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मनोविश्लेषण

सिगमंड फ्रायड

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :392
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8838
आईएसबीएन :9788170289968

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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद



व्याख्यान

14

इच्छापूर्ति

मैं क्या उन क्रमिक पड़ावों की आपको फिर याद दिलाऊं जिनसे हम अपनी वर्तमान अवस्था में पहुंचे हैं? जब अपनी विधि का प्रयोग करते हुए हम स्वप्नों में होने वाले विपर्यास पर पहुंचे थे, तब हमने कुछ समय के लिए इस पर विचार छोड़ देने का निश्चय किया था और स्वप्नों की प्रकृति के बारे में कोई निश्चित जानकारी हासिल करने के लिए बचपन के स्वप्नों पर विचार किया था। इसके बाद इस जांच के परिणाम प्राप्त करके हमने सीधे ही स्वप्नविपर्यास की समस्या पर विचार किया और मुझे आशा है कि थोड़ा-थोड़ा करके हमने इसे अच्छी तरह समझ लिया है! परन्तु अब हमें यह मानना पड़ेगा कि इन दो दिशाओं में हम जिन परिणामों पर पहुंचे हैं, वे पूरे-पूरे मेल नहीं खाते और यही उचित होगा कि हम अपने परिणामों में मेल बैठाएं।

दोनों जांच-पड़तालों से यह स्पष्ट हो गया है कि स्वप्नतन्त्र की सारभूत विशेषता यह है कि विचारों का मतिभ्रमात्मक अनुभव में रूपान्तर हो जाता है। यह देखकर चकित रह जाना पड़ जाता है कि यह प्रक्रम जैसे हो जाता है, परन्तु यह सामान्य मनोविज्ञान का विचार करने की समस्या है, और हमें यहां इस पर विचार नहीं करना है। बालकों के स्वप्नों से हमें यह पता चलता है कि स्वप्नतन्त्र का उद्देश्य किसी इच्छा की पूर्ति द्वारा ऐसे मानसिक उद्दीपन को दूर कर देना है जो नींद में बाधा डाल रहा है। विपर्यस्त स्वप्नों के बारे में हम कोई ऐसी ही बात तब तक नहीं कह सकते थे, जब तक हम उनके अर्थ लगाने का तरीका न समझ लें, पर शुरू से हमें यह आशा थी कि हम उनके विषय में अपने विचारों का अपने शैशवीय स्वप्न विषयक विचारों से मेल बैठा सकेंगे। यह आशा पहली बार तब पूरी हुई जब हमने यह देखा कि सब स्वप्न असल में शैशवीय स्वप्न है, कि उनमें बचपन की सामग्री का प्रयोग होता है, और बच्चों के मन में रहने वाले आवेग और तन्त्र उनमें स्पष्ट रूप से होते हैं। जब हम यह महसूस करते हैं कि स्वप्नों में होने वाले विपर्यास को हमने अच्छी तरह समझ लिया है, तब हमें यह पता लगाना चाहिए कि यह धारणा विपर्यस्त स्वप्नों के बारे में भी सही है या नहीं, कि स्वप्न इच्छापूर्ति होते हैं।

