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मनोविश्लेषण

सिगमंड फ्रायड

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :392
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8838
आईएसबीएन :9788170289968

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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद



2. दूसरी तरह के ऐतराज़ों का ऐसी भावनाओं से निकट सम्बन्ध है जिनसे शायद आप भी नहीं बचे हैं, और वे ये हैं कि हमारे स्वप्न-निर्वचन की रीति से प्राप्त कई परिणाम खींच-तान या ज़बरदस्ती लाए गए या मजाक-से लगते हैं। यह आलोचना इतनी अधिक होती है कि मैं उस आलोचना पर विचार करूंगा जो मेरे काम में सबसे पीछे हुई थी। अब सुनिए : आज़ाद देश स्विट्ज़रलैंड में हाल ही में एक हेडमास्टर से इस कारण अपने पद से त्यागपत्र देने को कहा गया कि वह मनोविश्लेषण में दिलचस्पी रखता था। उसने विरोध किया, और बन के एक अखबार में उसके मामले पर स्कूल अधिकारियों का फैसला प्रकाशित किया गया। उस लेख से मैं मनोविश्लेषण सम्बन्धी कुछ वाक्य उद्धृत करूंगा, 'इसके अलावा, उक्त पुस्तक में ज्यूरिच के डा० फिस्टर द्वारा दिए गए उदाहरण में कितनी खींचतान की गई है, यह देखकर हम चकित रह गए। यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि एक ट्रेनिंग कालेज के हेडमास्टर ने इस तरह के वचनों और सिर्फ ऊपर से ठीक दीखने वाली गवाहियों को इतने अंधविश्वास के साथ स्वीकार कर लिया। ये, वाक्य 'एक शान्त मन से फैसला करने वाले' की अन्तिम राय बताए गए हैं। मुझे यह शान्त मन वाली बात झूठी मालूम होती है। इन वचनों पर इस आशा से ज़रा बारीकी से विचार कीजिए कि इस विषय पर थोड़े विचार और जानकारी से 'शान्त मन के फैसले' को भी कोई हानि नहीं होगी।

यह देखकर सचमुच बड़ा आश्चर्य होता है कि कोई आदमी सिर्फ अपने ऊपर पड़े पहले प्रभाव के आधार पर इतनी जल्दी और निर्धांत रूप से मनोविज्ञान के किसी कठिन प्रश्न पर मत स्थिर कर सकता है। उसे निर्वचन खींच-तान से किए गए मालूम होते हैं, और उसे वे नहीं जंचते इसलिए वे गलत हैं, और यह सारा काम बिलकुल कूड़ा है। ऐसे आलोचक इस सम्भावना को अपने पास भी नहीं फटकने देते कि निर्वचनों के ऐसे ही होने के लिए काफी अच्छी युक्तियां हो सकती हैं। यदि वे इस सम्भावना को समझते हैं तो अगला प्रश्न यह होगा कि वे प्रबल युक्तियां क्या इस आलोचना का आधार वह परिस्थिति है जिसका विस्थापन के प्रभाव से आवश्यक सम्बन्ध है, और विस्थापन स्वप्न-सेन्सरशिप का सबसे प्रबल हथियार बताया गया है। इसकी सहायता से स्थानापन्न रचनाएं बनती हैं, जिन्हें हम अस्पष्ट निर्देश कहते हैं। पर ये अस्पष्ट निर्देश ऐसे होते हैं, जिन्हें इस रूप में पहचानना तथा उसके पीछे की ओर चलकर असली विचार को खोजना भी आसान नहीं होता, क्योंकि वे इसके साथ बड़े असाधारण और कभी-कभी होने वाले बाहरी साहचर्यों द्वारा जुड़े रहते हैं। पर इस सबका सम्बन्ध ऐसी वस्तुओं से होता है जिन्हें छिपाना इष्ट होता है, स्वप्न-सेन्सरशिप का ठीक यही उद्देश्य है। पर हमें छिपाई गई वस्तु उसी स्थान पर देखने से मिल जाने की आशा न करनी चाहिए जहां यह सामान्यतया होती है। आजकल इस विषय में सीमान्त-निरीक्षण अधिकारी स्कूल अधिकारियों की अपेक्षा कहीं अधिक होशियार हैं, क्योंकि वे निश्चित कागजात खोजते हुए सिर्फ पोर्टफोलिओ और चिट्ठियों के थैलों की तलाशी लेकर ही सन्तुष्ट नहीं हो जाते, बल्कि उन्हें यह सम्भावना भी रहती है कि जासूस और तस्कर कोई आपत्तिजनक चीज़ अपने शरीर में ऐसे स्थान पर छिपाकर न ले जाएं जहां उन्हें देखना बहुत मुश्किल है, या जहां रखने योग्य वे वस्तुएं नहीं होती; उदाहरण के लिए, अपने बूटों की दोहरी तलियों में। यदि छिपाई हुई वस्तुएं यहां मिल जाएं तो निश्चित ही यह कहना सच है कि उन्हें 'घसीटकर रोशनी में लाया गया', पर फिर भी वे एक बहुत अच्छी 'खोज' हैं।

