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मनोविश्लेषण

सिगमंड फ्रायड

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :392
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8838
आईएसबीएन :9788170289968

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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद


व्याख्यान

28

विश्लेषण-चिकित्सा

आज हम जिस बात पर विचार करने वाले हैं, उसका आपको पता है। मैंने यह स्वीकार किया कि मनोविश्लेषण-चिकित्सा के प्रभाव का अनिवार्य आधार स्थानान्तरण, अर्थात् आदेश हैं, तब आपने मुझसे पूछा था कि हम सीधे ही आदेश का प्रयोग क्यों नहीं करते, और आपने यह सन्देह भी पेश किया था कि जब आदेश इतना बड़ा कार्य करता है, तब भी क्या हम अपनी मनोवैज्ञानिक खोजों की आलम्बननिष्ठता या वैज्ञानिकता का समर्थन कर सकते हैं? मैंने इसका पूरा उत्तर देने का आपसे वायदा किया था।

सीधा आदेश वह आदेश है, जो लक्षणों द्वारा ग्रहण किए गए रूपों के विरुद्ध सीधे ही दिया जाता है। यह आपकी सत्ता और रोग की तह में मौजूद प्रेरक भावों के बीच में एक द्वन्द्व है। इस द्वन्द्व में आप इन प्रेरक भावों के बारे में कछ नहीं सोचते। आप सिर्फ यह आवश्यक समझते हैं कि रोगी लक्षणों के रूप में उनके व्यक्त होने को दबा दे। मुख्यतः इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप रोगी को सम्मोहित करते हैं या नहीं। बनेहीम ने बड़े जोरदार शब्दों में बार-बार कहा था कि आदेश सम्मोहन के व्यक्त रूपों का सार तत्त्व है, और सम्मोहन स्वयं आदेश का परिणाम है, एक आदेशित अवस्था है। वह जाग्रत् अवस्था में आदेश का प्रयोग करना पसन्द करता था, जिससे सम्मोहन में वही परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।

तो, अब मैं अनुभव के परिणामों पर पहले विचार करूं या सिद्धान्त-सम्बन्धी विवेचनाओं पर? हम अनुभव से शुरू करेंगे। मैंने 1889 में नान्सी में बर्नहीम को जा पकड़ा, और मैं उसका शिष्य बन गया। मैंने उसकी आदेश वाली पुस्तक का जर्मन भाषा में अनुवाद किया। वर्षों तक मैं सम्मोहन द्वारा इलाज करता रहा। पहले तो मैं प्रतिषेधात्मक आदेशों द्वारा और बाद में ब्रायर की, रोगी के जीवन के बारे में पूरी जांच करने की प्रणाली को मिलाकर इलाज करता रहा। इसलिए सम्मोहन-चिकित्सा या आदेश द्वारा चिकित्सा के परिणामों के बारे में विस्तृत आधार पर बोल सकता हूं। एक पुरानी डाक्टरी कहावत के अनुसार, आदर्श चिकित्सा-शैली शीघ्र कार्य करने वाली, भरोसा करने योग्य, और रोगी को प्रिय लगने वाली होनी चाहिए। बर्नहीम की विधि से इसकी दो बातें निश्चित रूप से पूरी होती थीं। यह बहुत शीघ्र, अर्थात् विश्लेषण-चिकित्सा की अपेक्षा बहुत ही अधिक शीघ्र कार्य करती थी और इसमें रोगी को किसी परेशानी या दुविधा में नहीं पड़ना पड़ता था। चिकित्सक के लिए यह अन्त में नीरस हो जाती थी। इसका मतलब यह था कि हर रोगी का एक ही तरीके से इलाज किया जाए। बड़े भिन्न-भिन्न प्रकार के लक्षणों को रोकने के लिए सब कार्य सदा वैसे ही किए जाएं और उनके अर्थ या आशय के बारे में कुछ भी न जाना जा सके। यह एक तरह का यान्त्रिक कार्य था, वैज्ञानिक कार्य नहीं। इससे जादू, मन्त्रतन्त्र और झाड-फंक का स्मरण होता था, पर तब भी रोगी के हित की दृष्टि से उसकी ओर आंख मूंदनी पड़ती थी। पर तीसरी बात इसमें नहीं थी। यह किसी भी दृष्टि से भरोसा करने योग्य नहीं थी। इसका उपयोग कुछ रोगियों में ही हो सकता था, सबमें नहीं। कुछ रोगियों में इससे बड़ी सफलता मिल जाती थी, और कुछ में कुछ भी सफलता नहीं मिलती थी, और इसका कारण कभी पता नहीं चलता था। पर इससे भी बुरी बात यह थी कि इसके परिणामों में स्थायित्व नहीं था। कुछ समय के बाद रोगी फिर आकर कहता था कि-रोग फिर दुबारा हो गया है, या उसके स्थान पर कोई और रोग हो गया है। तब आप उसे फिर सम्मोहित करना शुरू कर सकते हैं। साथ ही, आपको अनुभवी लोगों की यह चेतावनी भी ध्यान में रखनी थी कि बार-बार सम्मोहन करके रोगी से उसकी स्वतन्त्रता छीनना उचित नहीं, और उसे इस इलाज की आदत डाल देना ठीक नहीं, मानो यह कोई नींद लाने वाली दवा हो। उधर, यह भी सच है कि कभी-कभी सब चीज़ हमारे मन के अनुकूल हो जाती थी। मामूली परिश्रम से पूर्ण और स्थायी सफलता मिल जाती थी। पर इस सन्तोषजनक परिणाम की अवस्थाएं छिपी रहती थीं। एक रोगिणी में मैंने थोड़े-से सम्मोहन के इलाज द्वारा एक उग्र अवस्था को पूरी तरह दूर कर दिया, पर जब रोगिणी ने बिना उचित कारण के मेरे प्रति दुर्भाव अपनाया, तब वह रोग फिर उसी रूप में हो गया। तब आपसी समझौते के बाद मैंने फिर उसे और अधिक पूरी तरह दूर कर दिया। पर जब वह दूसरी बार मेरी विरोधी बनी, तब वह रोग फिर पैदा हो गया। एक और अवसर पर मुझे यह अनुभव हुआ। रोगिणी ने, जिसके स्नायविक लक्षण मैं कई बार दूर कर चुका था, एक विशेषरूप से जमे हुए रोग के इलाज के समय, एकाएक अपनी भुजाएं मेरी गरदन में डाल दीं। मैं चाहूं या न चाहूं, पर इस तरह की चीज़ ने अन्त में यह अनिवार्य कर दिया कि मैं अपने आदेश देने के अधिकार की प्रकृति और स्रोत की समस्या की जांच करूं।

