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विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
हमारे आगे बढ़ने के रास्ते में इसके अलावा और भी कठिनाइयां हैं। स्वरतिक रोग
और उनसे सम्बन्धित मनोरोग की गुत्थी स्थानान्तरण स्नायु-रोगों के विश्लेषण की
दीक्षा पाए हुए प्रेक्षकों द्वारा ही सुलझाई जा सकती है। पर हमारे
मनश्चिकित्सक मनोविश्लेषण का अध्ययन नहीं करते और हम मनोविश्लेषकों को
मनश्चिकित्सा के रोगी बहुत कम दिखाई देते हैं। हमें ऐसे मनश्चिकित्सक पैदा
करने होंगे जिन्होंने अपने कार्य की तैयारी के रूप में मनोविश्लेषण की दीक्षा
पाई हो। इस दिशा में एक प्रयत्न अमेरिका में किया जा रहा है। यहां अनेक
प्रमुख मनश्चिकित्सक मनोविश्लेषण पर अपने छात्रों को व्याख्यान देते हैं, और
संस्थाओं और आश्रमों के अध्यक्ष डाक्टर अपने रोगियों को इस सिद्धान्त के
प्रकाश में देखने की कोशिश करते हैं। फिर भी हमें स्वरति की दीवार के ऊपर से
झांकने का मौका मिला है और अब मैं आपको वे बातें बताऊंगा जो मैं समझता हूं कि
हमने इस दिशा में नई पता लगाई हैं।
मौजूदा मनश्चिकित्सा ने वर्गीकरण करने के जो यत्न किए हैं, उनमें पैरानोइआ
रोग की, जो 'सिस्टेमैटिक इन्सैनिटी, अर्थात् व्यवस्थित पागलपन का जीर्ण1 रूप
है, स्थिति बड़ी अनिश्चित है; पर इसमें कोई सन्देह नहीं कि डेमेन्शिया
प्रीकौक्स से उसका नज़दीकी सम्बन्ध है। मैंने तो बल्कि यह प्रस्ताव किया है
कि इन दोनों को मिलाकर पैराफ्रेनिया कहना चाहिए। पैरानोइआ के रूपों का वर्णन
भ्रम की वस्तु के अनुसार किया जाता है; उदाहरण के लिए महानता2 का भ्रम, सताए
जाने का भ्रम, ईर्ष्या का भ्रम, प्रेमपात्रता का भ्रम (ऐरोटामैनिया) इत्यादि
: हम यह आशा नहीं करते कि मनश्चिकित्सा इनकी व्याख्या करने की कोशिश करेगी।
उदाहरण के लिए, मैं उस प्रयत्न का उल्लेख करूंगा जो इनमें से एक लक्षण को
दूसरे से निकालने या व्युत्पन्न करने के लिए बौद्धिक समीकरण1 द्वारा किया गया
था : जिस रोगी में अपने-आपको सताया गया मानने की प्राथमिक प्रवृत्ति होती है,
वह इससे यह निष्कर्ष निकालता है कि वह अवश्य ही बहुत महत्त्वपूर्ण व्यक्ति
है, और इसलिए उसमें महानता का भ्रम पैदा हो जाता है। हमारे विश्लेषणीय अवधारण
के साथ महानता का भ्रम आलम्बनों को आच्छादन से खींचे गए राग द्वारा अहम् के
फुलाव का सीधा परिणाम होता है, और पहले वाले शुरू के शैशवीय रूप के वापस आ
जाने से एक परवर्ती स्वरति आरम्भ हो जाती है। पर सताए जाने के भ्रमों के
रोगियों में हमें जो चीजें दिखाई दीं, उन्हें पकड़कर हम कुछ दूर चल सके।
प्रथम तो हमने यह देखा कि अधिकतर उदाहरणों में सताने वाला और सताए जाने वाले
व्यक्ति दोनों एक ही लिंग के होते हैं। यह सच है कि इसकी हानिरहित व्याख्या
की जा सकती है; पर कुछ अवस्थाओं में, जिनका बारीकी से अध्ययन किया गया, यह
पता चला कि उसी लिंग का वह व्यक्ति ही, जो रोगी के प्रकृत होने पर उसे सबसे
अधिक प्रिय था, रोग पैदा हो जाने के बाद सताने वाला बन गया। इससे इसका एक और
परिवर्धन साहचर्य के सुविदित तरीकों से सम्भव हो जाता है, जिससे एक प्रिय
व्यक्ति के स्थान पर कोई दूसरा व्यक्ति ले आया जाता है। उदाहरण के लिए, पिता
के स्थान पर मालिक या सत्तारूढ़ व्यक्ति ले आए जाते हैं। इन प्रेक्षणों से,
