हर हाल बेगाने - मृदुला गर्ग Har Haal Begaane - Hindi book by - Mridula Garg
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हर हाल बेगाने

मृदुला गर्ग

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :152
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 8981
आईएसबीएन :9789350642511

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हर हाल बेगाने...

Tijori Ka Rahasya - Hindi Book by Neelabh

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कठुगुलाब, चितकोबरा, मिलजुल मन जैसे जाने-माने उपन्यासों और अनेक कहानी-संग्रहों की रचयिता मृदुला गर्ग हिन्दी पाठकों की एक परिचित लेखिका हैं। 25 अक्टूबर 1938 को कोलकाता में जन्मी मृदुला गर्ग को उनके साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मानों से नवाज़ा गया जिनमें से उल्लेखनीय हैं-साहित्य अकादमी पुरस्कार, साहित्यकार सम्मान, साहित्य भूषण, महाराज वीरसिंह सम्मान, सेठ गोविंद दास सम्मान, व्यास सम्मान, स्पंदन कथा शिखर सम्मान, हैलमन-हैमट ग्रांट। भारत छोड़कर विदेशों में बसे हुए भारतीयों की कहानियाँ इस पुस्तक में प्रस्तुत हैं। अपनी जड़ों से कटकर क्या नए देश में बसे भारतीय अपनी एक नई पहचान बना सकते हैं? इस नई पहचान का भारतीय होने की पहचान से कैसे टकराव या समावेश होता है? मृदुला गर्ग की तीखी कलम से जज़्बातों का कोई भी पहलू बच नहीं पाता और यही उनकी लेखनी की विशेषता है।

उनकी कविताओं में फूलों की महक भी है और काँटों की चुभन भी। लेकिन ये चुभन किसी ऐसे काँटे की नहीं है जो किसी बेकसूर के पावों को घायल कर दे बल्कि ये वो काँटा है, जिससे आप अपने पावों में चुभे दूसरे काँटों को निकाल सकते हैं। समाज उनकी कविताओं की प्रयोगशाला है। उनके कवि मन की कोमल कल्पनाएँ जब यथार्थ की पथरीली जमीन से टकराती हैं तो तीक्ष्ण व्यंग्य की व्युत्पत्ति ही हो जाती है। जिन सामाजिक रूढ़ियों, आर्थिक दुश्चिन्ताओं, राजनीतिक, विडम्बनाओं, प्रशासनिक विसंगतियों तथा क्षणभँगुर जीवन की विद्रूपताओं ने उनके अन्तर्मन को भीतर कचोटा है, वे उनकी कविताओं का कच्चा चिट्ठा है। इसलिए इस कच्चे चिट्ठे को वे अपनी कविताओं में नये-नये तरीकों से प्रस्तुत करते रहते हैं।

 

एक और विवाह

 

"तो आख़िर कोमल जी ने विवाह कर लिया," प्रेम ने सुसज्जित वधू का हाथ दबाते हुए कहा।

"अजी यह कोई हमारी-तुम्हारी तरह पल्लू पकड़ कर किया गया विवाह थोड़े है। प्रेम-विवाह है-एकदम अपनी पसंद, अपनी इच्छा। ऐक्य की उत्कट लालसा !" श्रीमती श्रीवास्तव ने कटुता को हँसी से ढकने का निष्फल प्रयास करते हुए कहा।

"प्रेम-विवाह के अलावा द्वेष-विवाह कैसा होता है, जी" रानी ने कहा और वातावरण में आ रही कटुता हँसी में बह गयी।