इतनी बात तो अनुभव के बारे में हुई। इससे पता चलता है कि सीधे आदेश का त्याग करके हमने कोई ऐसी चीज़ नहीं त्याग दी, जिसके स्थान पर कोई और चीज़ न आ सकती हो। अब इन तथ्यों के साथ कुछ बातें और जोड़नी हैं। सम्मोहन की विधि का प्रयोग होने पर रोगी को और चिकित्सक को कुछ भी प्रयत्न नहीं करना पड़ता। यह विधि अधिकतर डाक्टरों द्वारा स्नायु-रोगों के बारे में माने जाने वाले आम विचार से पूरी तरह मेल खाती है। डाक्टर स्नायविक व्यक्ति से कहते हैं, 'आपमें कोई रोग नहीं है। यह सिर्फ स्नायविकता है, इसलिए मेरे कुछ शब्दों से ही पांच मिनट में आपके सब कष्ट दूर हो जाएंगे। पर यह बात ऊर्जा के बारे में हमारे साधारण विश्वासों के विरुद्ध है, कि बहुत थोड़ा प्रयास किसी भारी बोझ को, बिना किसी उपयुक्त साधन की सहायता के, सीधे ही जाकर हटा सकता है। जहां तक दोनों परिस्थितियों की तुलना हो सकती है, वहां तक अनुभव से पता चलता है कि यह तिकड़म स्नायु-रोगों में सफल नहीं हो सकती। पर मैं जानता हूं कि यह युक्ति अकाट्य नहीं है। विस्फोटों जैसी चीजें भी होती हैं।

मनोविश्लेषण के द्वारा हमने जो जानकारी हासिल की है, उसे देखते हए सम्मोहन के मनोविश्लेषण के आदेशों के भेद का इन शब्दों में वर्णन किया जा सकता है : सम्मोहन-चिकित्सा-शैली मन में चल रही बात को ढकने को जैसे मानो उस पर पोचा फेरने की कोशिश करती है, और विश्लेषण की शैली उसे उघाड़ने की और कुछ चीज़ हटाने की कोशिश करती है : पहली, अर्थात् सम्मोहन की शैली प्रसाधन करती है, और विश्लेषण की शैली शल्यक्रिया। सम्मोहन-शैली आदेश का उपयोग लक्षणों को रोकने में करती है; यह दमनों को और ताकत देती है; पर इतने काम के अलावा, उन सब प्रक्रमों को जैसे का तैसा छोड़ देती है, जिनसे लक्षण-निर्माण हुआ है। विश्लेषण-चिकित्सा-शैली नीचे गहराई में रोग की जड़ों के पास उन द्वन्द्वों में पहुंचती है जिनसे लक्षण पैदा होते हैं। यह आदेश का उपयोग उन द्वन्द्वों के परिणाम को बदलने में करती है। सम्मोहन-चिकित्सा-शैली रोगी को निष्क्रिय और अपरिवर्तित रहने देती है, और इसलिए वह रोग के प्रत्येक नये उत्तेजन के सामने असहाय होता है। विश्लेषण के इलाज में चिकित्सक की तरह रोगी को भी प्रयास करना पड़ता है, अर्थात् भीतरी प्रतिरोधों को खत्म करने के लिए उद्योग करना पड़ता है। इन प्रतिरोधों को दूर कर देने पर रोगी का मानसिक जीवन स्थायी रूप से बदल जाता है। वह परिवर्धन की अधिक ऊंची सतह पर उठ आता है और रोग की नई सम्भावनाओं से अप्रभावित बना रहता है। प्रतिरोधों को दूर करने का परिश्रम विश्लेषण-चिकित्सा का आवश्यक कार्य है। रोगी को इसे पूरा करना पड़ता है और चिकित्सक उसे आदेशों द्वारा, जो शिक्षण के रूप में होते हैं, इसे पूरा करने में सहायता देता है। इसलिए यह ठीक कहा गया है कि मनोविश्लेषण द्वारा इलाज एक प्रकार का पुनः शिक्षण है।

मुझे आशा है कि आदेश का चिकित्सा में उपयोग करने की हमारी विधि में और सम्मोहन-चिकित्सा-शैली में इसका प्रयोग करने की एकमात्र विधि में जो अन्तर है, वह मैंने आपके सामने स्पष्ट कर दिया है। क्योंकि हमने आदेश का प्रभाव पीछे की ओर जाकर स्थानान्तरण तक देखा है, इसलिए आप यह भी समझ गये होंगे कि सम्मोहन-चिकित्सा-शैली में परिणाम इतना अविश्वसनीय क्यों होता है, और विश्लेषण-चिकित्सा-शैली, अपनी सीमाओं के अन्दर, क्यों भरोसे योग्य है। सम्मोहन का प्रयोग करते हुए हमें पूरी तरह रोगी के स्थानान्तरण की दशा पर निर्भर रहना पड़ता है, और फिर भी हम इस दशा पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकते। जिस रोगी को सम्मोहित किया जा रहा है, उसका स्थानान्तरण ऋणात्मक भी हो सकता है, या उभयात्मक भी हो सकता है, जैसा कि आमतौर पर होता है; या हो सकता है कि उसने विशेष रुख अपनाकर अपने स्थानान्तरण से अपने को बचाए रखा हो। इस सबके बारे में हमें कुछ पता नहीं चलता। मनोविश्लेषण में हम स्वयं स्थानान्तरण पर विचार करते हैं। जो कुछ इसके मार्ग में बाधक होता है, उसे हटा देते हैं, और जिस साधन को कार्य करना है, उसे संचालित करते हैं। इस प्रकार आदेश की शक्ति से हम बिलकल नये फायदे उठाते हैं। हम इसका नियन्त्रण कर सकते हैं। अब रोगी अकेला अपनी इच्छा के अनुसार अपनी आदेशवश्यता की व्यवस्था नहीं करता, बल्कि जहां तक वह इसके प्रभाव के अधीन हो सकता है, वहां तक हम उसकी आदेशवश्यता को रास्ता दिखाते हैं।

