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विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
हम मृत्यु-इच्छाओं पर ही विचार करते हैं जो अधिकतर हमें स्वप्नद्रष्टा के
सीमाहीन अहंकार से ही उत्पन्न दिखाई देंगी। इस तरह की इच्छाएं बहुत बार
स्वप्नों का आधारभूत कारण दिखाई देती हैं। जब कभी कोई जीवन में हमारे मार्ग
में आता है और हमारे पारस्परिक सम्बन्ध इतने उलझे हुए होने पर ऐसा कितनी ही
बार होता है!-तव उस व्यक्ति को दूर करने के लिए तुरन्त एक स्वप्न तैयार हो
जाता है, चाहे वह पिता हो, माता हो, भाई हो, बहिन हो, पति हो या पत्नी हो।
हमें यह बात आश्चर्यजनक लगी थी कि यह दुष्टता मनुष्य-मात्र में जन्मजात होती
है, और बिना और प्रमाण के हम निश्चित रूप से यह मानने को तैयार नहीं कि हमारे
स्वप्नों के निर्वाचनों का यह प्रमाण सही है। पर जब एक बार हमने यह देख लिया
कि इस तरह की इच्छाओं का मूल अतीत में खोजना चाहिए, तब हमें उस मनुष्य के
अतीत में ऐसा समय ढूंढ़ने में कुछ कठिनाई नहीं हुई थी, जिसमें ऐसे अहंकार और
ऐसी इच्छाओं का होना कोई अजीब बात नहीं, चाहे वह इच्छा अपने इष्ट मित्रों के
और प्रियजनों के विरुद्ध ही हो। अपने आरम्भिक वर्षों में (जो बाद में
विस्मृति के पर्दे में छिप जाते हैं) बच्चा वही व्यक्ति है, जो ऐसे अहंकार को
बड़े साफ रूप में बहुत बार प्रदर्शित करता है। इस तरह की सुनिश्चित
प्रवृत्तियां, या ठीक-ठीक कहें तो उनके बचे हए अवशेष, जिसमें सदा स्पष्ट रूप
में दिखाई देते हैं; कारण यह कि बालक पहले अपने से प्यार करता है, और बाद में
दूसरों को प्यार करना और अपने कुछ अहंकार को दूसरों पर कुर्बान करना सीखता
है। जिन लोगों से वह शुरू से प्रेम करता मालूम होता है, उनसे भी वह इसीलिए
प्रेम करता है क्योंकि उसे उनकी आवश्यकता है, और उनके बिना उसका काम नहीं चल
सकता-अर्थात् यहां भी उसका प्रेरक भाव अहंकार ही होता है। बाद में जाकर ही
प्रेम का आवेग अहंकार से अलग होता है; यह अक्षरशः सत्य है कि बच्चा अपने
अहंकार के ज़रिये ही प्रेम करना सीखता है।
इस सिलसिले में बच्चे का अपने भाइयों और बहनों के प्रति जो रुख होता है और
अपने माता-पिता के प्रति जो रुख होता है, उन दोनों की तुलना करना शिक्षाप्रद
होगा। आवश्यक नहीं कि छोटा बालक अपने भाइयों और बहनों को प्यार करता हो, और
प्रायः वह यह बात साफ कह देता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह उन्हें अपना
प्रतिद्वन्द्वी समझता है, और उनसे नफरत करता है, और सब लोग जानते हैं कि यह
रुख आमतौर से लगातार वर्षों, अर्थात् बच्चे के बड़े हो जाने पर भी, बना रहता
है। यह ठीक है कि प्रायः इसके स्थान पर एक अधिक कोमल भावना आ जाती है, या
शायद यह कहना चाहिए कि कोमल भावना उस पहले वाली भावना के ऊपर आ जाती है, पर
आमतौर से विरोधी भावना अधिक पहले की मालूम होती है। यह बात ढाई से चार साल तक
के बच्चों में उस समय बहुत आसानी से देखी जा सकती है, जब कोई नया शिशु
पदार्पण करता है। साधारणतया उसका बड़ी अनिच्छा से स्वागत किया जाता है; 'मुझे
यह पसन्द नहीं; चिड़िया इसे फिर ले जाएगी,' इस तरह की बातें आमतौर से कही
जाती हैं। बाद में नये शिशु के आने पर मौके-बेमौके नापसन्दगी प्रकट की जाती