हम यह मानते हैं कि गुप्त स्वप्न-अवयव और इसके व्यक्त स्थानापन्न का सम्बन्ध कभी-कभी बहुत असामान्य और बहुत दूर का प्रतीत होता है, यहां तक कि कभी-कभी वह उपहास योग्य-सा मालम होता है, और इसका कारण यह है कि हमें ऐसे बहुत सारे उदारहणों का अनुभव है जिनमें हम स्वयं अर्थ नहीं खोज सके। सिर्फ हमारे प्रयत्नों से इन निर्वचनों पर पहुंचना प्रायः असम्भव होता है। कोई भी समझदार आदमी उन दोनों को जोड़ने वाले सम्बन्ध का अन्दाज़ा नहीं कर सकता। या तो स्वप्नद्रष्टा किसी प्रत्यक्ष साहचर्य के द्वारा सीधे ही पहेली सुलझा देता है (वही इसे सुलझा सकता है क्योंकि स्थानापन्न रचना उसके ही मन में पैदा हुई है), अथवा वह इतनी अधिक सामग्री दे देता है कि उसे हल करने के लिए विशेष जांच-पड़ताल की ज़रूरत नहीं पड़ती-हल आपसे-आप हमारे ऊपर आ पड़ता है। यदि स्वप्नद्रष्टा इनमें से किसी भी तरीके से हमारी मदद नहीं करता तो वह व्यक्त अवयव सदा के लिए हमारी समझ से बाहर रहेगा। इस तरह का एक और उदाहरण देखिए जो हाल में ही हुआ था। मेरी एक रोगिणी का पिता उसके इलाज के दिनों में गुज़र गया और इसके बाद वह अपने स्वप्नों में हर मौके पर उसे जीवित देखा करती थी। इनमें से एक स्वप्न में उसका पिता एक ऐसे सिलसिले में दिखाई दिया जो वैसे लागू नहीं हो सकता था, और बोला, 'अब सवा ग्यारह बजे हैं, अब साढ़े ग्यारह बजे हैं, अब पौने बारह बजे हैं। इस अजीब-सी बात के अर्थ के बारे में वह इतना ही साहचर्य बता सकी कि उसका पिता उस समय बड़ा प्रसन्न होता था जब उसके बड़े बालक दोपहर के भोजन में ठीक समय पर पहुंचते थे। यह बात स्वप्न-अवयव के साथ निश्चित रूप से जंचती थी, पर इससे इसके पैदा होने के कारण पर कोई रोशनी नहीं पड़ती थी। इलाज में हम जिस स्थिति पर पहुंच गए थे, उसके कारण इस सन्देह के लिए काफी आधार मालूम होता था कि इसके स्वप्न में अपने प्रिय और सम्मानित पिता के प्रति किसी विरोध का हाथ है, पर उस विरोध को सावधानी से दवा दिया गया है। अपने और साहचर्य बताते हुए, जो इस स्वप्न से विलकुल दूर मालूम होते थे, उसने बताया कि मैंने पिछले दिन मनोवैज्ञानिक समस्याओं पर एक लम्बा विवेचन सुना था, और एक रिश्तेदार ने मुझसे कहा था, "उरमेन्श (Urmensch:आदिम मानव) हम सबके अन्दर जीवित है।' अब हमें नई रोशनी दिखाई दी। अब इसे भी यह कल्पना करने का बहुत अच्छा मौका मिल गया है कि उसका मृत पिता जीवित है और उसने स्वप्न में उसे 'उहरमेन्श' (Uhrmensch : समय बताने वाला) बना दिया जो दोपहर के भोजन के समय तक हर पन्द्रह मिनट का समय बताता था।

इसमें एक श्लेष जैसी चीज़ स्पष्ट दिखाई देती है, और सचाई तो यह है कि बहुत बार स्वप्न देखने वाले का श्लेष निर्वचनकर्ता के ज़िम्मे डाल दिया जाता है।