अब आप कहेंगे कि इस बात की परवाह बिना किए कि विश्लेषण के पीछे मौजूद प्रेरक बल को स्थानान्तरण कहा जाए या आदेश, यह खतरा अब भी है कि रोगी पर हमारे प्रभाव के कारण, हमारी खोजों की आलम्बननिष्ठ निश्चितता पर सन्देह पैदा हो जाए, और जो चीज़ चिकित्सा में लाभकारक है, वही गवेषणा में हानिकारक है। यह आक्षेप मनोविश्लेषण पर बहुत बार किया और यह मानना होगा कि यद्यपि यह आक्षेप उचित नहीं कहा जा सकता, पर फिर भी यह तर्कविरुद्ध नहीं है। यदि इसे उचित सिद्ध किया जा सकता तो मनोविश्लेषण एक विशेष रूप से छिपाया हुआ और खास प्रभावकारी किस्म का आदेश वाला इलाज ही होता, और रोगी के पिछले जीवन के अनभवों, मानसिक गतिकी, अचेतन इत्यादि के बारे में इसके सब निष्कर्षों को हल के रूप में ग्रहण किया जा सकता था। इस प्रकार, हमारे विरोधी यह सोचते हैं कि सारे अनुभव सही, तो भी यौन अनुभवों का महत्त्व, हमने पहले अपने भ्रष्ट मनों में ये सब बातें गढ़कर 'रोगी के मन में डाल दी हैं।' इन आरोपों का खण्डन सिद्धान्त की अपेक्षा अनुभव की सहायता से अधिक सन्तोषजनक रीति से हो जाता है। जिसने स्वयं किसी का मनोविश्लेषण किया है, उसे असंख्य बार यह निश्चय हुआ होगा कि इस तरह रोगी के मन में बातें डाल देना असम्भव है। उसे किसी सिद्धान्त-विशेष का अनुयायी बना लेने में, और इस प्रकार चिकित्सक द्वारा माने जाने वाले किसी गलत विश्वास का विश्वासी बना लेने में कठिनाई नहीं है। इस मामले में वह किसी आज्ञाकारी शिष्य की तरह व्यवहार करता है: पर इस तरह आपने सिर्फ उसकी बुद्धि पर असर डाला है, रोग पर नहीं। उसके द्वन्द्वों का समाधान और उसके प्रतिरोधों की पराजय तभी होती है जब उसको अपने भीतर खोजने के लिए बताई बातें वही हों जो सचमुच उसमें मौजूद हैं। जो चीज़ चिकित्सक ने करने में गलत अनुमान की है, वह विश्लेषण के समय दूर हो जाएगी। इसे हटाना होगा और इसके स्थान पर अधिक सही चीज़ लानी होगी। चिकित्सक का लक्ष्य यह है कि वह बड़ी सावधानी से चलता हुआ आदेश से पैदा होने वाली अस्थायी सफलताओं को रोके पर यदि वे पैदा हो जाती हैं तो कोई बड़ी हानि नहीं होती, क्योंकि हम पहले परिणाम से ही सन्तुष्ट नहीं हो जाते। यदि रोग की सब अस्पष्ट बातों की व्याख्या न हो जाए, स्मृति के सब खाली स्थान न भर जाएं, और दमनों के आरम्भिक अवसरों का पता न लग जाए, तो हम विश्लेषण को अधूरा ही समझते हैं। जब परिणाम समय से पहले दिखाई देते हैं, तब हम उन्हें विश्लेषण-कार्य को आगे बढ़ाने वाले के बजाय रोकने वाले समझते हैं, और बीच-बीच में उस स्थानान्तरण को उद्घाटित करके, जिस पर वे स्थिर होते हैं, उन्हें फिर नष्ट कर दिया जाता है। मूलतः यह अन्तिमं विशेषता विश्लेषण-कार्य और शुद्ध आदेश में भेद करती है, और यह स्पष्ट कर देती है कि हमारे परिणाम विश्लेषण के परिणाम हैं, आदेश के नहीं। दूसरे प्रकार के प्रत्येक आदेशात्मक इलाज में स्थानान्तरण को सावधानी से जैसे का तैसा कायम रखा जाता है। विश्लेषण में स्वयं इसका इलाज किया जाता है और इसको इसके विविध रूपों में काट-छांट दिया जाता है। विश्लेषण के बाद स्वयं स्थानान्तरण ही नष्ट हो जाना चाहिए। यदि तब सफलता आती है और बनी रहती है, तो वह आदेश के आधार पर नहीं खड़ी है, बल्कि आदेश की सहायता से की गई, भीतरी प्रतिरोधों की विजय पर रोगी के भीतर लाए गए आन्तरिक परिवर्तन पर खड़ी है।

इलाज के समय आदेश के एकाकी प्रभावों को पैदा होने से सम्भवतः रोकने वाली चीज़ वह द्वन्द्व है जो प्रतिरोधों के खिलाफ लगातार चल रहा है, और इन प्रतिरोधों को, अपने-आपको ऋणात्मक (विरोधपूर्ण) स्थानान्तरण में रूपान्तरित करना आता है। हम यह बताए बिना भी नहीं रह सकते कि विश्लेषण के बहुत सारे सूक्ष्म निष्कर्षों की, जिनके आदेश द्वारा उत्पन्न होने का शक हो सकता है, दूसरे अखण्डनीय स्रोतों से पुष्टि हो जाती है। हमारे पास इस सम्बन्ध में असंदिग्ध गवाह हैं, अर्थात् डेमेन्शिया रोगी और पैरानोइआ रोगी हैं, जिनके बारे में यह शक नहीं हो सकता कि वे आदेशों से प्रभावित हुए हैं। ये रोगी अपनी चेतना में घुसी हुई कल्पनासृष्टियों और प्रतीकों के अनुवादों के रूप में जो कुछ बताते हैं, वह स्थानान्तरण स्नायु-रोगियों के अचेतन के बारे में हमारी जांच-पड़ताल के परिणामों से बिलकुल मिलता है, और इस प्रकार हमारे किए हुए निर्वचनों की जिन पर प्रायः सन्देह किया जाता है, आलम्बननिष्ठ सत्यता की पुष्टि हो जाती है। मैं समझता हूं कि यदि इन मामलों में आप विश्लेषण पर विश्वास करें तो आपका यह विश्वास गलत सिद्ध नहीं होगा।

