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मनोविश्लेषण

सिगमंड फ्रायड

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :392
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8838
आईएसबीएन :9788170289968

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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद


यह आश्चर्य की बात है कि सोफोक्लीज़ के दुःखान्त नाटक से उसके श्रोताओं में रोषपूर्ण विरोध नहीं पैदा होता। उनमें यह प्रतिक्रिया पैदा होना अधिक उचित होता, जो कि उस मन्दबुद्धि सैनिक डाक्टर में पैदा हुई थी; क्योंकि मूलतः यह अनैतिक नाटक है। यह सामाजिक नियम के प्रति मनुष्य की ज़िम्मेदारी को दूर कर देता है, और यह दिखलाता है कि दैवी बलों के विधान से यह अपराध होता है; और मनुष्य की नैतिक निसर्ग-वृत्ति, जो इस अपराध से उसकी रक्षा करती, शक्तिहीन हो जाती है। यह मानना आसान है कि पौराणिक आख्यान की कथा में भाग्य और देवताओं को दोष देने का आशय मौजूद रहा होगा; बुद्धिवादी यूरीपिडीज़ की रचना में, जो दैवी शक्तियों का विरोधी था, यह चीज़ सम्भवतः ऐसा दोषारोपण बन जाती पर धर्मप्राण सोफोक्लीज़ के साथ ऐसे आशय का प्रश्न ही नहीं पैदा होता। उसकी धार्मिक भावना देवताओं की इच्छा के पालन को सबसे ऊंची नैतिकता बताती है; यहां तक कि जब वे अपराध का विधान करें, तब भी; और इस तरह वह इस दोष का भागी नहीं बनाया जा सकता। मैं यह नहीं समझता कि उस नाटक का यह सन्देश भी उसकी एक अच्छाई है, पर इससे उसके प्रभाव में कमी भी नहीं होती। इनसे श्रोता उदासीन बना रहता है। वह इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं करता, बल्कि स्वयं पौराणिक कथा के गूढ़ अर्थ और वस्तु पर इस तरह प्रतिक्रिया करता है, मानो आत्मविश्लेषण करके उसने अपने भीतर ईडिपस ग्रन्थि का पता लगा लिया है, और यह मान लिया है कि देवताओं की इच्छा और भविष्यवाणी मेरे ही अचेतन का गरिमा से ढका हुआ रूप है; मानो उसे यह याद आ गया है कि उसमें अपने पिता को खत्म कर देने और उसकी जगह अपनी माता से विवाह करने की इच्छा थी, और उसे इस विचार से घृणा करनी चाहिए। कवि के शब्दों का उसे यह अर्थ प्रतीत होता है, 'आप व्यर्थ ही अपने को दोषी होने से इनकार करते हैं: आप व्यर्थ ही यह बताते हैं कि आपने इन बराइयों से बचने की कितनी कोशिश की; इसलिए आप अपराधी हैं, क्योंकि आप उन्हें दूर नहीं कर सके, वे अब भी अचेतन रूप में आपके भीतर मौजूद हैं। और इसमें मनोवैज्ञानिक सत्य है। यद्यपि मनुष्य ने अपनी दूषित इच्छाओं का दमन करके उन्हें अपने अचेतन में भेज दिया है और तब वह खुशी से अपने मन में कहता है कि अब मैं उनके लिए उत्तरदायी नहीं, तो भी उसे इस रूप में अपनी ज़िम्मेदारी महसूस करनी पड़ती है कि उसके हृदय में एक ऐसी अपराध-भावना है जिसकी उसे कोई बुनियाद नहीं दिखाई देती।

इस बात में कोई सन्देह नहीं हो सकता कि स्नायु-रोगियों को प्रायः तंग करने वाली अपराध-भावना के सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोतों में से एक ईडिपस ग्रन्थि है। इसके अतिरिक्त एक और बात है : मैंने 1913 में टौटेम अंड टैबू (Totem und Tabu) शीर्षक एक अध्ययन प्रकाशित किया था, जिसमें धर्म और नैतिकता के प्राचीनतर रूपों का परिचय था। उसमें मैंने यह आशंका प्रकट की थी कि शायद सारी मनुष्य जाति की अपराध-भावना, जो सारे धर्म और नैतिकता का मूल स्रोत है, इतिहास के आरम्भ में ईडिपस ग्रन्थि के द्वारा ही प्राप्त की गई होगी। मैं इस विषय में आपको बहुत कुछ बताना चाहता हूं, पर अच्छा यह होगा कि न बताऊं। इस विषय को एक बार शुरू करके छोड़ देना कठिन है, और अब हमें फिर व्यष्टि मनोविज्ञान पर लौट आना चाहिए।