है। उसे चोट पहुंचाने और उस पर सचमुच आक्रमण करने की कोशिशें भी की जाती हैं।
यदि आयु में अन्तर कम है तो जब तक बच्चे का मानसिक व्यापार अधिक अच्छी तरह
परिवर्धित होता है, उसे पहले ही प्रतिद्वन्द्वी मौजूद मिलता है, और वह
अपने-आपको स्थिति के अनुकूल बना लेता है। दूसरी ओर यदि आयु में अन्तर अधिक है
तो नये शिशु को देखकर पहले बच्चे में कुछ प्रेमपूर्ण भावनाएं पैदा हो सकती
हैं। वह उस शिशु को दिलचस्प चीज़ और एक तरह की जीवित गड़िया समझता है, और जब
आठ वर्ष या अधिक का अन्तर होता है, और विशेष रूप से यदि बड़ा बच्चा लड़की है,
तो रक्षण करने का मातृत्वपूर्ण आवेग तुरन्त प्रवृत्त हो जाता है, पर सच-सच
कहा जाए तो जब हम किसी स्वप्न में किसी भाई या बहन की मृत्यु-इच्छा छिपी हुई
देखते हैं, तब हमें कभी भी उलझन पैदा नहीं होती, क्योंकि, बिना बहुत परेशानी
के, इसका मूल बचपन में या बहुत बार बाद के वर्षों में, जबकि वे इकट्ठे रहते
थे, मिल जाता है।
शायद कोई बाल-गृह (नर्सरी) ऐसा नहीं होगा, जिसमें माता-पिता का प्रेम प्राप्त
करने के लिए होड़ न होती हो, उन सबकी सांझी सम्पत्ति के लिए मुकाबला न होता
हो, और जिस कमरे में वे रहते हैं, उसमें जगह घेरने के लिए एक-दूसरे से बढ़ने
की कोशिश न होती हो, और इन्हीं के परिणामस्वरूप मार-पीट के झगड़े न होते हों।
यह विरोध-भाव छोटे भाइयों और बहनों की तरह बड़ों से भी होता है। मेरा ख्याल
है कि बर्नार्ड शॉ ने ही यह लिखा है, 'अंग्रेज़ युवती अपनी माता के बाद दूसरे
नम्बर पर जिससे घृणा करती है वह उसकी बड़ी बहन है।' इस कथन में कुछ ऐसी बात
है जो हमारे कानों को खटकती है। हमारे लिए बहनों और भाइयों की आपसी घृणा और
मुकाबलेबाजी को समझना बड़ा ही कठिन है, पर घृणा की भावनाएं माता और पुत्री के
तथा जनकों और सन्तानों के सम्बन्ध के बीच में कैसे घुस सकती हैं?
यह सम्बन्ध बच्चों के दृष्टिकोण से भी निःसन्देह अधिक अनुकूल है, और इसी की
हम आशा भी करते हैं। भाइयों और बहनों में प्रेम न होने की अपेक्षा जनकों और
सन्तानों में प्रेम न होना कहीं अधिक बुरा मालूम होता है। यह कहा जा सकता है
कि दूसरे प्रकार के प्रेम को हमने पवित्र मान लिया है जबकि पहले प्रकार के
प्रेम को अपवित्र हो जाने दिया है। तो भी, रोज़ के तजुरबे से हमें यह पता चल
सकता है कि जनकों और बड़ी उम्र के बालकों में एक-दूसरे के प्रति जो भावनाएं
होती हैं, वे बहुधा समाज द्वारा स्थापित आदर्श से नीचे होती हैं और कितनी ही
विरोध-भावना अन्दर ही अन्दर सुलगती रहती है, और यदि पितृभक्ति या मातृभक्ति
या अन्य कोमल भावनाओं के विचार से उन्हें न दबाया जाए तो वे किसी समय ज्वाला
के रूप में फूट निकलें। इस विरोध के प्रेरक कारण सुविदित हैं, और एक ही लिंग
के व्यक्तियों में परस्पर विरोध होने की, अर्थात् पुत्री का माता से, और पिता
का पुत्र से विरोध होने की प्रवृत्ति हम देखते हैं। पुत्री को उसकी माता ऐसे
हाकिम के रूप में दिखाई देती है जो उसकी इच्छाओं पर रुकावटें लगाती है, और
जिसका काम यही है कि वह अपनी पुत्री से यौन आज़ादी का उतना त्याग कराए जितना
समाज चाहता है। कुछ अवस्थाओं में माता भी प्रतिद्वन्द्वी होती है, जो
उपेक्षित नहीं होना चाहती। यही