अब हमें स्वास्थ्य-लाभ के प्रक्रम को राग-सिद्धान्त की पदावली में प्रकट करके उसके वर्णन को पूरा करना है। स्नायु-रोगी सुख-भोग में या कार्य-सिद्धि में असमर्थ है-सुख-भोग में तो इस कारण कि उसका राग किसी यथार्थ आलम्बन से नहीं लगा हआ है, और कार्य-सिद्धि में इसलिए क्योंकि बहुत अधिक ऊर्जा, जो वैसे उसके पास उपयोग करने के लिए होती है, राग को दमन किए रखने में और उसकी सिर उठाने की कोशिशों को विफल करने में ही खर्च हो जाती है। यदि उसके अहम् और राग के बीच चल रहा द्वन्द्व खत्म हो जाए और उसके अहम् को उपयोग करने के लिए राग फिर मिल जाए, तो वह स्वस्थ हो जाए। इसलिए इलाज का काम यह है कि वह इसके पहले वाले लगावों से राग को छुड़ाए, जो अहम् की पहुंच से परे हैं, और इसे फिर अहम् के लिए उपयोगी बनाए। अब स्नायु-रोगी का राग कहां है? इसका आसानी से पता चल जाता है : यह लक्षणों से लगा हुआ है जिनसे इसे इन परिस्थितियों में प्राप्त हो सकने वाली एकमात्र चीज़-स्थानापन्न सन्तुष्टि-मिल जाती है। तो, हमें लक्षणों को अपने वश में करना होगा, उन्हें खत्म करना होगा, और रोगी हमसे यही चाहता है। लक्षणों को खत्म करने के लिए आवश्यक है कि हम पीछे लौटकर उस स्थान पर पहुंचें, जिस स्थान पर वे शुरू में पैदा हुए थे। जिस द्वन्द्व से वे पैदा हुए, उस पर विचार करें, और उन नोदक बलों की सहायता से, जो उस समय उपलब्ध नहीं थे, इसे रास्ता दिखाते हुए नये समाधान की ओर ले जाएं। दमन के प्रक्रम का यह संशोधन दमन तक पहुंचाने वाले प्रक्रमों के स्मृति-लेशों की सहायता से अंशतः ही किया जा सकता है। इस कार्य का असली अंश उन आरम्भिक द्वन्द्वों के नये संस्करण-चिकित्सक के साथ सम्बन्ध में 'स्थानान्तरण' –में पैदा करके किया जाता है, जिसमें रोगी वैसा ही व्यवहार करने की कोशिश करता है जैसा उसने पहले किया था, और चिकित्सक उसकी आत्मा के सब उपलब्ध बलों को ऐसे प्रेरित करता है कि वे उसे दूसरे निश्चय पर पहुंचाएं। इस प्रकार स्थानान्तरण वह युद्ध-क्षेत्र है जिसमें द्वन्द्व करने वाले सब बलों को मिलना पड़ता है।

सारा राग और इसका विरोध करने वाले सब बलों की पूरी शक्ति एक चीज़चिकित्सक के साथ सम्बन्ध-पर केन्द्रित हो जाती है। इस प्रकार यह अनिवार्य हो जाता है कि लक्षण अपने राग से वंचित हो जाएं। रोगी के पहले वाले रोग के स्थान पर कृत्रिम रूप से बनाया गया स्थानान्तरण विकार पैदा हो जाता है। उसके राग के अनेक अयथार्थ आलम्बनों के स्थान पर चिकित्सक के व्यक्तित्व का एक आलम्बन आ जाता है, और यह भी 'कल्पित' होता है। इस आलम्बन के विषय में यह जो नया द्वन्द्व पैदा होता है, वह विश्लेषक के आदेशों के ऊपरी तल पर, अधिक ऊंची मानसिक सतहों पर आए हए विश्लेषक के आदेशों द्वारा पैदा हुआ है, और वहां यह एक प्रकृत मानसिक द्वन्द्व के रूप में चलाया जाता है। क्योंकि इस प्रकार एक नया दमन नहीं होने दिया जाता, इसलिए, अहम् और राग के बीच विरोध खत्म हो जाता है। रोगी के मन में फिर एकता या अखण्डता पैदा हो जाती है। जब राग चिकित्सक के व्यक्तित्व-रूप अपने अस्थायी आलम्बन से अलग किया जाता है, तब यह अपने पहले वाले आलम्बनों पर नहीं लौट सकता, और अब यह अहम् के उपयोग के लिए उसकी सेवा में रहता है। इलाज के समय इस द्वन्द्व में हमारा विरोध करने वाले बलों में एक ओर तो राग की कुछ प्रवृत्तियों से अहम् की अरुचि है, जो प्रवृत्तियों का दमन करने के रूप में प्रकट हुई है, और दूसरी ओर, राग की आसक्तता या लगन या 'चिपकूपन' है, जो उन आलम्बनों से आसानी से अलग नहीं होता, जिन्हें इसने एक बार आच्छादित किया है।

इस प्रकार चिकित्सा-कार्य में दो कलाएं होती हैं। पहली कला में सारे राग को लक्षणों से परे धकेलकर स्थानान्तरण में लाया जाता है और वहां इकट्ठा कर दिया जाता है, और दूसरी कला में इस नये आलम्बन के आसपास द्वन्द्व होता रहता है, और राग को इससे मुक्त किया जाता है। इस नये संघर्ष के सफल परिणाम का निश्चायक परिवर्तन यह है कि दमन को परे रखा जाए, जिससे राग अचेतन में भागकर अपने-आपको अहम् से फिर न हटा सके। यह बात विश्लेषक के आदेशों के परिणामस्वरूप अहम् में होने वाले परिवर्तनों से सम्भव हो जाती है। अचेतन को क्षीण करके अहम् निर्वचन-कार्य द्वारा, जिससे अचेतन सामग्री चेतन में आ जाती है, विस्तृत हो जाता है। शिक्षण के द्वारा इसका राग से फिर मेल हो जाता है, और इसे राग को कुछ सन्तुष्टि देने के लिए तत्पर बना लिया जाता है और अपने राग की मांग से इसे जो भय था, वह इसके उस नये सामर्थ्य से कम हो जाता है; जो यह राग की कुछ मात्रा उदात्तीकरण में खर्च करने के लिए प्राप्त करता है। इलाज का रास्ता इस आदर्श वर्णन के जितना समीप होता है, मनोविश्लेषण-चिकित्सा में उतनी ही सफलता होती है।

इसके मार्ग की रुकावटें हैं-राग की चलिष्णता का अभाव, जो इसके आलम्बनों से युक्त किए जाने का प्रतिरोध करता है, और रोगी की स्वरति की दृढ़ता, जो आलम्बन-स्थानान्तरण को एक निश्चित मात्रा से अधिक नहीं पैदा होने देगी। शायद स्वास्थ्य-लाभ के प्रक्रम की गतिकी तब अधिक नष्ट हो जाएगी जब हम इसका वर्णन यों करें कि स्थानान्तरण के ज़रिये इसका एक भाग अपनी ओर खींचकर हम राग की उस सारी मात्रा को इकट्ठा कर लेते हैं, जो अहम् के नियन्त्रण से हटाई गई है।

यहां यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि विश्लेषण के समय और विश्लेषण के द्वारा राग के जो वितरण हुए हैं, उनसे पहले वाले रोग में इसके स्वभाव के विषय में कोई सीधा अनुमान नहीं किया जा सकता। मान लो कि कोई प्रबल पिता-स्थानान्तरण कायम करके और फिर उसे चिकित्सक के व्यक्तित्व पर लाकर किसी रोगी का सफलता से इलाज कर दिया जाता है, पर इसका यह आवश्यक निष्कर्ष नहीं है कि रोगी पहले अपने पिता पर राग का अचेतन संयोग करके इस तरह रोगी हुआ था। पिता-स्थानान्तरण सिर्फ वह युद्ध-क्षेत्र है जिस पर हम राग को जीतते और कैदी बना लेते हैं। रोगी के राग को अन्य स्थानों से हटाकर यहां खींच लिया गया है। आवश्यक नहीं कि यह रण-क्षेत्र दुश्मन का सबसे महत्त्वपूर्ण मोर्चा हो। दुश्मन की राजधानी समाप्ति हो जाने के बाद ही चिकित्सक अपनी कल्पना में रोग द्वारा निरूपित राग के स्थानों की पुनः रचना आरम्भ कर सकता है।