तो गुप्तता-काल से पहले वाले आलम्बन-चुनाव के काल में बालकों के सीधे प्रेक्षण से ईडिपस ग्रन्थि के बारे में हमें क्या पता चलता है? आसानी से दीख जाता है कि वह, जहां शिशु पुरुष अपनी सारी की सारी माता को अपने लिए ही चाहता है, अपने पिता को इसमें बाधक देखता है; जब पिता को उसका आलिंगन करते देखता है, तब बेचैन हो जाता है और जब पिता बाहर चला जाता है या अनुपस्थित होता है, तब वह अपना सन्तोष जाहिर करता है। वह अपनी भावनाएं सीधे तौर से शब्दों में प्रायः प्रकट करता है, अपनी माता को वचन देता है कि मैं तेरे साथ विवाह करूंगा; ईडिपस के कृत्यों की तुलना में यह बात कुछ बड़ी नहीं प्रतीत होगी, पर तथ्य की दृष्टि से यह काफी है, दोनों का सार एक ही है। बहुत बार प्रेक्षण में यह देखकर पहेली-सी लगने लगती है कि इस काल में वही बालक किसी समय पिता के लिए बड़ा अनुराग प्रदर्शित करेगा; पर भावना की ऐसी विषम, या ठीक-ठीक कहा जाए तो उभयक1 एक जगह मौजूद अर्थात् विपरीत भावनाओं की अवस्थाएं, जो वयस्कों में संघर्ष पैदा कर देंगी, बालकों में बहुत समय तक एकसाथ आराम से रह सकती हैं, जैसे कि वे बाद में अचेतन में स्थायी रूप से इकट्ठी रहती हैं। यह आक्षेप किया जा सकता है कि छोटे बच्चे का व्यवहार अहंकार से प्रेरित है, और उसमें कामुकता-ग्रन्थि का अवधारण उचित नहीं। माता बालक की सब आवश्यकताओं का ध्यान रखती है, और परिणामतः बच्चे का हित इस बात में है कि वह और किसी की ओर ध्यान न दे। यह भी बिलकुल सही है, पर शीघ्र ही यह स्पष्ट हो जाता है कि ऐसी निर्भरता की स्थितियों की तरह इसमें भी अहंकारमूलक हितों से सिर्फ वह अवसर प्रस्तुत होता है, जिससे कामुकता-आवेग लाभ उठाते हैं। जब छोटा बालक अपनी माता के बारे में बिलकुल खुलेआम यौन कुतूहल प्रकट करता है, रात में उसके साथ सोना चाहता है, उसके कपड़े बदलते समय उसी कमरे में रहने का आग्रह करता है, और उससे शारीरिक काम-चेष्टाओं की भी कोशिश करता है, जिन्हें माता प्रायः देखती है और हंसते हुए औरों को सुनाती है, तब उसके प्रति इस आसक्ति का कामुक रूप असंदिग्ध रूप से सिद्ध हो जाता है। इसके अतिरिक्त, यह नहीं भूलना चाहिए कि इस तरह छोटी पुत्री की आवश्यकताएं पूरी करके भी माता यही परिणाम पैदा करती है, और प्रायः पिता लड़के के लिए उतनी ही तकलीफ उठाने में माता के साथ उत्साह से होड़ करता है, पर उसकी नज़रों में वही महत्त्व पाने में असफल रहता है जो माता को प्राप्त है। संक्षेप में, लिंग-पसन्दगी वाली बात कितनी भी आलोचनाओं द्वारा वस्तुस्थिति में से हटाई नहीं जा सकती। लड़के की अहंकारमूलक दिलचस्पी की दृष्टि से, यह कोरी मूर्खता होगी कि वह अपनी सेवा सिर्फ एक व्यक्ति के बजाय दोनों व्यक्तियों से कराने को तैयार न हो।

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1. Ambivalent

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