बात पिता और पुत्र के वीच और भी उग्ररूप में होती है। पुत्र के लिए पिता उन
सामाजिक बन्धनों का मूर्तरूप है जिन्हें वह बड़ी अनिच्छा से स्वीकार करता है।
उसके लिए पिता ही वह व्यक्ति है जो बालकपन के यौन आनन्दों की और जब पारिवारिक
सम्पत्ति हो तब उसका सुख भोगने की उसकी इच्छा पूरी करने के मार्ग में रुकावट
बनता है। जब राजसिंहासन का प्रश्न हो, तब यह अधीरता दुःखदायी तीव्रता तक जा
पहुंचती है। पिता और पुत्री या माता और पुत्र का सम्बन्ध कम विनाशकारी मालूम
होता है। माता और पुत्र का सम्बन्ध अपरिवर्तित कोमलता का सबसे शुद्ध उदाहरण
है, जिसमें अहंकार की किसी भावना से फर्क नहीं पड़ता।
आप पूछेगे कि मैं ऐसी तुच्छ और हर किसी को ज्ञात बातों की चर्चा क्यों कर रहा
हूं। इसका कारण यह है कि लोगों के मन में यह असन्दिग्ध प्रवृत्ति मौजूद है कि
वे वास्तविक जीवन में इन बातों के तात्पर्य का निषेध करते हैं और सामाजिक
आदर्श जितना वास्तव में पूरा होता है, उससे अधिक पूरा होने की बात जाहिर करते
हैं, पर अधिक अच्छा यह है कि मनोविज्ञान ही सचाई बताए और यह कार्य
विश्वनिन्दक या 'सिनिक' लोगों के लिए न छोड़ दे। यह सच है कि यह सामान्य
निषेध सिर्फ वास्तविक जीवन के बारे में किया जाता है; क्योंकि नाटक-उपन्यास
में ऊपर बताए गए प्रेरक भावों का प्रयोग करने की आज़ादी है, जिससे इन आदर्शों
को भारी चोट पहुंचती है।
इसलिए यदि अधिकतर लोगों के स्वप्नों से यह प्रकट होता है कि वे अपने जनकों
की, विशेषरूप से उस जनक की, जो स्वप्नद्रष्टा के समान लिंग वाला है, मृत्यु
चाहते हैं तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। हम यह मान सकते हैं कि यह इच्छा
जाग्रत जीवन में भी, कभी-कभी चेतना में भी रहती है, यदि वह किसी और प्रेरक
भाव के पीछे अपने को छिपा सके, जैसे कि हमारे तीसरे उदाहरण से स्वप्नद्रष्टा
ने अपने पिता के बेकार कष्ट-सहन पर दया के द्वारा अपने वास्तविक विचार को
छिपा दिया। ऐसा बहुत कम होता है कि विरोध-भाव अकेला ही बना रहे-अधिकतर यह
कोमल भावनाओं के सामने झुक जाता है, और वे अन्त में इसे अवरुद्ध कर देती हैं,
अर्थात् दबा देती हैं, और यह पड़ा रहता है, और अन्त में स्वप्न मानो इसे
अकेले रूप में प्रदर्शित करता है। जिस चीज़ को स्वप्न इस अकेलेपन द्वारा बहुत
बढ़ाए गए रूप में दिखाता है, यह तब अपना असली आकार ग्रहण कर लेती है, जब
हमारा निर्वचन स्वप्नद्रष्टा के शेष जीवन की दृष्टि से इसे इसका उचित स्थान
दे दे (एच० सैक्स)। पर यह मृत्यु की इच्छा हमें वहां भी दिखाई देती है जहां
वास्तविक जीवन में इसका कोई आधार नहीं होता, और जहां बड़ी उम्र वाले युवक को
कभी भी यह स्वीकार नहीं करना पड़ेगा कि उसने जाग्रत जीवन में इसे अपनाया था।
इसका कारण यह है कि विरोध का, विशेष रूप से एक ही लिंग वाले जनक और सन्तान
में आपसी विरोध का, सबसे गहरा और सबसे आम प्रेरक कारण बालकपन के आरम्भिक
वर्षों में क्रियाशील हुआ था।
मेरा संकेत अनुराग-भावनाओं की उस प्रतिद्वन्द्विता की ओर है जिसमें
लिंगसम्बन्धी तत्त्वों पर स्पष्टतः बल होता है। पुत्र जब बहुत छोटा है, तभी
उसमें अपनी माता के प्रति एक विशेष ममता पैदा होने लगती है-वह अपनी माता को