राग-सिद्धान्त के प्रकाश में स्वप्नों के बारे में एक अन्तिम बात कहनी होगी। स्नायु-रोगी की 'गलतियों' और उसके मुक्त साहचर्यों की तरह उसके स्वप्नों की सहायता से हम लक्षणों का अर्थ जान पाते हैं, और राग के स्थानों का पता लगा सकते हैं। उनमें इच्छा-पूर्ति जो रूप ग्रहण करती है, उनसे हमें यह पता चलता है कि दमन किए गए इच्छा-आवेग कौन-से हैं, और वे आलम्बन कौन-से हैं, जिन पर अहम् से हटने के बाद राग ने अपना लगाव किया है। इसलिए मनोविश्लेषण-चिकित्सा में स्वप्नों का निर्वचन बहुत बड़ा कार्य करता है, और बहुत-से रोगियों में यह बहुत समय तक विश्लेषण का सबसे महत्त्वपूर्ण साधन होता है। हम पहले देख चुके हैं कि नींद की अवस्था अपने-आप ही दमनों को कुछ शिथिल कर देती है। इस पर जो भारी दबाव होता है, उसमें यह कमी होने पर यह दमित इच्छा स्वप्न में अपनी इतनी स्पष्ट अभिव्यक्ति कर सकती है जितनी दिन में लक्षणों के रूप में नहीं की जा सकती। इसलिए दमित अचेतन की जानकारी का, जो अहम् से हटे हुए राग का घर है, सबसे आसान रास्ता स्वप्नों का अध्ययन ही हो जाता है।

पर स्नायु-रोगियों के स्वप्नों में और प्रकृत लोगों के स्वप्नों में कोई सारभूत भेद नहीं होता। सच पूछिए तो शायद इनको उनसे अलग भी नहीं किया जा सकता। स्नायु-रोगियों के स्वप्नों की ऐसे तरीके से व्याख्या करना, जो प्रकृत लोगों के स्वप्नों पर ठीक न बैठे, तर्क-विरुद्ध होगा। इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना पड़ता है कि स्नायु-रोग और स्वास्थ्य का अन्तर सिर्फ दिन के समय होता है-स्वप्न-जीवन में कायम नहीं रहता। इस प्रकार, यह आवश्यक हो जाता है कि कुछ ऐसे निष्कर्ष, जो स्नायु-रोगियों के स्वप्नों और लक्षणों के परस्पर सम्बन्ध के परिणामस्वरूप प्राप्त हुए हैं, स्वस्थ व्यक्तियों पर लागू किए जाएं। हमें मानना पड़ता है कि स्वस्थ आदमी में भी मानसिक जीवन के वे कारक होते हैं, जो स्वप्न का या लक्षण का निर्माण कराने वाले एकमात्र कारक हैं, और हमें यह निष्कर्ष भी निकालना पड़ता है कि स्वस्थ व्यक्तियों में भी दमन मौजूद होते हैं, और उन्हें कायम रखने के लिए ऊर्जा की कुछ मात्रा खर्च करनी पड़ती है। इसी तरह, हमें यह भी मानना पड़ता है कि उनके अचेतन मनों में भी दमित आवेग रहते हैं, जिनमें अब भी ऊर्जा होती है, और उनमें भी राग का कुछ हिस्सा अहम् के उपयोग से हटाया हुआ होता है। इसलिए स्वस्थ आदमी भी, फलतः स्नायु-रोगी होता है, पर उसमें ऐसा एकमात्र लक्षण, जो परिवर्धित होने में समर्थ प्रतीत होता है, स्वप्न ही है। जब आप उसके जाग्रत् जीवन की आलोचनात्मक जांच करते हैं, तब आपको एक ऐसी चीज़ मिलती है जो इस तर्कसंगत मालूम होने वाले निष्कर्ष का खण्डन करती है, क्योंकि ऊपर से स्वस्थ लगने वाले इस जीवन में असंख्य छोटे-छोटे और व्यवहार की दृष्टि से महत्त्वहीन लक्षण-निर्माण व्याप्त हैं।

इसलिए स्नायविक स्वास्थ्य और स्नायविक रोग (स्नायु-रोग) का अन्तर कम होकर एक व्यावहारिक अन्तर या विभेद रह जाता है, और उसका निश्चय व्यावहारिक परिणाम द्वारा किया जाता है-कोई व्यक्ति जीवन में सुख-भोग और सक्रिय कार्य-सिद्धि के सामर्थ्य की काफी मात्रा का अनुभव करने में कहां तक समर्थ है? सम्भवतः इस अन्तर का रूप उस अनुपात के अनुरूप होता है, जो उसके पास मौजूद मुक्त ऊर्जा में और दमन से बंधी हुई ऊर्जा में होता है, अर्थात् वह मात्रात्मक अन्तर है, गुणात्मक नहीं। मुझे आपको यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं कि इस विचार से हमारे इस विश्वास का सैद्धान्तिक आधार बनता है कि स्नायु-रोगों का सारतः इलाज अवश्य किया जा सकता है चाहे उनका आधार शरीर-रचना पर आश्रित स्वभाव या मनोविन्यास भी हो।

इसलिए स्वास्थ्य की विशेषताओं की जानकारी प्रदान करते हुए इतनी बात, स्नायु-रोगी और स्वस्थ व्यक्तियों के स्वप्न समान होने से, अनुमित की जा सकती है। पर स्वयं स्वप्नों के बारे में एक और अनुमान निकालना होगा, और वह यह है कि उन्हें स्नायविक लक्षणों के साथ उनके बन्धन से पृथक नहीं किया जा सकता, कि हम यह मानने के लिए स्वतन्त्र नहीं हैं कि उनकी सारभूत प्रकृति उन्हें इस सूत्र में बांध लेने से खत्म हो जाती है, कि वे 'विचारों का, अभिव्यक्ति के बहुत पुराने और अप्रचलित रूपों से अनुवाद' है। और हमें यह निष्कर्ष निकालना होगा कि उनसे राग के वे विन्यास और इच्छा के वे आलम्बन प्रकट होते हैं, जो उस समय सचमुच क्रियाशील और प्रबल हैं।