जिनकी बीच-बीच में लगातार पुष्टि होती रही, हमने यह निष्कर्ष निकाला कि सताने
का भ्रमोन्माद या परसिक्यूटरी पैरानोइआ के द्वारा व्यक्ति अपने-आपको समकामी
आवेग से, जो बहुत प्रबल हो गया है, बचाता है। अनुरागपूर्ण भावना का घृणा में
परिवर्तन, जैसा कि सुविदित है, प्रेम और घृणा के आलम्बन के जीवन का गम्भीर
खतरा बन सकता है, तब रागात्मक आवेगों के चिन्ता में परिवर्तन का संवादी है,
जो कि दमन के प्रक्रम का नियत परिणाम होता है। इसके दृष्टान्त के लिए मैं इस
तरह के उस रोगी का मामला पेश करता हं. जो मेरे सामने आया था। एक तरुण डाक्टर
को अपने रहने की जगह से इसलिए दूर भेजना पड़ा, क्योंकि उसने एक प्रोफेसर के
पुत्र के जीवन को, जो पहले उसका सबसे बड़ा दोस्त था, खत्म करने की धमकी दी
थी। वह कहता था कि इस दोस्त में अमानुषी शक्तियां हैं, और मेरे प्रति बहुत
बुरे इरादे हैं। हाल के वर्षों में रोगी के परिवार पर जो विपत्तियां आई थीं,
और उसे सार्वजनिक और निजी जीवन में जो बुरे दिन देखने पड़े थे, सबके लिए वह
उसे ही दोषी ठहराता था। पर इतनी ही बात नहीं थी। उस दुष्ट दोस्त और उसके
प्रोफेसर पिता ने ही युद्ध कराया था, और रूसियों को सीमा पर बुलाया था। उसने
हज़ारों तरह से उसके जीवन को बर्बाद किया था। हमारे रोगी का यह निश्चय था कि
इस बदमाश की मौत से दुनिया की सब बुराई दूर हो जाएगी; फिर भी उसके प्रति उसका
पुराना प्रेम इतना प्रबल था कि जब उसे अपने शत्रु को सामने देखकर गोली मारने
का मौका आया, तब वह निष्क्रिय हो उठा। रोगी से मेरी जो थोड़ी बातचीत हुई,
उससे यह पता चला कि इन दोनों व्यक्तियों की यह घनिष्ठ मैत्री उसके स्कूल के
दिनों से चली आती थी; कम-से-कम एक मौके पर यह मित्रता की सीमाओं का उल्लंघन
कर गई थी। उन्होंने एक रात इकट्ठे बिताई थी, और इस अवसर पर पूर्ण सम्भोग किया
था। रोगी में स्त्रियों के प्रति कभी कोई ऐसी भावना नहीं पैदा हुई थी, जो उस
आयु में ऐसे आकर्षक व्यक्तित्व वाले आदमी में पैदा होनी स्वाभाविक थी। उसका
एक सुन्दर और अच्छे घराने की लड़की से वचनबन्ध (सगाई से पहले बातचीत तय होना)
हुआ था, पर उसने इस कारण उस बन्धन को तोड़ दिया कि उसका प्रेमी उसके प्रति
बहुत उदासीन था। वर्षों बाद उसका रोग ठीक उस समय शुरू हुआ, जबकि वह पहली बार
एक स्त्री को पूर्ण यौन परितुष्टि देने में सफल हुआ था। जब उसने कृतज्ञता और
प्रेम के आवेश में उसे अपनी बाहुओं में भर लिया, तब इसे एकाएक यह अनुभव हुआ
कि मेरे सिर के चारों ओर तेज़ चाकू की धार-सी चल रही है और पीड़ाकारक रहस्यमय
घाव हो गया है। बाद में उसने इस संवेदन को दिमाग को नंगा करने के लिए
पोस्टमार्टम, अर्थात् मरणोत्तर कार्य के समय किए जाने वाले कटाव जैसा बताया
और चूंकि उसका मित्र रोग-शरीर-शास्त्री, या पैथोलोजिकल ऐनेटोमिस्ट था, इसलिए
वह धीरे-धीरे इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि उसने इस औरत को प्रलोभन के रूप में
भेजा होगा। बाद में उन दूसरी बातों के विषय में उसकी आंखें खुलने लगीं, जिनके
द्वारा उसके पुराने दोस्त ने उसे सताया था।
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1. Chornic
2. Grandeur
3. Intellectual rationalization
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