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विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
तो, शैशवीय यौन प्रवृत्ति का संक्षिप्त वर्णन आगे बढ़ाया जाए। जो बात मैंने
आपसे दो शारीरिक संस्थानों के बारे में कही है, उसके बारे में अन्य संस्थानों
की उसी तरह सूक्ष्म परीक्षा करके बात को बढ़ाया जा सकता है। बच्चों के यौन
जीवन में सिर्फ उन घटक-निसर्ग-वृत्तियों1 की एक श्रृंखला के सिर्फ वे व्यापार
होते हैं जो एक-दूसरे से स्वतन्त्र रहते हुए कुछ उसके अपने शरीर में और कुछ
पहले ही से किसी बाहरी आलम्बन में परितुष्टि पाना चाहते हैं। इन शारीरिक
संस्थानों के अंगों में शीघ्र ही पहला स्थान जननेन्द्रिय संस्थान2 का हो जाता
है। ऐसे लोग भी होते हैं जिनमें किसी अन्य जननेन्द्रिय या आलम्बन की मदद के
बिना, अपनी ही जननेन्द्रिय में सुखदायक परितुष्टि, शैशव के दूध चूसने के समय
की आदतन स्वयं रति से शुरू होकर तरुणावस्था में होने वाली आवश्यकता से
उत्पन्न स्वयं रति तक, बिना व्यवधान के जारी रहती है और उसके बाद भी अनिश्चित
काल तक कायम रहती है। प्रसंगतः स्वयं रति का विषय इतने से खत्म नहीं हो गया।
इसमें अनेक दृष्टिकोणों से विचार किया जा सकता है।
इस चर्चा को मैं बहुत नहीं बढ़ाना चाहता, पर फिर भी, बच्चों में जो यौन
कुतूहल होता है, उसकी कुछ बात अवश्य कहना चाहता हूं। बाल्य यौन वृत्ति की यह
इतनी बड़ी विशेषता है और स्नायु-रोग के लक्षण-निर्माण के लिए इतनी
महत्त्वपूर्ण है कि इसे छोड़ा नहीं जा सकता। शैशवीय यौन कुतूहल बहुत छोटी
उम्र में, कभी-कभी तीसरे वर्ष से भी पहले, शुरू हो जाता है। यह लिंगों के भेद
से सम्बन्ध नहीं रखता। बालकों के लिए इसका कोई अर्थ नहीं है, क्योंकि वे,
कम-से-कम लड़के तो, दोनों लिंगों में वही पुरुष-जननेन्द्रिय समझते हैं। यदि
फिर कोई लड़का अपनी छोटी बहन या साथ खेलने वाली लड़की की योनि देख ले, तो वह
तुरन्त अपनी इन्द्रियों के साक्ष्य का निषेध करना चाहता है, क्योंकि वह यह
धारणा नहीं बना सकता कि कोई उसकी तरह का मनुष्य प्राणी उसके सबसे
महत्त्वपूर्ण गुण से रहित भी हो सकता है। बाद में इससे जो शक्यताएं या किए जा
सकने वाले कार्य उसके सामने आते हैं, उन्हें देखकर वह भयभीत हो जाता है। उसे
अपने इस छोटे-से अंग पर बहुत ध्यान देते देखकर पहले जो धमकियां दी गई थीं,
उनका प्रभाव उसे अब अनुभव होने लगता है। उस पर बाधियाकरण ग्रन्थि का आधिपत्य
हो जाता है, जो उसके स्वस्थ रहने पर उसके चरित्र-निर्माण में, रोगी होने पर
उसके स्नायु-रोग के निर्माण में और यदि उसका मनोविश्लेषण द्वारा इलाज किया
जाता है तो उसके प्रतिरोधों के निर्माण में इतना महत्त्वपूर्ण कार्य करती है।
हम जानते हैं कि छोटी लड़कियां बड़े दृष्टिगोचर शिश्न के अभाव से अपने में
भारी कमी अनुभव करती हैं, और लड़कों में इसके होने पर ईर्ष्या रखती हैं, इसी
मूल से प्रथमतः पुरुष होने की इच्छा पैदा होती है, जो किसी स्त्रियोचित
परिवर्तन के साथ ठीक समंजन न होने के कारण बाद में स्नायु-रोग में फिर आ जाती
है। इसके अलावा, लड़की की भगनासा बालपन में हर प्रकार से शिश्न के तुल्य होती
है। यह विशेष उत्तेजनीयता का क्षेत्र है, जिससे आत्मकामीय सन्तुष्टि प्राप्त
होती है। नारीत्व में संक्रमण होने के समय बहुत कुछ परिणाम इस बात पर निर्भर
है कि वह संवेदिता, बहुत पहले और पूरी तरह, भगनासा से हटाकर योनि-मुख पर
पहुंचा दी गई या नहीं। जो नारियां यौन दृष्टि से संवेदनशून्य कहलाती हैं,
उनमें भगनासा दृढ़ता से इस संवेदनशीलता को कायम रखती है।
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1. Component-instincts
2. Genitalia
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