अब हम लगभग अन्त पर आ गए हैं। शायद आप इस बात से निराश होंगे कि मनोविश्लेषण-चिकित्सा की चर्चा करते हुए मैंने सिर्फ सिद्धान्त पर विचार किया है. और जिन अवस्थाओं में इलाज किया जाता है या इसके जो परिणाम होते हैं. उनके बारे में मैंने आपको कुछ नहीं बताया, पर मैं उन दोनों को छोड़ता हूं : पहले को तो इस कारण कि मेरा आशय यह कभी भी नहीं था कि मैं आपको विश्लेषण की विधि का प्रयोग करने की क्रियात्मक शिक्षा दे दूं, और पिछले को इस कारण, क्योंकि इसके विरोध में मेरे मन में अनेक भाव हैं। इन व्याख्यानों के आरम्भ में मैंने बलपूर्वक कहा था कि अनुकूल परिस्थितियों में हम ऐसे इलाज करने में सफल हो जाते हैं जो अन्य चिकित्सा-शैलियों के सर्वोत्तम इलाजों से किसी तरह भी घटिया नहीं होते। शायद मैं यह भी कह सकता हूं कि ये परिणाम और किसी विधि से प्राप्त नहीं किए जा सकते। यदि मैं इससे अधिक कहूंगा तो यह सन्देह किया जाएगा कि मैं आत्मविज्ञापन द्वारा अपने विरोधियों की निन्दाकारक आवाज़ को दबा देना चाहता हूं। 'सहयोगी' चिकित्सकों ने सार्वजनिक सम्मेलनों में भी मनोविश्लेषकों को बारबार यह धमकी दी है कि हम विश्लेषण की विफलताओं और हानिकारक प्रभावों का संग्रह प्रकाशित करके इलाज की इस विधि की निरर्थकता के बारे में जनता की आंखें खोल देंगे। इस तरह की कार्यवाही द्वेषपूर्ण और खण्डनात्मक तो होगी ही, पर उस बात को छोड़ दिया जाए, तो भी, इस तरह के संग्रह को विश्लेषण के चिकित्सा-सम्बन्धी परिणामों के बारे में सही अन्दाज़ा लगाने के लिए ठीक गवाही नहीं माना जा सकता। मनोविश्लेषण-चिकित्सक-शैली, जैसा कि आप जानते हैं, अभी शैशव काल में है। इसकी विधि को पूरा बनाने में अनेक वर्ष लगेंगे, और यह काम विश्लेषण करते हुए अनुभव बढ़ने के साथ-साथ ही किया जा सकता है। इसकी विधियों की शिक्षा देने में जो कठिनाइयां हैं, उनके कारण नये आदमी को अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए अधिकतर अपनी ही सूझ-बूझ पर निर्भर होना पड़ता है और उसके आरम्भिक वर्षों के परिणामों को विश्लेषण-चिकित्सा की अधिकतम सम्भव सफलताओं का सूचक नहीं माना जा सकता।

मनोविश्लेषण के आरम्भ में किए गए इलाज के बहुत-से प्रयत्न विफल रहे थे, क्योंकि वे प्रयत्न ऐसे रोगियों के किए गए जो इसकी प्रक्रिया के लिए बिलकुल अनुपयुक्त थे, और जिन्हें आज हम कुछ संकेतों का अनुसरण करके अलग कर देते हैं। पर इन संकेतों का पता जांच करने से ही चलता है। शुरू में हम यह नहीं जानते थे कि पैरानोइया और डेमेन्शिया प्रीकौक्स जब पूर्णतः परिवर्धित होते हैं, तब वे विश्लेषण से काबू में नहीं आते। फिर भी, सब तरह के रोगों पर इस विधि की परख करना उचित है। पर उन आरम्भिक वर्षों की अधिकतर विफलताओं का कारण चिकित्सक की त्रुटियां पात्र के चुनाव में अनुपयुक्तता नहीं थी, बल्कि प्रतिकूल बाह्य अवस्थाएं थीं। मैंने सिर्फ आन्तरिक प्रतिरोधों की चर्चा की है, जो रोगी की ओर से किए जाते हैं-ये अनिवार्य हैं और इन्हें दूर किया जा सकता है। रोगी की परिस्थितियां और वातावरण विश्लेषण के विरुद्ध जो बाह्य प्रतिरोध खड़े कर देते हैं, उनका सैद्धान्तिक महत्त्व कुछ भी नहीं है पर व्यावहारिक महत्त्व बहुत अधिक है। मनोविश्लेषण द्वारा इलाज की तुलना शल्य-कार्य या शरीर के आपरेशन से की जा सकती है, और उसकी तरह इसे भी अपनी सफलता के लिए अनुकूलतम परिस्थितियों में किए जाने का अधिकार है। सर्जन या शल्य-चिकित्सक जो पूर्व व्यवस्थाएं करता है उनसे आप परिचित हैं-उपयुक्त कमरा, काफी प्रकाश, विशेषज्ञ सहायक, रिश्तेदारों को अलग हटा देना आदि। अब आप बताइए कि यदि आपरेशन करने के समय उसका सारा परिवार आपरेशन-स्थल में झांक रहा हो, और हर नश्तर लगने में ज़ोर से चीख रहा हो, तो कितने आपरेशन सफल होंगे? मनोविश्लेषण द्वारा इलाज में रिश्तेदारों का दखल पूरा खतरा है, और साथ ही ऐसा खतरा है जिसको दूर करने का तरीका हमारी समझ में नहीं आता। हमारे पास रोगी के भीतरी प्रतिरोधों को, जिन्हें हम आवश्यक मानते हैं, दूर करने का उपाय है, पर इन बाहरी प्रतिरोधों से हम अपने-आपको कैसे बचाएं? कितना भी स्पष्टीकरण कीजिए, पर रिश्तेदारों को समझा लेना असम्भव है, और न आप उनसे कह सकते हैं कि वे सारे मामले से बिलकुल अलग रहें। आप उन्हें अपने मन की बातें भी नहीं बता सकते, क्योंकि तब यह खतरा है कि रोगी को हम पर विश्वास नहीं रहेगा, क्योंकि वह चाहता है, और ठीक ही चाहता है, कि जिस मनुष्य को वह अपने मन की बात बताता है, वह उसका ही पक्ष ले। जिसे पारिवारिक जीवन में आमतौर से फूट डालने वाले मतभेदों की जानकारी है उसे, विश्लेषक के नाते, यह देखकर कुछ भी आश्चर्य नहीं होगा कि रोगी के निकटतम लोग बहुधा उसके इलाज में कम और उसके वर्तमान रूप को कायम रखने में ज़्यादा दिलचस्पी रखते हैं। जब ऐसा होता है कि स्नायु-रोग परिवार के विभिन्न सदस्यों के आपसी संघर्षों से सम्बन्धित होता है, तब स्वस्थ व्यक्ति अपने निजी हित को रोगी के स्वास्थ्यलाभ के मुकाबले अधिक महत्त्व देता है। आखिर यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि पति ऐसे इलाज को पसन्द नहीं करता जिसमें, जैसी कि उसकी सही कल्पना है, उसके सब पाप खुल जाएंगे। हम इस पर आश्चर्य भी नहीं करते, पर जब हमारे प्रयत्न निष्फल रहते हैं और बीच में ही इसलिए छोड़ देने पड़ते हैं कि रोगी-पत्नी के प्रतिरोधों के साथ पति का भी प्रतिरोध आ मिला, तब हम अपने-आपको दोष नहीं दे सकते। इतना ही है कि हमने एक ऐसा काम उठा लिया था, जो मौजूदा अवस्थाओं में किया नहीं जा सकता।

