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धर्म एवं दर्शन >> हमारे पूज्य देवी-देवता

हमारे पूज्य देवी-देवता

स्वामी अवधेशानन्द गिरि

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2015
पृष्ठ :208
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8953
आईएसबीएन :9788131010860

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’देवता’ का अर्थ दिव्य गुणों से संपन्न महान व्यक्तित्वों से है। जो सदा, बिना किसी अपेक्षा के सभी को देता है, उसे भी ’देवता’ कहा जाता है...

मत्स्य

भगवान विष्णु अनादि, अनंत और बुद्धि से परे हैं। वे श्री नारायण चतुर्भुज रूप से क्षीर सागर में शेषशय्या पर विराजमान रहते हैं। उनके नि:श्वास से निकले वेद उन्हीं का गुणगान करते हैं। वे हरि देवताओं के आश्रय और रक्षक हैं। उनके अनेक रूप और अनंत नाम हैं। वही अवतार लेकर धरा को भारयुक्त करते हैं। जब प्रलय के समय समस्त सृष्टि जलमग्न हो जाती है, तब सृष्टि बीज की रक्षा के लिए वही मत्स्यावतार लेते हैं।

पूर्व कल्प की बात है। ब्रह्मा जी योगनिद्रा में लीन थे। उनके मुख से वेद निकले। उन्हें दितिपुत्र हयग्रीव ने कंठस्थ कर लिया। वह दैत्य अपनी मलिन बुद्धि से वेदों का अनर्थ ही करेगा, अत: वेदों का उद्धार करना भी मत्स्यावतार का उद्देश्य था। मत्स्यावतार की कथा इस प्रकार है-

एक बार राजर्षि सत्यव्रत कृतमाला नदी में तर्पण कर रहे थे। तभी उनकी अंजलि में एक छोटी मछली (मत्स्य) आ गई। उन्होंने उसे नदी में छोड़ दिया। मछली बोली, "मुझे जल में मत फेंको। मैं बड़ी मछलियों और मगर से डरकर

आपकी शरण में आई हूं।'' राजर्षि ने उसे उठाकर अपने कमंडल के जल में रख लिया और अपने आश्रम में आ गए। थोड़ी ही देर में वह मछली इतनी बड़ी हो गई कि कमंडल में हिल-डुल भी नहीं सकती थी। वह बोली, “यहां तो मैं हिल भी नहीं सकती।"

तब राजर्षि ने उसे सरोवर में डाल दिया, किंतु वह बढ़कर हाथी जैसी हो गई। सरोवर में भी न समाने पर उसे समुद्र में छोड़ना पड़ा। वहां भी कुछ ही देर में वह पर्वताकार हो गई। 'कोई जल जीव इतनी जल्दी इतना बड़ा कैसे हो सकता है?' यह सोचकर राजर्षि को संदेह हुआ। वे बोले, "निश्चित ही आप भगवान हैं। कृपा बताएं कि मत्स्य शरीर धारण करने का क्या उद्देश्य है?"

तब मत्स्य रूप भगवान ने कहा, "मैं दुष्ट-दलन और धार्मिकों की रक्षा के लिए मत्स्य रूप में अवतीर्ण हुआ हूं। आज से सातवें दिन प्रलय होगी। समस्त संसार जलमग्न हो जाएगा। उस समय तुम्हारे पास एक नाव आएगी। तुम उसमें औषध आदि सृष्टि के बीज रखकर बैठ जाना। मैं इसी रूप में तुम्हारे पास आऊंगा। तुम मेरे सींग में नागपाश से उस नाव को बांध देना।'' यह कहकर वे परम परमेश्वर अंतर्धान हो गए।

सातवें दिन चारों ओर से समुद्र उमड़ पड़ा और पूरी पृथ्वी पानी में डूब गई। तभी एक नाव आई, जिसमें नागराज वासुकि बैठे थे। उसी समय सप्तऋषि भी आ गए। राजर्षि ने संपूर्ण वनस्पतियों के बीज और प्राणियों के जोड़े नाव में रख दिए तथा सप्तऋषियों सहित स्वयं भी नाव पर चढ़ गए। तभी विशालकाय शरीरधारी मत्स्य भगवान का दर्शन हुआ। उन्होंने नाव को उन महासर्प की रज्जु से मत्स्य के सींग में बांध दी। फिर सागर की उत्तंग तरंगों के बीच मत्स्य भगवान उस नाव को ब्रह्मा की रात्रि काल तक खींचते रहे। राजर्षि सत्यव्रत भगवान से प्रश्न करते रहे और भगवान मत्स्य उत्तर देते रहे। भगवान मत्स्य का वही दिव्य उपदेश भगवान व्यास ने 'मत्स्य पुराण' में संकलित किया है।

प्रलय काल बीता। समुद्र का पानी उतरा। भगवान के आदेश से हिमालय के शिखर में वह नाव बांध दी गई। वह शिखर 'नौका बंधन शृंग' कहलाता है। फिर भगवान मत्स्य ने हयग्रीव दानव का वध करके वेदों का उद्धार किया। राजर्षि सत्यव्रत इस मन्वंतर के वैवस्वत मनु हैं। इस जल-प्रलय और मनु की नौकारोहण कथा का वर्णन यहूदियों के धर्मग्रंथ 'टोरा', ईसाइयों के धर्मग्रंथ ‘बाइबिल' और मुस्लिम धर्मग्रंथ 'कुरान' में भी प्रकारांतर से मिलता है। चीन, आस्ट्रेलिया और अमेरिका में भी यह कथा प्रसिद्ध है। देशकाल के प्रभाव से इस कथा में अंतर आना स्वाभाविक है।

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