|
विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
|
286 पाठक हैं |
||||||
‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
पर अब हमें इलाज के प्रक्रम के बारे में अपने पहले वाले गतिकीय अवधारण को सही
करना होगा, और नई खोज के साथ इसका मेल बिठाना होगा। जब रोगी को प्रतिरोधों के
साथ, जो हमने विश्लेषण द्वारा उसमें पता लगाए हैं, प्रकृत द्वन्द्व में जूझना
पड़ता है, तब उसे स्वास्थ्य-लाभ की ओर ले जाने वाले हमारे सोचे हुए निश्चय की
ओर धकेलने के लिए एक प्रबल नोदक (या धकेलने वाले) बल की आवश्यकता होती है;
अन्यथा, हो सकता है कि वह पिछले परिणाम की पुनरावृत्ति करने का ही फैसला कर
ले और जो चीज़ उठकर चेतना में आ गई थी, उसे फिर दमन के प्रभाव में सरक जाने
दे। इस द्वन्द्व का परिणाम उसकी बौद्धिक अन्तर्दृष्टि से तय नहीं होगा-ऐसे
कार्य की सिद्धि के लिए न तो यह काफी प्रबल है और न काफी मुक्त-बल्कि
चिकित्सक के साथ उसके सम्बन्ध से और सिर्फ इस सम्बन्ध से ही निर्धारित होगा।
जहां तक उसका स्थानान्तरण धनात्मक है, वहां तक यह चिकित्सक को अधिकारयुक्त
करता है, अपने-आपको उसकी खोजों और उसके विचारों में श्रद्धा के रूप में बदल
लेता है। इस तरह का स्थानान्तरण या ऋणात्मक स्थानान्तरण न हो तो चिकित्सक और
उसकी युक्तियों की ओर रोगी कान भी नहीं देगा। श्रद्धा अपने जन्म का इतिहास
दोहराती है। वह प्रेम से पैदा होती है और शुरू में इसे किन्हीं दलीलों की
आवश्यकता नहीं होती। बहुत बाद में यह दलीलों की ओर ध्यान देती है, पर उन पर
आलोचनात्मक विचार तभी करती है जब वे किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा पेश की गई हों
जो प्रिय है। इस सहारे के न होने पर रोगी के लिए दलीलों का कोई महत्त्व नहीं
होता, और जीवन में भी अधिकतर लोगों के लिए उनका कोई महत्त्व नहीं होता। इसलिए
मनुष्य की बुद्धि पर भी वहीं तक असर डाला जा सकता है जहां तक वह आलम्बनों को
राग से आच्छादित करने में समर्थ है, और हमें समझ-बूझकर यह आशंका करनी चाहिए
कि उसकी स्वरति की मात्रा उस पर विश्लेषण की सर्वोत्तम विधि का प्रभाव पड़ने
में भी रुकावट बनेगी।
आलम्बन-आच्छादान में दूसरे व्यक्तियों के प्रति राग को विकीर्ण करने की
क्षमता निस्सन्देह सब प्रकृत लोगों में मौजूद मानी जा सकती है। तथाकथित
स्नायुरोगों की स्थानान्तरण की प्रवृत्ति एक व्यापक विशेषता का अपवाद रूप से
होने वाला तीव्र रूप मात्र है। यदि इतने महत्त्व के और व्यापक मानवीय
चरित्र-गुण को कभी न देखा गया होता और उसका उपयोग न किया गया होता तो यह बड़ी
विचित्र बात होती, और इसे सचमुच देखा गया है। बर्नहीम ने बड़े सही और स्पष्ट
विचार द्वारा सम्मोहन-सम्बन्धी व्यक्त रूपों का सिद्धान्त इसी उपपत्ति पर
खड़ा किया कि सब मनुष्य कम या अधिक मात्रा में आदेश के वशीभूत हो जाते हैं,
वे 'आदेशवश्य' होते हैं। जिसे उसने आदेशवश्यता कहा था, वह स्थानान्तरण की
प्रवृत्ति के अलावा और कुछ नहीं है, पर उसे बहुत तंग दायरे में रखने पर यह
बात सच है कि ऋणात्मक स्थानान्तरण इसके क्षेत्र के भीतर नहीं आता। पर बर्नहीम
यह कभी नहीं बता सका कि आदेश वास्तव में क्या हैं, या वे कैसे पैदा होते हैं।
उसके लिए यह एक स्वयंसिद्ध तथ्य था और इसके पैदा होने की वह कोई व्याख्या
नहीं कर सकता था। वह यह नहीं पहचान पाया कि 'आदेशवश्यता' यौनवृत्ति पर राग के
कार्य करने पर निर्भर है, और हमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि हमने अपनी
विधियों में सम्मोहन का त्याग करके स्थानान्तरण के रूप में आदेश को फिर खोज
लिया है।
पर अब मैं ज़रा रुककर आपको सूत्र पकड़ने का मौका देता हूं। मैं देख रहा हूं
कि आपके विचारों में एक आक्षेप इतनी प्रबलता से घूम रहा है कि यदि उसे प्रकट
न किया गया तो वह ध्यान केन्द्रित करने की आपकी सारी शक्ति छीन लेगा। 'अब, इस
प्रकार अन्त में आपने यह मान लिया कि आप भी सम्मोहकों की तरह आदेश की सहायता
लेते हैं। हम तो सारे समय यही समझते रहे हैं। पर फिर, गुज़रे हुए अनुभवों के
द्वारा इन सब चक्करदार रास्तों का, अचेतन सामग्री को खोजने, विपर्यासों को
निर्वचन करने और उन्हें फिर अनुवादित करने का, और समय, मेहनत और धन का इतना
भारी खर्च करने का, क्या लाभ, जब अन्त में असली कार्यकारी सधान आदेश ही हैं?