आपके सामने बहुत सारे रोगियों का वर्णन करने के बजाय मैं सिर्फ एक रोगी की चर्चा करूंगा, जिसके मामले में मुझे अपने पेशे के प्रति सच्चा रहने की खातिर कष्ट उठाना पड़ा। बहुत वर्ष पहले मैंने एक नौजवान लड़की का विश्लेषण द्वारा इलाज शुरू किया। पहले बहुत समय तक वह डर के कारण घर से बाहर नहीं जा सकती थी और न अकेली घर पर रह सकती थी। बहुत हिचकिचाहट के बाद उसने स्वीकार किया कि उसके मन में उस अनुराग के कुछ चिह बहुत अधिक हैं जो उसने अपनी माता और उस परिवार के एक धनी मित्र के बीच देख लिया था। उसने तब बड़े व्यवहारशून्य तरीके से-अथवा बड़ी चतुराई से-अपनी माता को संकेत से यह बता दिया कि विश्लेषण के समय क्या बातचीत हुई थी। ऐसा उसने अपनी माता के प्रति अपना व्यवहार बदलकर, यह ज़िद करके कि उसे अकेलेपन के भय से माता के अलावा और कोई नहीं बचा सकता, और जब उसने घर से जाने की कोशिश की, तब उस दरवाजे को पकड़े रखकर, यह बात जताई। उसकी माता भी पहले बहुत स्नायविक थी, पर कई वर्ष पहले एक जल-चिकित्सा के अस्पताल में जाने से स्वस्थ हो गई थी या दूसरे शब्दों में यों कह सकते हैं कि उसने वहां एक आदमी से अच्छा परिचय कर लिया था, और उसके साथ ऐसा सम्बन्ध स्थापित कर लिया था कि जो एक से अधिक बातों में तृप्तिकारक सिद्ध हुआ था। अपनी पुत्री की ज़िद से सन्देह पैदा हो जाने पर माता एकदम समझ गई कि लड़की के भय का क्या अर्थ है। वह अपनी माता को रोके रखने के लिए उसे अपने प्रेमी से अपना सम्बन्ध बनाए रखने के लिए आवश्यक आज़ादी से वंचित करने के लिए रोगी हो गई थी। माता ने तुरन्त निश्चय कर लिया। उसने इस हानिकारक इलाज को बन्द कर दिया। लड़की को स्नायु-रोगियों के एक आश्रम में भेज दिया गया, और बहुत वर्षों तक उसे दिखाकर यह कहा जाता रहा कि यह 'बेचारी मनोविश्लेषण की मारी हई है, और मेरे इलाज के दुष्परिणामों के बारे में भी ऐसी ही विरोधी अफवाहें उड़ती रहीं। मैं चुप रहा, क्योंकि मैं यह समझता था कि मैं अपने पेशे की गोपनीयता के नियमों से बंधा हुआ हूं। वर्षों बाद मुझे एक सहयोगी से पता लगा, जो उस आश्रम में आ गया था और जिसने अकेलेपन से डरने वाली उस लड़की को देखा था, कि उसकी माता और उस धनी आदमी के सम्बन्ध के बारे में हर कोई जानता है, और सम्भवतः उस स्त्री का पति और लड़की का पिता जान-बूझकर इसकी ओर से आंखें बन्द किए हुए हैं। इस 'रहस्य' पर उस लड़की के इलाज को कुर्बान कर दिया गया।

युद्ध से पहले के वर्षों में, जबकि बहुत-से देशों के रोगियों के आ जाने के कारण मैं अपने नगर की खुशी-नाखुशी पर निर्भर नहीं रहा था, तब मैंने यह नियम बना लिया था कि मैं ऐसे व्यक्ति का इलाज अपने हाथों में नहीं लेता था जो जीवन के सब आवश्यक रिश्तों से स्वतन्त्र न हों। हरेक मनोविश्लेषक यह नियम नहीं बना सकता। रिश्तेदारों के बारे में मेरी चेतावनियों से शायद आप यह निष्कर्ष निकालेंगे कि मनोविश्लेषक को, मनोविश्लेषण के हित की दृष्टि से, रोगी को उसके परिवार के वातावरण से अलग कर देना चाहिए, और यह चिकित्सा उनकी ही करनी चाहिए जो निजी संस्थाओं में रहते हैं। पर मैं इस विचार का समर्थन नहीं कर सकता। रोगियों के लिए-कम-से-कम उन रोगियों के लिए, जिनकी हालत बहुत गिरी हुई नहीं है-यही अधिक लाभदायक है कि वे इलाज के दिनों में उन परिस्थितियों में रहें जिनमें उन्हें अपने सामान्य जीवन की आवश्यकताओं से द्वन्द्व करना पड़े। पर रिश्तेदारों को अपने व्यवहार से इस लाभ को नष्ट नहीं होने देना चाहिए, और सबसे बड़ी बात यह है कि उन्हें डाक्टर के चिकित्सा-प्रयत्नों का विरोध नहीं करना चाहिए। पर जिन लोगों से आप नहीं मिलते, उन्हें यह रुख अपनाने के लिए आप कैसे प्रेरित करेंगे? स्वभावतः आप यह नतीजा निकालेंगे कि इलाज की सफलता पर सामाजिक वातावरण का और रोगी के निकटतम लोगों की सुसंस्कृति की मात्रा का बड़ा असर पड़ेगा।