अभी हमने कई स्वप्नों का अर्थ लगाया था, पर उनमें इच्छापूर्ति के प्रश्न पर बिलकुल विचार नहीं किया था। मैं निश्चित रूप से समझता हूं कि उन पर विचार करते हए यह प्रश्न बार-बार आपके मन में उठता रहा, 'उस इच्छापूर्ति का क्या हआ जिसे स्वप्नतन्त्र का उद्देश्य माना जाता है?' यह प्रश्न अवश्य महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि सामान्य लोगों में से हमारे आलोचक निरन्तर यह प्रश्न पूछते हैं। आप जानते ही हैं कि मनुष्य-जाति में बौद्धिक नवीनताओं के प्रति सहज उदासीनता है। इसके प्रकट होने का एक तरीका यह है कि ऐसी किसी भी नवीनता को तुरन्त उसके छोटे से रूप में ले आया जाता है और यदि सम्भव हो तो उसे किसी रूढ़ोक्ति का रूप दे दिया जाता है। 'इच्छापूर्ति' स्वनों के नये सिद्धान्त के लिए एक रूढोक्ति हो गई है। लोग सुनते हैं कि स्वप्नों को इच्छापूर्ति बताया जाता है। तब वे पूछते हैं, 'इच्छापूर्ति कहां से पैदा होती है?' और उनके यह प्रश्न पूछने का अर्थ यह है कि वे उस विचार को ही अस्वीकार करते हैं। उन्हें तुरन्त अपने ऐसे असंख्य स्वप्न याद आ जाते हैं जिनमें बड़ी अप्रिय भावना अनुभव हुई थी, और कभी-कभी तो बड़ा पीड़ाकारक भय तक अनुभव हुआ था, और इस प्रकार स्वप्नों के विषय में मनोविश्लेषण के सिद्धान्त का यह कथन उन्हें बहुत असम्भाव्य मालूम होता है। इसका आसानी से यह जवाब दिया जा सकता है, कि विपर्यस्त स्वप्नों में इच्छापूर्ति खुले रूप में प्रकट नहीं होती, बल्कि उसे खोजना पड़ता है। इसलिए यह तब तक प्रदर्शित नहीं की जा सकती जब तक स्वप्नों का अर्थ न लगाया गया हो। आप यह भी जानते हैं कि इन विपर्यस्त स्वप्नों की तह में कार्य कर रही इच्छाएं वे होती हैं जिन्हें सेन्सरशिप ने निषिद्ध और अस्वीकृत कर दिया है, और कि उनके होने के कारण ही विपर्यास पैदा होता है, और सेन्सरशिप का हस्तक्षेप होता है। परन्तु सामान्य व्यक्ति को यह समझना कठिन है कि हमें स्वप्न का अर्थ लगाने से पहले उसमें इच्छापूर्ति होने के विषय में प्रश्न नहीं उठाना चाहिए। वह सदा इस बात को भूल जाता है। उसकी इच्छापूर्ति के सिद्धान्त को मानने की इच्छा असल में स्वप्नसेन्सरशिप का ही परिणाम है, जो उसे वास्तविक विचार के स्थान पर एक स्थानापन्न लाने को प्रेरित करती है, और इन काट-छांट की हुई स्वप्न-इच्छाओं को उसके अस्वीकार कर देने से ही पैदा होती है।

निःसन्देह, हमें खुद यह आवश्यकता महसूस होनी चाहिए कि इतने सारे स्वप्नों की वस्तु कष्टकारक होने का स्पष्टीकरण करें, पर विशेष रूप से हम यह जानना चाहेंगे कि हमें चिन्ता-स्वप्न क्यों आते हैं। यहां पहली बार, हमारे सामने स्वप्नों में भावों या मनोविकारों की समस्या आती है। इस समस्या पर विशेष विचार करने की आवश्यकता है, पर बदकिस्मती से हम इस पर इस समय विचार नहीं कर सकते। यदि स्वप्न इच्छापूर्ति है तो कोई कष्टदायक भाव कभी भी इसमें नहीं आने चाहिए : इस बारे में सामान्य आदमी का कहना ठीक मालूम होता है, पर इस मामले में तीन बातें उलझनें पैदा करती हैं, जिन्हें सामान्य लोग नज़रन्दाज़ कर देते हैं।

पहली : हो सकता है कि स्वप्नतन्त्र इच्छापूर्ति की सृष्टि करने में पूरी तरह सफल न हुआ हो, और इस कारण गुप्त विचारों की कष्टकारी भावना का कुछ अंश व्यक्त स्वप्न में भी आ गया हो। तब मनोविश्लेषण को यह दिखाना होगा कि ये विचार उस स्वप्न की अपेक्षा बहुत अधिक कष्टकारी थे, जो इनसे बना है। इतनी बात हर उदाहरण में सिद्ध की जा सकती है। तो हम स्वीकार करते हैं कि स्वप्नतन्त्र का प्रयोजन सफल नहीं हुआ क्योंकि प्यास के उद्दीपन से उत्पन्न पीने के स्वप्न से वह प्यास नहीं बुझती। इसके बाद भी आदमी प्यासा रहता है और उसे जागकर पानी पीना पड़ता है। तो भी, यह एक ठीक स्वप्न है; इसमें इसके सारभूत स्वरूप की किसी बात का अभाव नहीं है। हर सूरत में स्पष्ट रूप से पहचाना जा सकने वाला आशय तो प्रशंसनीय है ही। स्वप्नतन्त्र में विफलता होने के ये उदाहरण बहुत काफी मिलते हैं, और इसका एक कारण यह है कि स्वप्नतन्त्र के लिए वस्तु का रूप-भेद करने की अपेक्षा भाव के स्वरूप में अभीष्ट परिवर्तन लाना बहुत कठिन होता है। भाव प्रायः वश में नहीं आते, इसलिए यह होता है कि स्वप्नतन्त्र के प्रक्रम में स्वप्न-विचारों की कष्टकारक वस्तु इच्छापूर्ति का रूप ले लेती है, पर कष्टकारक भाव जैसे का तैसा कायम रहता है। जब यह होता है तब भार और वस्तु में कोई मेल नहीं होता, जिससे आलोचकों को यह कहने का अवसर मिलता है कि स्वप्न इच्छापूति से बिलकुल भिन्न चीज़ है क्योंकि हानिरहित वस्तु के साथ भी स्वप्न में कष्टकारक भावनाएं जुड़ी होती हैं। इस नासमझी की सी बात का हम यह उत्तर देंगे कि इस तरह के स्वप्नों में ही स्वप्नतन्त्र की इच्छापूर्ति की प्रकृति सबसे अधिक दिखाई देती है, क्योंकि यह वहां सबसे अलग अकेली नज़र आती है। इस आलोचना में भूल इसलिए होती है कि जो लोग स्नायुरोगों से परिचित नहीं हैं, वे वस्तु और भाव में वस्तुतः जितना सम्बन्ध है, उससे अधिक नज़दीकी सम्बन्ध की कल्पना करते हैं, और इसलिए यह नहीं समझ सकते कि वस्तु में परिवर्तन होते हुए भी उसके साथ वाला भाव अपरिवर्तित रह सकता है।

