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विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
कुछ दशाओं-अंग-रोग उद्दीपन की कष्टदायक अनुभूति, किसी अंग की प्रदाहात्मक
अवस्था का स्पष्टतः प्रभाव यह होता है कि राग की अपने आलम्बन पर संसक्ति कम
हो जाती है। इस तरह जो राग खींचा गया है, वह शरीर के रोगी भाग पर अधिक प्रबल
आच्छादन के रूप में फिर अहम् से जुड़ जाता है। सच पूछिए तो यह निश्चयपूर्वक
कहा जा सकता है कि ऐसी अवस्थाओं में राग का अपने आलम्बनों से खिंचकर हट जाना
बाहरी दुनिया में अहंकारमूलक स्वहितों या दिलचस्पियों के अपने विषयों से हटने
की अपेक्षा अधिक विलक्षण होता है। इससे हाइपोकोण्ड्रिया को समझना सम्भव मालूम
होता है। हाइपोकोण्ड्रिया में कई अंग देखने में रोगी न होते हुए भी अहम् की
चिन्ता का विषय बना रहता है। पर मैं इस विषय में आगे नहीं जाऊंगा, और उन
स्थितियों पर विचार नहीं करूंगा जो आलम्बनराग के अहम् पर लौट आने की इस धारणा
के आधार पर किए जा सकते हैं। क्योंकि दो आक्षेप अवश्य उठाए जाएंगे, जो इस समय
आपके ध्यान में हैं। प्रथम तो, आप यह जानना चाहते हैं कि जब मैं नींद, रोग और
ऐसी ही अन्य अवस्थाओं पर विचार करता हूं, तब राग और 'स्वहित' में, यौन
निसर्ग-वृत्तियों और अहम् निसर्ग-वृत्तियों में विभेद पर क्यों बल देता हूं,
जबकि यह मानने पर प्रेक्षणों की सन्तोषजनक व्याख्या हो जाती है कि एक ही, एक
समान ऊर्जा, जो अबाधित चलती-फिरती है, आलम्बन या अहम् इन दोनों को ढांप सकती
है, और दोनों के उद्देश्य बराबर सिद्ध कर सकती है। दूसरे, आप यह जानना
चाहेंगे कि यदि राग का अपने आलम्बनों से वियोजन या आलम्बन-राग का अहम्-राग
में-या साधारणतया अहम्-ऊर्जा में-रूपान्तरण एक प्रकृत मानसिक प्रक्रम है, जो
प्रतिदिन और प्रतिरात्रि होता रहता है, तो राग के अपने आलम्बनों से वियोजनों
की एक रोगात्मक दशा का उद्गम, मैं कैसे बता सकता हूं?
इसका उत्तर यह है : आपका पहला आक्षेप ठीक मालूम होता है। नींद, रोग और प्रेम
में पड़ने की अवस्थाओं की जांच से सम्भवतः कभी भी अहम्-राग और आलम्बन-राग के
विभेद या राग और 'स्वहितों' के विभेद का पता नहीं चल सकता था, पर आप यह भूल
गए हैं कि हमने शुरू में क्या चीजें देखी थीं, जिनकी रोशनी में हम मानसिक
स्थितियों पर विचार कर रहे हैं। राग और स्वहितों में, यौन और आत्मसंरक्षण की
निसर्ग-वृत्तियों में विभेद करने की आवश्यकता हमें उस द्वन्द्व की जानकारी
होने पर, जिससे स्थानान्तर स्नायुरोग पैदा होते हैं, मजबूरन माननी पड़ती है।
आगे हमें इस विभेद को ध्यान में रखना होगा। यह धारणा ही कि आलम्बन-राग
अहम्-राग में परिवर्तित हो सकता है-दूसरे शब्दों में, कि हमें अहम्-राग से भी
वास्ता पड़ेगा-एकमात्र ऐसी धारणा प्रतीत होती है जो स्वरति-सम्बन्धी
स्नायुरोग कहलाने वाले रोगों-उदाहरण के लिए डेमेन्शिया प्रीकौक्स की पहेली
सुलझा सकती है, अथवा हिस्टीरिया और मनोग्रस्तताओं से उनके सादृश्यों और
असादृश्यों की सन्तोषजनक व्याख्या कर सकती है। इसके बाद हम उन बातों को रोग,
नींद और तीव्र प्रेम की दशा पर लागू करते हैं जिन्हें हमने इन अवस्थाओं में
असन्दिग्ध रूप में प्रमाणित पाया है। हम उनका किसी भी दिशा में प्रयोग कर
सकते हैं, और यह देख सकते हैं कि वे हमें कहां पहुंचाएंगी। जो एकमात्र
निष्कर्ष सीधे विश्लेषण सम्बन्धी अनुभव के आधार पर नहीं है, वह यह है कि राग
राग ही है, और राग ही रहता है, चाहे वह आलम्बनों से युक्त हो या स्वयं अहम्
से युक्त हो और वह कभी भी अहममूलक 'स्वहितों' में रूपान्तरित नहीं होता और