यदि हम अपनी बहुत सारी विफलताओं का कारण इन बाधाकारक बाह्य कारकों को बता दें तो भी चिकित्सा-शैली के रूप में मनोविश्लेषण की प्रभावकारिता के लिए बड़ा निराशामय क्षेत्र है। मनोविश्लेषण के प्रेमियों ने हमें यह सलाह दी है कि विफलताओं के संग्रह के मुकाबले में हम अपनी सफलताओं के आंकड़े तैयार करें। मैंने यह सुझाव भी पसन्द नहीं किया; मैंने यह युक्ति पेश की कि यदि इकट्ठे किए गए अलग-अलग रोगी एक जैसे नहीं हैं, तो आंकड़े अर्थहीन हो जाते हैं; और जिन रोगियों का इलाज किया गया है, वे असल में बहुत-सी दृष्टियों से एक जैसे नहीं थे। इसके अलावा, जितने समय पर विचार किया गया था, वह इतना थोड़ा था कि उसके आधार पर इलाजों के स्थायित्व का निर्णय नहीं किया जा सकता। और कुछ रोगियों के बारे में तो कुछ भी विवरण देना असम्भव है। वे ऐसे लोग थे जिन्होंने अपने रोग और इलाज, दोनों को गुप्त रखा था, और इसलिए उनके स्वास्थ्य-लाभ को भी उसी तरह गुप्त रखना था। पर इसके खिलाफ सबसे ज़बरदस्त दलील यह है कि हम जानते हैं कि चिकित्सा-शैली के मामलों में मनुष्य-जाति सबसे अधिक विवेकहीन है। इसलिए तर्कसंगत दलीलों से उसे प्रभावित कर सकने की कोई सम्भावना नहीं है। इलाज के सम्बन्ध में नई बात को या तो बड़े प्रबल उत्साह से ग्रहण किया जाता है, जैसे कि उदाहरण के लिए, तब हुआ था जब कोच ने ट्युबरक्युलिन के बारे में अपने परिणाम पहले-पहल प्रकाशित किए थे; अथवा, इस पर बहुत अधिक विश्वास किया जाता है, जैसा जेनर के टीके (वैक्सीनेशन) के बारे में हुआ था, जो असल में एक स्वर्गीय वरदान था, पर जिसके विरोधी आज भी मौजूद हैं। मनोविश्लेषण के खिलाफ एक बहुत स्पष्ट पक्षपात दिखाई देता है। जब आप किसी बड़े कठिन रोग का इलाज कर देते हैं, तब लोग कहते हैं, 'इससे कुछ भी सिद्ध नहीं होता। इतने दिनों बाद वह अपने-आप ठीक हो जाता।' और जब एक रोगी, जो गिरावट और उन्माद के चार चक्रों में से गुज़र चुकने के बाद उदासी रोग के बाद के मध्यान्तर में मेरे पास आया और तीन सप्ताह बाद उसमें फिर उन्माद का दौरा दिखाई देने लगा, तब परिवार के सब लोगों की और जो बड़े-बड़े डाक्टर बुलाए गए थे, उन सबकी यह निश्चित धारणा थी कि नया दौरा विश्लेषण के प्रयत्न का परिणाममात्र है। पूर्वग्रह का आप कोई उपाय नहीं कर सकते, जैसे कि आप आज फिर युद्ध में लगे हुए प्रत्येक राष्ट्र-समूह में देख रहे हैं, जिनमें एक-दूसरे के विरुद्ध पूर्वग्रह पैदा हो गए हैं। सबसे अधिक समझदारी की बात यह है कि प्रतीक्षा करो और समय बीतने के साथ उन्हें दूर हो जाने दो। एक दिन आता है जब वही लोग उन्हीं वस्तुओं को पहले से भिन्न रूप में देखने लगते हैं। पहले उनका विचार क्यों आता था, यह बात सदा छिपी रहती है।

सम्भवतः विश्लेषण-चिकित्सा-शैली के विरुद्ध पूर्वग्रह ढीला पड़ने लगा है। विश्लेषण के सिद्धान्त के लगातार फैलते जाने से और अनेक देशों में विश्लेषण-चिकित्सा अपनाने वाले डाक्टरों की संख्या से यही बात सूचित होती है। जब मैं युवक था, तब सम्मोहन के आदेश-इलाज के लिए चिकित्सक-वर्ग में मेरे विरुद्ध रोष का तफान आ गया था। और आज 'समझदार और गम्भीर लोग' उसे मनोविश्लेषण के विरोध में रखते हैं। पर चिकित्सा के साधन-रूप में सम्मोहन से जो आशाएं की गई थीं, उन्हें वह पूरा नहीं कर सका। हम मनोविश्लेषक लोग इसके सच्चे उत्तराधिकारी होने का दावा कर सकते हैं, और हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इससे हमें कितना अधिक बढ़ावा और सैद्धान्तिक प्रकाश प्राप्त हुआ है। मनोविश्लेषण के जो हानिकारक प्रभाव हुए बताए जाते हैं, वे सिर्फ द्वन्द्व की अतिशयता या प्रकोप के बीच में आने वाले रूप तक ही सीमित हैं, और ये रूप तब पैदा हो सकते हैं, जब विश्लेषण ठीक तरह न किया जाए, या इसे एकाएक छोड़ दिया जाए। हम अपने रोगियों के साथ जो कुछ करते हैं, उसका वर्णन आप सुन सकते हैं, और अब आप स्वयं यह फैसला कर सकते हैं कि क्या हमारे प्रयत्नों से स्थायी हानि हो सकती है? विश्लेषण का दुरुपयोग कई तरह किया जा सकता है : विशेष रूप से स्थानान्तरण धूर्त चिकित्सक के हाथ में बड़ा खतरनाक हथियार है, पर कोई भी दवाई दुरुपयोग से नहीं बच सकती। यदि किसी चाकू में धार नहीं है, तो वह शल्य चिकित्सक के लिए भी बेकार है।

अब मैं समाप्त ही करने वाला हूं। मैं सिर्फ परम्परागत औपचारिकता के रूप में यह बात नहीं कह रहा कि मैंने आपके सामने जो व्याख्यान दिए हैं, उनकी बहुतसी त्रुटियों से मैं स्वयं बहुत परेशान हूं। मुझे इस बात का सबसे अधिक खेद है कि अनेक बार मैंने किसी विषय का संक्षिप्त उल्लेख करने के बाद आगे फिर उस पर विचार करने का वचन दिया, और फिर जिस प्रसंग में मैं अपना वचन पूरा कर सकता था, वह नहीं आया। मैंने एक ऐसी चीज़ का विवरण आपके सामने पेश करने का भार उठाया था, जो अभी अधूरी है, और परिवर्धित हो रही है, और अब मेरा संक्षिप्त सारांश भी अधूरा रह गया है। बहुत-से स्थानों पर मैंने निष्कर्ष निकालने के लिए सारी चीज़ तैयार कर दी, पर निष्कर्ष नहीं निकाला, पर मैं आपको मनोविश्लेषण का विशेषज्ञ बनाने का लक्ष्य नहीं रख सकता था। मैं तो सिर्फ यह चाहता था कि आपको इसकी समझ के रास्ते पर डाल दूं, और इसमें आपकी दिलचस्पी पैदा कर दूं।

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