और भी ऐसे उदाहरण हैं जिनमें यह फैसला करना आसान नहीं है कि हम जिस चीज़ पर विचार कर रहे हैं, वह मज़ाक है या स्वप्न। पर आपको याद होगा कि बोलने की कुछ गलतियों में भी यही सन्देह पैदा हुआ था। एक आदमी ने यह स्वप्न सुनाया कि मैं अपने चाचा के साथ उसकी आटो (मोटर) में बैठा था और मेरे चाचा ने मुझे चम लिया। स्वप्नद्रष्टा ने स्वयं फौरन ही यह निर्वचन पेश किया : इसका अर्थ था 'आटो-एरोटिज़्म' अर्थात् आत्मरति (यह शब्द हमारे लिबिडो अर्थात् रागवृत्ति के सिद्धान्त में प्रयुक्त होता है और इसका अर्थ है प्रेम के किसी बाहरी आलम्बन के बिना प्राप्त परितुष्टि)। अब प्रश्न यह है कि क्या यह आदमी हमारा मज़ाक उड़ाकर खुश हो रहा था और यह दिखा रहा था कि उसके मन में आया हुआ श्लेष या व्यंग्य एक स्वप्न का हिस्सा था। में ऐसा नहीं समझता : उसे सचमुच ही यह स्वप्न आया था। पर स्वप्नों और मज़ाकों में यह अजीब समानता कहां से हो जाती है? एक बार इस प्रश्न ने मुझे मेरे रास्ते से कुछ दूर कर दिया था क्योंकि इसके कारण मेरे लिए व्यंग्य-परिहास के प्रश्न पर बारीकी से जांच करना आवश्यक हो गया। इससे मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि व्यंग्य-परिहास का जन्म इस तरह होता है : एक पूर्वचेतन1 विचार-श्रृंखला कुछ क्षण के लिए अचेतन विशदन के प्रक्रम से प्रभावित होती है जिससे वह एक व्यंग्योक्ति के रूप में पैदा होती है। अचेतन के प्रभाव में रहते हुए यह वहां क्रियाशील तन्त्रों, संघनन और विस्थापन्न से प्रभावित होती है, अर्थात् उन्हीं प्रक्रमों से प्रभावित होती है जो हमें स्वप्नतन्त्र में कार्य करते दिखाई दिए थे, और स्वप्न तथा व्यंग्य-परिहास में कभी-कभी जो समानता दिखाई देती है, उसका कारण दोनों का यह सामान्य गुण ही है। पर बिना किसी भीतरी मतलब वाला 'स्वप्न-परिहास' हमें उतना मनोरंजक नहीं लगता, जितनी कोई सामान्य व्यंग्योक्ति लगती है। व्यंग्यपरिहास के गहरे अध्ययन से आपको इसका कारण पता चल जाएगा। 'स्वप्नपरिहास' बहुत घटिया परिहास मालूम होता है, यह हमें हंसाता नहीं, बल्कि उदासीन कर देता है।

इस मामले में हम स्वप्न-निर्वचन के प्राचीन तरीके के रास्ते पर चल रहे हैं  जिसने हमें बहुत-सी बेकार बातों के अलावा निर्वचन के बहुत-से ऐसे मूल्यवान उदाहरण भी दिए हैं, जिनसे अच्छे उदाहरण हमें नहीं मिल सकते। मैं आपको एक ऐसा स्वप्न सुनाऊंगा जिसका महत्त्व इतिहासप्रसिद्ध है और जो मामूली फर्क के साथ प्लूटार्क तथा डैल्डिस के आर्टेमीडोरस ने बयान किया है-यह स्वप्न सिकन्दर महान ने देखा था। जब वह टायर नगर का घेरा डाले पड़ा था और टायर नगर डटकर मुकाबला कर रहा था (ई० पू० 322), तब उसने एक रात को स्वप्न में एक नाचता हुआ सैटायर (एक यूनानी देवता) देखा। स्वप्न-निर्वचक ऐरिस्टैंडरौस ने, जो सेना के अभियानों में साथ-साथ चलता था, इस स्वप्न का अर्थ 'सैटायरोस' शब्द को 'सै' तथा 'टायरोस' ('टायर तेरा है') में बांटकर लगाया और इससे उस नगर पर सिकन्दर की विजय की भविष्यवाणी की। इस निर्वचन के कारण सिकन्दर ने घेरा जारी रखा, और अन्त में नगर का पतन हो गया। यह निर्वचन कितना झूठा या कृत्रिम मालूम होता है, पर निःसन्देह वह सही था।

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1. Preconscious

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