दूसरी बात, जो इससे भी अधिक महत्त्व की है. पर साधारण लोगों द्वारा इसी तरह उपेक्षित कर दी जाती है, वह है : इच्छापूर्ति से निश्चित रूप से कुछ सुख मिलना चाहिए, पर वे पूछते हैं, 'किसे?' निःसन्देह उस व्यक्ति को जिसमें वह इच्छा है, पर हम जानते हैं कि स्वप्नद्रष्टा का अपनी इच्छाओं के प्रति एक विचित्र रुख होता है; वह उन्हें अस्वीकार करता है, उनमें काट-छांट करता है; संक्षेप में, वह उनसे कोई वास्ता नहीं रखना चाहता। इसलिए उनकी पूर्ति उसे कोई सुख नहीं दे सकती, बल्कि इससे उल्टी अनुभूति देगी और यहां अनुभव से पता चलता है कि यह 'विपरीत या उल्टी' अनुभूति जिसकी अभी व्याख्या करनी है, चिन्ता का रूप ग्रहण करती है। जहां तक स्वप्नद्रष्टा की इच्छाओं का प्रश्न है, वे ऐसे दो पृथक् व्यक्तियों के समान हैं जो किसी महत्त्वपूर्ण साझी बात द्वारा घनिष्ठ रूप से जडे हए हैं। इसके विस्तार में जाने के बजाय मैं आपको वह प्रसिद्ध 'परी की कहानी' याद दिलाऊंगा, जिसमें आप इन सम्बन्धों की आवृत्ति होती देखेंगे। एक भली परी ने किसी गरीब आदमी और उसकी स्त्री से उनकी किन्हीं तीन इच्छाएं पूरी करने का वायदा किया। वे खुश हो गए और उन्होंने अपनी इच्छाएं सावधानी से चुनने का निश्चय किया। परन्तु स्त्री अगली झोंपड़ी में पकाए जा रहे कोफ्ते की गन्ध से आकृष्ट हो गई, और उसने उस जैसे दो कोफ्ते अपने लिए प्राप्त करने की इच्छा की, और वे फौरन हाज़िर हो गए-इस तरह पहली इच्छा पूरी हो गई। इस पर पुरुष आपे से बाहर हो गया और गुस्से में उसने यह इच्छा की कि वे दोनों कोफ्ते उसकी पत्नी की नाक की नोक पर लटक जाएं। यह भी हो गया। वे कोफ्ते अपने स्थान से नहीं हटाए जा सके। इस तरह दूसरी इच्छा भी पूरी हो गई। पर यह पुरुष की इच्छा थी और इसकी पूर्ति स्त्री के लिए बहुत अप्रिय थी। बाकी कहानी आप जानते हैं : क्योंकि आखिरकार वे पति-पत्नी थे, इसलिए उसे तीसरी इच्छा यह करनी पड़ी की कोफ्ते स्त्री की नाक की नोक पर से हट जाएं। हम इस परी की कहानी का दूसरे प्रसंगों में बहुत बार प्रयोग कर सकते हैं, पर यहां मैं इससे सिर्फ यह तथ्य स्पष्ट करना चाहता हूं कि हो सकता है कि एक व्यक्ति की इच्छा की पूर्ति किसी दूसरे के लिए बड़ी अरुचिकर हो, जब तक कि वे दोनों व्यक्ति पूरी तरह एकरूप और एकात्म न हों।