आप लक्षणों के विरुद्ध सीधे आदेश ही क्यों नहीं देते, जैसा कि दूसरे लोग कहते
हैं, जो ईमानदारी से अपने आपको सम्मोहक बताते हैं। और इसके अतिरिक्त, यदि आप
यह कहते हैं कि इन चक्करदार रास्तों के द्वारा आपने अनेक महत्त्वपूर्ण खोजें
की हैं, जो सीधे आदेश में छिपी रहती हैं, तो उनकी प्रामाणिकता की पुष्टि कौन
करेगा? क्या वे भी आदेश का, अर्थात् अनभिप्रेत आदेश का, परिणाम नहीं हैं?
क्या आप रोगी पर इस दिशा में भी मनचाहा प्रभाव नहीं डालते?'
इस तरह आप मुझ पर जो आरोप लगाते हैं, वह बहुत अधिक मनोरंजक है, और उसका जवाब
देना होगा, पर वह मैं आज नहीं दूंगा। हमारा समय पूरा हो गया है, इसलिए अगली
बार सही। आप देखेंगे कि मैं आपकी आपत्ति का उत्तर दे सकंगा। आज मुझे एक बात
खत्म करनी है, जो मैंने शुरू की थी। मैंने स्थानान्तरण के कारण के ज़रिये
आपके सामने यह व्याख्या करने का वायदा किया था कि स्वरति-सम्बन्धी
स्नायु-रोगों में हमारे चिकित्सा के प्रयत्न सफल क्यों नहीं होते।
वह व्याख्या मैं थोड़े-से शब्दों में कर सकता हूं और आप देखेंगे कि कितनी
सरलता से पहेली हल हो जाती है, और हर चीज़ कैसे एक-दूसरे के साथ सम्बद्ध हो
जाती है। अनुभव से पता चलता है कि स्वरतिक स्नायु-रोगों के पीड़ित
स्नायुरोगियों में स्थानान्तरण की क्षमता नहीं होती, या इसका नाकाफी अंश होता
है। वे उदासीन भाव से चिकित्सक से विमुख हो जाते हैं, विरोधी भाव से नहीं।
इसलिए चिकित्सक का उन पर प्रभाव नहीं पड़ सकता। चिकित्सक जो कुछ कहता है,
उससे वे उदासीन रहते हैं; उन पर उसकी कोई छाप नहीं पड़ती और इसलिए इलाज का
प्रक्रम, जो दूसरी बातों के, अर्थात् रोगजनक द्वन्द्व के पुनरुज्जीवन और दमन
के कारण होने वाले प्रतिरोध को दर करने के साथ-साथ चल सकता है. उनके साथ नहीं
चलाया जा सकता। ये जैसे हैं, वैसे ही रहते हैं। उन्होंने बहुत बार अपने आप
स्वास्थ्य-लाभ के प्रयत्न किए हैं, जिनसे रागात्मक परिणाम पैदा हुए हैं। हम
इसे बदलने के लिए कुछ नहीं कर सकते।
इन रोगियों की रोग-परीक्षा के आधार पर हमने कहा था कि उन्होंने राग से
आलम्बनों का आच्छादन अवश्य त्याग दिया होगा और आलम्बन-राग को अहम्-राग में
रूपान्तरित कर दिया होगा। इसके द्वारा, हमने उनमें स्नायु-रोगों के प्रथम
समूह (हिस्टीरिया, चिन्ता और मनोग्रस्तता) के रोगियों से अन्तर किया था।
उन्हें स्वस्थ करने की कोशिश के समय उनका जो व्यवहार दिखाई देता है, उससे इस
सन्देह की पुष्टि होती है। वे कोई स्थानान्तरण नहीं पैदा करते और इसलिए हम उन
तक नहीं पहुंच सकते और उनका इलाज नहीं कर सकते।
|
|||||








