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विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
पर उन उदाहरणों का क्या होगा जिनमें सताने वाला सताए जाने वाले से भिन्न लिंग
का है और इसलिए जिनसे इस रोग के विषय में हमारी इस व्याख्या का खण्डन होता
दिखाई देता है कि यह समकामी राग से बचाव है। कुछ समय पहले मुझे इस तरह के
रोगी की जांच करने का मौका मिला और ऊपर दिखाई देने वाले विरोध या खण्डन के
पीछे मझे उसकी पष्टि होती हई मिली। एक नौजवान लडकी यह समझती थी कि एक आदमी,
जिसके साथ वह दो बार घनिष्ठ सम्बन्ध कर चुकी थी, उसे सताता था। असल में पहले
उसका भ्रम एक स्त्री के विरुद्ध था जिसे माता का स्थानापन्न समझा जा सकता है।
उस आदमी के साथ दूसरी बार मिलने के बाद ही उसने भ्रमात्मक मनोबिम्ब को स्त्री
से पुरुष पर स्थानान्तरित किया। इस प्रकार इस उदाहरण में भी यह पूरी होती है
कि सताने वाला उसी लिंग का है, जिसका सताया जाने वाला है। वकील और डाक्टर से
शिकायत करते हुए रोगिणी ने अपने भ्रम की पहले वाली कला की चर्चा नहीं की थी,
और इससे पैरानोइया के बारे में हमारे सिद्धान्त का खण्डन होता दिखाई देता था।
आलम्बन का समकालीन चुनाव आरम्भ में, विषयकामी चुनाव की अपेक्षा, स्वरति से
अधिक नजदीकी सम्बन्ध रखता है। इसलिए जब कोई प्रबल नापसन्द समकामी उत्तेजन
प्रत्याख्यात अर्थात् अस्वीकृत होता है, तब उससे स्वरति पर पहुंचने का रास्ता
पा लेना विशेष रूप से आसान है। इन व्याख्यानों में मुझे अब तब यह बताने का
कोई मौका नहीं मिला कि जहां तक हम जानते हैं, वहां तक जीवन में प्रेम-आवेग का
मार्ग जिस आधारभूत रूपरेखा पर खड़ा है वह क्या है और न मैं अब इस विषय पर
विशेष कुछ कह सकता हूं। मैं सिर्फ इतनी वात आपसे कहता हूं कि आलम्बन का
चुनाव, जो स्वरति की अवस्था के बाद राग के परिवर्धन में अगला कदम है, दो
प्ररूपों के अनुसार आगे बढ़ सकता है-या तो वह स्वरतिक प्ररूप होता है, जिसके
अनुसार स्वयं अहम् के स्थान पर इससे यथासम्भव अधिक-से-अधिक मिलता-जुलता कोई
व्यक्ति आलम्बन के रूप में ग्रहण कर लिया जाता है, या एनेक्लीटिक प्ररूप
(Anlehnungstypus)1, जिसमें राग भी उन्हीं व्यक्तियों को आलम्बन के रूप में
चुनता है जो जीवन में आदिम आवश्यकताओं की सन्तुष्टि करने के कारण प्रिय बन गए
हैं। आलम्बन-चुनाव के स्वरतिक प्ररूप पर प्रबल रागबद्धता भी व्यक्त समकामियों
के स्वभाव का एक गुण होता है।
आपको याद होगा कि इस सत्र के अपने पहले व्याख्यान में मैंने एक स्त्री की
भ्रमात्मक ईर्ष्या का एक उदाहरण दिया था। अब जबकि हम अपने अध्ययन को प्रायः
समाप्त करने वाले हैं आप निश्चित ही यह जानना चाहेंगे कि मनोविश्लेषण भ्रम की
क्या व्याख्या करता है, परन्तु जितनी आप आशा करते हैं उससे बहुत कम बात मैं
आपको बता सकता हूं। मनोग्रस्तताओं की तरह भ्रमों के भी तार्किक युक्तियों और
वास्तविक अनुभव से अप्रभावित रहने की व्याख्या उस सम्बन्ध-सूत्र के द्वारा ही
की जाएगी जो उनमें और उस अचेतन सामग्री में होता है जो भ्रम या मनोग्रस्तता
द्वारा अभिव्यक्त भी होती है और रोककर भी रखी जाती है। इन दोनों में जो अन्तर
हैं उनका आधार इन दोनों रोगों के स्थानवृत्तीय और गतिकीय अन्तर हैं।
पैरानोइया की तरह मैलांकोलिया अर्थात् उदासी रोग (प्रसंगतः यह कह देना अनुचित
न होगा कि इस रोग के अन्तर्गत बड़े भिन्न प्रकार के रोग-प्ररूप रखे गए हैं)
की भी भीतरी रचना की कुछ झांकी प्राप्त करना सम्भव हुआ है। हमने देखा है कि
ये रोगी अपने-आपको जिस निर्दयता से फटकारते हैं, वह असल में दूसरे व्यक्ति से
सम्बन्ध रखती है, अर्थात् वह उस यौन आलम्बन से सम्बन्ध रखती है जो नष्ट हो
गया है, या जिसे उन्होंने किसी दोष के कारण पसन्द करना बन्द कर दिया है। इससे
हमने यह नतीजा निकाला है कि असल में उदासी रोगी ने अपना राग आलम्बन से हटा
लिया है, पर एक ऐसे प्रक्रम द्वारा, जिसे हम 'स्वरतिक अभिन्नीकरण2 कहेंगे।
उसने अहम् के भीतर ही आलम्बन को स्थापित कर लिया है, और इसे अहम पर
प्रक्षेपित कर दिया है। मैं आपको यह प्रक्रम की वर्णनात्मक रूपरेखा ही दे
सकता हूं, स्थानावृत्त और गतिकी की शब्दावली में इसकी रूपरेखा नहीं पेश कर
सकता। तब स्वयं अहम् से इस तरह व्यवहार किया जाता है, मानो वह त्यागा हुआ
आलम्बन हो। उसे बदले और आक्रमण का वह सारा व्यवहार सहना पड़ता है जो आलम्बन
के उद्देश्य से होता है। उदासी रोगियों के आत्महत्या के आवेग भी यह मानने पर
अधिक स्पष्ट हो जाते हैं कि रोगी का मन जो कटुता अनुभव करता है, उसका
सम्बन्ध प्रेम और घृणा के आलम्बनों में भी उसी समय और उतना ही होता है जिस
समय और जितना अहम् से। दूसरे स्वरतिक विकारों की तरह उदासी रोग में भी
भाव-जीवन की विशेषता, जिसे ब्लूलर के अनुसार हम उभयकता या ऐम्बीवैलेन्स कहते
हैं, विशेष रूप से सामने आती है। इसका अर्थ यह है कि एक ही व्यक्ति के प्रति
विरोधी भावनाएं (अनुरागपूर्ण और शत्रुतापूर्ण) होती हैं। बदकिस्मती से मैं इन
व्याख्यानों में उभयता पर अधिक कुछ नहीं कह सका।
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1. यह शब्द इस बात का निर्देश करता है कि यौन वृत्तियां अपने प्रथम आलम्बन के
लिए आत्मसंरक्षण की निसर्ग-वृत्तियों पर, अर्थात् रतन्य पिलाने वाली माता पर,
निर्भर हैं।
-अंग्रेजी अनुवादक
2. Narcissistic identification
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