अब 'चिन्ता-स्वप्नों' को और भी अधिक अच्छी तरह समझना कठिन नहीं रहेगा। एक प्रेक्षण का उपयोग और करना है, और इसके बाद हम ऐसी परिकल्पना बना सकते हैं जिसका कई बातों से समर्थन होता हो। वह प्रेक्षण यह है कि चिन्तास्वप्नों में प्रायः ऐसी वस्तु होती है जिसमें कोई विपर्यास नहीं होता। ऐसा लगता है, मानो वह सेन्सरशिप से बच निकली है। इस तरह वह स्वप्न एक अप्रच्छन्न, अर्थात् अपने स्पष्ट रूप में दिखाई देने वाली, इच्छापूर्ति होता है और इसमें इच्छा वह नहीं होती जिसे स्वप्नद्रष्टा स्वीकार करना चाहता है, बल्कि वह होती है जिसे उसने अस्वीकार कर दिया है। सेन्सरशिप की क्रिया होने के स्थान पर चिन्ता पैदा हो गई है। शैशवीय स्वप्न तो स्वप्नद्रष्टा द्वारा स्वीकृत इच्छा की खुलेआम पूर्ति होता है, और साधारण विपर्यस्त स्वप्न दमित1 अर्थात् अधिक दबाई गई, इच्छा की प्रच्छन्न अर्थात् अस्पष्ट या छिपी हुई पूर्ति होता है। परन्तु चिन्ता-स्वप्न का सूत्र यह है कि यह दमित इच्छा की खुलेआम पूर्ति होता है। चिन्ता इस बात का संकेत है कि दमित इच्छा सेन्सरशिप की अपेक्षा अधिक प्रबल सिद्ध हुई है, और उसके बावजूद अपनी पूर्ति कर चुकी है, या करने वाली थी। हम यह बात समझ सकते हैं कि हमारे लिए, जो सेन्सरशिप के पक्ष में हैं, दमित इच्छा की पूर्ति दुःखदायी भाव पैदा करने और कोई सफाई पेश करने की बात ही हो सकती है तो यदि आप चाहें तो इस तरह कह सकते हैं कि हमारे स्वप्नों में व्यक्त चिन्ता वह चिन्ता है जो उन इच्छाओं की प्रबलता के कारण अनुभव होती है जिन्हें और मौकों पर हम दबा दिया करते हैं। फिर स्वप्नों के अध्ययन से हमें पता नहीं चलता कि यह सफाई चिन्ता का रूप क्यों ले लेती है। स्पष्ट है कि हमें चिन्ता पर दूसरे प्रसंगों में विचार करना चाहिए।

जो परिकल्पना बिना किसी विपर्यास वाले चिन्ता-स्वप्नों के लिए ठीक है, वह उन स्वप्नों के लिए भी जिनमें कुछ विपर्यास हो गया है, और दूसरी प्रकार के अप्रिय स्वप्नों के लिए भी, जिनमें उससे उत्पन्न अप्रिय भावनाएं सम्भवतः चिन्ता के पास तक जा पहुंचती हैं, मानी जा सकती हैं। साधारणतया चिन्ता-स्वप्न हमें जगा देते हैं। प्रायः हम अपनी नींद उस समय पहले ही तोड़ देते हैं, जब स्वप्न की तह में मौजूद, दमित इच्छा सेन्सरशिप को हराकर पूर्ण पूर्ति तक पहुंचती है। ऐसी अवस्था में स्वप्न अपना प्रयोजन पूरा नहीं कर सका, पर इससे इसकी सारभूत विशेषता नहीं बदल गई। हमने स्वप्न की तुलना रात के चौकीदार से की है। वह नींद का पहरेदार है और उसका प्रयोजन नींद में रुकावट को रोकना है। रात के चौकीदारों को भी उस समय स्वप्नों की ही तरह सोनेवालों को जागना पड़ता है जब वे गड़बड़ी या संकट के कारण को दूर करने में अकेले समर्थ नहीं होते। तो भी, कभी-कभी हमें तब भी नींद जारी रखने में सफलता हो जाती है जब हमारे स्वप्न हमें कुछ बेचैन करने लगते हैं, और चिन्ता पैदा करने लगते हैं। हम नींद से अपने-आपसे कहते हैं, 'आखिर यह स्वप्न ही तो है, और सोते रहते हैं।

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1. Repressed

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