' उन्हें अभी सीखनी है। कैसी विचित्र बात है कि जो लोग बालकों में काम-प्रवृत्ति होने का निषेध करते हैं, वे ही इसको रोकने के लिए होने वाले शिक्षणात्मक उपायों को शिथिल करने का सबसे अधिक विरोध करते हैं। बच्चों में कोई भी दूषित प्रवृत्ति', जिसके होने का वे निषेध करते हैं, दीखने पर वे ही उसके लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था करते हैं। इसके अलावा, सिद्धान्त-विचार की दृष्टि से यह बात बड़े महत्त्व की है कि जीवन का जो समय निष्काम बालकपन सम्बन्धी संस्कार का सबसे प्रबल खण्डन करता है, अर्थात् पांच या छह वर्ष की आयु तक का समय, वह वही समय है जो अधिकतर लोगों में विस्मृति के पर्दे में छिपा रहता है। यह विस्मृति विश्लेषण द्वारा पूरी तरह हटाई जा सकती है, पर विश्लेषण से पहले भी उसके अन्दर प्रवेश होता था, और बालकपन के कुछ स्वप्न कायम रहते थे।

अब मैं आपको बालकपन के वे यौन व्यापार बताऊंगा जो सबसे अधिक स्पष्ट रूप से पहचाने जा सकते हैं। यह अधिक अच्छा होगा कि मैं पहले आपको लिबिडो या राग या काम-क्षुधा का परिचय दे दूं। लिबिडो या राग बिलकुल क्षुधा की तरह है। यह वह बल है जिसके द्वारा नैसर्गिक यौन वृत्ति वैसे ही अपनी अभिव्यक्ति करती है जैसे पोषण की निसर्ग-वृत्ति भूख के द्वारा अपनी अभिव्यक्ति करती है। यौन उत्तेजन और सन्तुष्टि आदि अन्य शब्दों की कोई परिभाषा देने की आवश्यकता नहीं। निर्वचन को शिशु के यौन व्यापारों के विषय में बहुत कुछ करने योग्य मिलता है, जैसा कि आप आसानी से समझ जाएंगे, और निःसन्देह आपको आक्षेप करने के लिए भी कारण दिखाई देगा। यह निर्वचन किसी लक्षण से पीछे की ओर चलते हुए मनोविश्लेषणात्मक जांच के आधार पर बना हुआ है। शिशु के प्रथम यौन उत्तेजन जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण दूसरे कार्यों के सिलसिले में प्रकट होते हैं। इसकी मुख्य दिलचस्पी, जैसा कि आप जानते हैं, पोषण प्राप्त करने से सम्बन्ध रखती है। जब वह बिलकुल सन्तुष्ट होकर छाती पर पड़ा सोता है, तब उसके चेहरे पर पूर्ण परितृप्ति होती है, जो बाद के जीवन में शुक्रक्षरण1 के अनुभव के बाद फिर दिखाई देगी। यह बात निष्कर्ष निकालने के लिए काफी नहीं है, पर हम देखते हैं कि शिशु पोषण पाने के लिए आवश्यक क्रिया वास्तव में पोषण न पाते हुए भी करता रहना चाहता है। इसलिए इसका कारण भूख नहीं है। हम इस क्रिया को 'सुख के लिए चूसना' कहते हैं (रबड़ का निप्पल चूसते रहना बच्चों को अच्छा मालूम होता है); और जब शिशु ऐसा करता है तब फिर वह वही आनन्दपूर्ण परितृप्ति प्रकट करता हुआ सो जाता है-इस तरह हम देखते हैं कि चूसने की क्रिया अपने-आपमें सन्तुष्टि देने के लिए काफी है। धीरे-धीरे उसे ऐसी आदत पड़ जाती है कि वह इस तरह निप्पल चूसे बिना नहीं सोता। बुडापेस्ट के निवासी और बच्चों का इलाज करने वाले वयोवृद्ध डाक्टर लिण्डनर ने सबसे पहले इस प्रतिक्रिया को यौन प्रकृति का बताया था। बच्चों की देखभाल करने वाली नर्से तथा लोग इस चूसने के बारे में यही विचार रखते मालूम होते हैं। उन्हें इसमें सन्देह नहीं कि इसका एकमात्र प्रयोजन इससे प्राप्त होने वाला सुख ही है। वे इसे बच्चों की 'शैतानी' समझते हैं, और यदि बच्चा इसे खुद नहीं छोड़ देता, तो वे उसकी यह आदत छुड़ाने के लिए सख्त उपाय बरतते हैं, और इस तरह हमें पता चला कि शिशु सुख-प्राप्ति से भिन्न कोई उद्देश्य न होते हुए कुछ क्रियाएं करता है। हम मानते हैं कि सबसे पहले यह सुख पोषण-ग्रहण के समय प्राप्त होता है, पर शिशु पोषण से अलग भी इसका सुख-भोग करना जल्दी ही सीख जाता है। इससे प्राप्त परितुष्टि सिर्फ मुख और होंठों के क्षेत्र से सम्बन्धित होती है। इसलिए इस

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1. Sexual orgasm

क्षेत्र को हम कामजनक क्षेत्र कहते हैं, और इस चूसने से उत्पन्न सुख को यौनसुख बताते हैं, पर इस शब्द के प्रयोग के औचित्य के बारे में अभी हमें विचार करना है।