इसी तरह इसका उलटा भी समझिए। पर यह कथन यौन निसर्ग-वृत्तियों और अहम्
निसर्ग-वृत्तियों के भेद को, जिस पर पहले हमने आलोचनात्मक विचार किया है,
प्रकट करने का एक और तरीका है, और इस विभेद को हम और बातें खोज निकालने के
उद्देश्य से तब तक मानते रहेंगे जब तक कि वह निरर्थक सिद्ध न हो।
आपके दूसरे आक्षेप से भी एक उचित प्रश्न पैदा होता है, पर वह एक मिथ्या
नुक्ते की ओर जाता है। आलम्बन-राग का वापस खिंचकर अहम् में आ जाना निश्चित ही
रोगजनक नहीं है। यह सच है कि नींद शुरू होने से पहले हर रात यह बात होती है
और जागने पर उलटा प्रक्रम होता है। जीवद्रव्यीय (प्रोटोप्लाज़्मिक)
अणुप्राणी1 अपने उभारों को भीतर खींच लेता है, और अगली बार फिर उन्हें बाहर
निकाल देता है; पर जब कोई सुनिश्चित, बड़ा ज़बरदस्त प्रक्रम राग को अपने
आलम्बनों से हट आने के लिए मजबूर करता है, तब यह बिलकुल दूसरी ही बात होती
है। जो राग तब स्वरति वाला बन चका है, वह अब अपने आलम्बनों पर वापस नहीं लौट
सकता, और राग के मुक्त संचलन के रास्ते की यह रुकावट निश्चित रूप से रोगजनक
सिद्ध होती है। प्रतीत होता है कि एक निश्चित सतह से ऊपर स्वरतिक राग का संचय
असह्य हो जाता है। यह कल्पना सुसंगत होगी कि इसी कारण आलम्बनों को इसने
आच्छादित किया, कि अहम् को अपना राग इसलिए मजबूरन आगे भेजना पड़ा ताकि वह
इसके अतिसंचय से रोगी न हो जाए। यदि हमें डेमेन्शिया प्रीकौक्स रोग पर
विस्तार से विचार करना होता, तो मैं आपको यह स्पष्ट बताता कि जो प्रक्रम राग
को अपने आलम्बनों से अलग करता है और उसके फिर उन पर लौटने के मार्ग को रोकता
है, उसका दमन के प्रक्रम से निकट सम्बन्ध है, और उसे इसका एक दूसरी ओर का
हिस्सा ही समझना चाहिए। जो भी हो, पर जब आपने यह देखा कि इन प्रक्रमों को
जन्म देने वाली आरम्भिक अवस्थाएं, जहां तक हमें इस समय मालूम है वहां तक, दमन
के प्रक्रमों से प्रायः अभिन्न होती हैं, तब आपको अपना आधार कुछ परिचित भूमि
पर पता चलेगा। द्वन्द्व भी वही प्रतीत होता है, और वह उन्हीं दोनों बलों के
बीच चल भी रहा मालूम होता है, क्योंकि उदाहरण के लिए हिस्टीरिया के परिणाम की
अपेक्षा यहां परिणाम भिन्न है। इसलिए इसका कारण स्वभाव या मनोविन्यास में कोई
अन्तर ही हो सकता है। इन रोगियों में राग-परिवर्धन का दुर्बल स्थान परिवर्धन
की एक दूसरी ही कला में पाया जाता है; निर्णायक बद्धता जो आपको याद होगा,
लक्षण-निर्माण के प्रक्रम को शुरू करती है, एक दूसरे स्थान पर, सम्भवतः
प्राथमिक स्वरति की अवस्था में, होती है; जिस पर डेमेन्शिया प्रीकौक्स अन्त
में लौटता है। यह विशेष उल्लेखनीय बात है कि स्वरतिक स्नायु-रोगों के लिए
हमें राग के बद्धता-बिन्दु परिवर्धन की उन कलाओं पर मानने पड़ते हैं, जो
हिस्टीरिया या मनोग्रस्तता-रोग की कलाओं से बहत पहले होती हैं, पर आप सुन
चुके हैं कि स्थानान्तरण स्नायु-रोगों के अध्ययन से हम जिन अवधारणाओं पर
पहुंचे हैं, वे हमें स्वरतिक स्नायु-रोगों के स्पष्टीकरण में भी, जो
व्यवहारतः बहुत अधिक तीव्र होते हैं, सहायक होती हैं। उन दोनों में बहुत अधिक
सादृश्य है। आधारतः वे एक ही वर्ग की घटनाएं हैं। आप कल्पना कर सकते हैं कि
इन रोगों की (जो असल में मनश्चिकित्सा का विषय हैं), स्थानान्तरण
स्नायु-रोगों का विश्लेषण से प्राप्त ज्ञान न होने पर, व्याख्या करने की
कोशिश करना कितना व्यर्थ कार्य है।
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1. Animalcule
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