अपनी निजी सम्पत्ति समझता है और पिता को ऐसे प्रतिद्वन्द्वी के रूप में देखता
है जो उस अकेले की इस सम्पत्ति, उसके इस एकाकी स्वामित्व, का विरोधी है। इसी
प्रकार, छोटी लड़की अपनी माता को ऐसे व्यक्ति के रूप में देखती है जो उसके
पिता के साथ उसके अनुराग के सम्बन्ध में बाधा डालती है, और ऐसा स्थान घेरे
हुए है जिसकी, वह अनुभव करती है कि, मैं स्वयं अच्छी तरह पूर्ति कर सकती हूं।
प्रेक्षण से पता चलता है कि इन भावनाओं का अस्तित्व कितना प्राचीन है। इन
भावनाओं को हम ईडिपस ग्रन्थि1 कहते हैं, क्योंकि ईडिपस की कहानी में पुत्र की
स्थिति से पैदा होने वाली इच्छाओं के दो चरम रूप-पिता को मार डालने और माता
से विवाह करने की इच्छा-सिर्फ थोड़े-से परिवर्तित रूप में पूरे हो जाते हैं।
मैं इस बात पर बल नहीं देता कि जनकों और सन्तानों में जितने सम्बन्ध हो सकते
हैं, वे सब ईडिपस ग्रन्थि के अन्तर्गत ही आते हैं। ये सम्बन्ध और भी अधिक
उलझन-भरे हो सकते हैं। फिर यह ग्रन्थि कम या अधिक परिवर्धित हो सकती है, या
यह अपवर्तित हो सकती है, पर यह बालक के मानसिक जीवन में एक नियमित और बहुत
महत्त्वपूर्ण कारक है। इसके प्रभाव और इससे पैदा होने वाली अन्य घटनाओं का
महत्त्व जितना अधिक समझा जाए, उतना ही थोड़ा है। इसके अलावा जनक बहुत बार
स्वयं बच्चों को ईडिपस ग्रन्थि से प्रतिक्रिया करने के लिए उद्दीपित करते
हैं, क्योंकि वे अपने बच्चों के लिंग-भेद के अनुसार प्रायः उन्हें पसन्द या
नापसन्द करते हैं, अर्थात् पिता पुत्री को, और माता पुत्र को पसन्द करती है,
या जहां पति-पत्नी का प्रेम शिथिल हो गया है, वहां सन्तान को प्रेम के उस
आलंबन का स्थानापन्न बना लिया जाता है, जिसका आकर्षण खत्म हो गया है।
यह नहीं कहा जा सकता कि ईडिपस ग्रन्थि की खोज के लिए संसार ने
मनोविश्लेषण-सम्बन्धी गवेषणा के प्रति बहुत कृतज्ञता प्रकट की है। इसके
विपरीत, इस विचार से बड़ी उम्र के लोगों में बड़ा उग्र विरोध पैदा हुआ है और
जिन्होंने सब जगह निषिद्ध और घणित माने जाने वाले भावों के अस्तित्व का खण्डन
करने में अपनी आवाज़ नहीं उठाई, उन्होंने बाद में ऐसे अप्रासंगिक निर्वचन पेश
करके उसकी कमी पूरी कर दी जिनसे ईडिपस ग्रन्थि का महत्त्व खत्म हो जाए। मेरा
अपना यह अटल विश्वास है कि इसमें न तो कोई खण्डन करने योग्य बात है और न
प्रसन्न होने की बात है-हमें उन तथ्यों से अपने मन की संगति बैठा लेनी चाहिए
जिनमें यूनानी पौराणिक कथा में अटल नियति का हाथ दिखलाई देता था। फिर यह
कितनी मनोरंजक बात है कि ईडिपस ग्रन्थि, जिसको वास्तविक जीवन से दूर कर दिया
गया है, और उपन्यासों में पहुंचा दिया गया है, उनमें अपने पूर्णरूप में
परिवर्धित हो गई है। ओ० रैंक ने इस आधार पर सावधानी से अध्ययन करके यह
दिखलाया है कि किसी तरह इसी ग्रन्थि से नाटकीय काव्य को असंख्य रूपों.
रूप-भेदों और छिपे हए रूपों में, संक्षेप में कहा जाए तो उसी तरह विपर्यस्त
होकर जिस तरह स्वप्न-सेन्सरशिप के कार्य में हम देख आए हैं, बड़ी मात्रा में
प्रेरक भाव प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार हम
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1. Oedipus Complex
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