यदि बालक अपने मन की बात कह सकता तो वह अवश्य यह मानता कि माता की छाती चूसने का कार्य जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है। उसका यह कहना गलत नहीं होता, क्योंकि इस कार्य से जीवन की दो सबसे बड़ी आवश्यकताओं की एकसाथ पूर्ति हो जाती है। फिर, मनोविश्लेषण से पता चलता है, और उससे आश्चर्य भी होता है कि इस कार्य का कितना अधिक मानसिक महत्त्व सारे जीवन में बना रहता है। पोषण के लिए स्तन चूसने से ही सारे यौन जीवन का परिवर्धन होता है। यह बाद में मिलने वाली प्रत्येक यौन सन्तुष्टि का अलभ्य मूर्त रूप है और आवश्यकता के समय कल्पना प्रायः इसी पर लौटकर पहुंचती है। चूमने की इच्छा में माता की छाती के लिए इच्छा भी शामिल है, और इसलिए माता की छाती यौन इच्छा का पहला आलम्बन है; जो आलम्बन बाद में बनते हैं, उनके निर्धारण में इस प्रथम आलम्बन का कितना महत्त्व होता है, इस रूपान्तरण और स्थानापन्नता द्वारा मानसिक जीवन के बहुत दूरवर्ती क्षेत्रों पर कितना प्रभाव डालता है, इसकी पूरी-पूरी धारणा आपको कराने में मैं असमर्थ हूं; पर सबसे पहले जब बालक सुख के लिए चूसता है, तब इस आलम्बन को छोड़कर इसके स्थान पर वह अपने शरीर के एक हिस्से का प्रयोग करता है। वह अपने अंगूठे या अपनी जीभ को चूसता है। इस प्रकार यह सुख-प्राप्ति के प्रयोजन के लिए अपने-आपको बाहरी दुनिया की सहमति से स्वतन्त्र कर लेता है, और उत्तेजन के क्षेत्र में शरीर के एक दूसरे हिस्से को लाकर, और इस तरह उसका विस्तार करके अपने सुख तीव्र कर लेता है। सब कामजनक क्षेत्र बराबर सुख नहीं दे सकते, इसलिए जब शिशु, जैसा कि लिण्डनर ने कहा है, अपने शरीर को टटोलता हुआ अपनी जननेन्द्रियों से विशेष रूप से उत्तेजन योग्य क्षेत्र का पता लगा लेता है, और इस तरह सुखार्थ चूसने से स्वयंरति का रास्ता ढूंढ़ लेता है, तब यह एक महत्त्वपूर्ण अनुभव होता है।

सुखार्थ चूसने के स्वरूप के बारे में इस विचार ने शैशवीय यौन प्रवृत्ति की दो निश्चायक विशेषताओं की ओर हमारा ध्यान खींचा है। ये प्रबल शारीरिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के सिलसिले में सामने आती हैं और आत्मकामित1 व्यवहार करती हैं, अर्थात् ये अपने शरीर में ही अपने आलम्बन खोजती हैं और प्राप्त करती हैं। जो बात पोषण-ग्रहण करने के बारे में बहुत स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, वही कुछ दूर तक मल-त्याग के प्रक्रम में भी होती है। हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि शिशुओं को पेशाब और आंतों का मल निकालने में सुख अनुभव होता है और वे बहुत शीघ्र इन क्रियाओं को इस तरह करने की कोशिश करते हैं जिससे इन कामजनक क्षेत्रों में इन क्रियाओं के साथ होने वाले झिल्लियों के उत्तेजन से उन्हें यथासम्भव अधिक-से अधिक परितुष्टि मिल सके। जैसा कि लो एण्ड्रियास ने बताया है, किसी अन्तःप्रेरणा से प्रेरित होकर बाहरी दुनिया सबसे पहले इस जगह रुकावट के रूप में सामने आती है। वह बालक की सुख की इच्छा का विरोध करने वाले बल के रूप में उसके सामने आती है-यहीं उसे बाद के जीवन में अनुभव होने वाले बाहरी और भीतरी द्वन्द्वों का पहला संकेत मिलता है। जब वह स्वयं चाहे तब मल-त्याग न करे, बल्कि दूसरे लोगों द्वारा नियत समय पर ही मल-त्याग करे। उसे सुख के इन स्रोतों को छोड़ने की प्रेरणा देने के लिए उससे कहा जाता है कि इन कार्यों से सम्बन्धित हर बात 'बुरी' या 'अनुचित' है और उसे छिपाना चाहिए। इस प्रकार, उसे पहली बार दूसरों की दृष्टि में अपना मान पाने के लिए अपना सुख छोड़ने को कहा जाता है। मल-त्याग के प्रति उसका अपना रुख शुरू में बड़ा भिन्न होता है। अपने खुद के मल से उसमें कोई घृणा पैदा नहीं होती। वह उसे अपने शरीर के हिस्से की तरह मानता है, और छोड़ना नहीं चाहता। वह उसका उपयोग अपने प्रिय लोगों को अपने चिह की सबसे पहली 'भेंट' देने में करता है। शिक्षा के द्वारा इन प्रवृत्तियों से हटा दिए जाने पर भी वह अपनी 'भेंटों' और अपने 'धन' को उतना ही महत्त्व देता रहता है। पेशाब करने की अपनी सफलता उसे विशेष अभिमान की बात मालूम होती है।

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1. Auto-erotically

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