श्रीमती श्रीवास्तव की बात एक तरह से कोमल की कही हुई थी। जब तब वह कॉलेज के स्टाफ़ रूम में कहा करती थी, "मैं व्यवस्थित विवाह में विश्वास नहीं करती। वह विवाह नहीं, जबरदस्ती किसी का पल्लू पकड़ लेना होता है। दो कारणों से ऐसा करने की आवश्यकता पड़ सकती है, आर्थिक अवलंबन की खोज या शारीरिक भूख। पहले की हमें ज़रूरत नहीं है और रहा दूसरा, तो उसके लिए विवाह की आवश्यकता नहीं है। बेहतर है मुक्त प्रेम, जो बासी होने पर फेंका जा सकता है। विवाह तय करना चाहिए जब पुरुष को उसके बिना सब अर्थहीन मालूम पड़े। और स्त्री उसके बिना भी पूर्ण समर्पण को व्यग्र हो, तभी वास्तविक ऐक्य हो सकता है।"

चार बहनों के परिवार में कोमल बुद्धिजीवी मानी जाती थी। पिता बुद्विजीवी थे ही शोर एक कंपनी के मालिक। नौकर-चाकर, गाड़ी-बंगला से लेकर, पुत्र के अभाव में पुत्रियों को उच्च शिक्षा और स्वतंत्र विचार देने में जुटे थे। सब बहनों में कोमल पढ़ने-लिखने में तेज़ थी। स्कूल-कॉलेज में हमेशा प्रथम आती रही, साथ ही नाटक व्याख्यान, विचार गोष्ठी आदि में आगे रह कर, उसने राजनीतिशास्त्र में पी-एच.डी. कर डाला। अपने विचारों को बिना हिचक स्पष्ट कह देना उसका व्रत था। बुद्धिजीवी होने के नाते उसके विवाह की चिंता माँ-पिता को नहीं थी। उनका ख़याल था, उसे विवाह में रुचि नहीं होगी। बड़ी और छोटी बहन का सुपात्र देख कर यथासमय विवाह हो गया। कोमल दिल्ली के कॉलेज में लैक्चरर हो गयी। पढ़ने-लिखने और तर्क करने में समय बिताने लगी। देखने में कोमल सरस प्रेयसी नारी थी। दुबली-पतली देह, गेहुंआ रंग, साधारण नाक-नक्श पर बड़ी-बड़ी रसीली आँखें और भावप्रवण वाणी। लगता, यह अपनी आँखों से व्यंग्य का आवरण हटा कर किसी पुरुष पर टिका दे तो चारों ओर का वातावरण सुरभि बन लुप्त हो जाये। ऐसा ही मधुमास उसकी वाणी में छिपा था, पर सुनने को मिलती थीं वही हलके व्यंग्य से लिप्त, तर्क से बोझिल बातें।

एक दिन उसने यह जरूर कहा था, "जीवन में हमें सेक्स से ज़्यादा रोमांस की खोज होती है और व्यवस्थित विवाह का अर्थ है रोमांस को तिलांजलि।"

इस पर रानी ने कहा था, "विवाह सभी व्यविस्थत होते हैं। यहाँ बाहरी सज्जा को परख कर और वहाँ (पश्चिम में) बाहरी सज्जा में बह कर। सच्चा प्रेम होने से, उसे विवाह की अग्नि-परीक्षा में न डाला जाये तो अच्छा है। जहाँ तक अपना सवाल है, मुझे बच्चे चाहिए ! बिना विवाह के मिल जाये तो बहुत ख़ूब, वरना विवाह करना ही पड़ेगा।"

रानी चंचल, आत्म-निर्भर और स्पष्टवादी लड़की थी। पिता थे नहीं, वही माँ और छोटे भाई-बहनों का पोषण कर रही थी। इसीलिए सत्ताईस वर्ष की होने पर भी विवाह नहीं कर पायी थी। उसका विशेष गुण था, हँसना, औरों पर और अपने पर। उसकी बात सुन कोमल मुस्करा दी थी। वह बरट्रेंड रसेल से सहमत थी कि मातृत्व की भूख स्वतंत्र व्यक्तित्व की स्त्रियों को नहीं होती, कम से कम अनिवार्य रूप से नहीं।

अब कोमल दुलहिन बनी बैठी है और बारात के आने का इंतज़ार कर रही है। उसने सुना, रानी कह रही है, "जो हीरे की अंगूठी अंगुली पर चमक रही है, मदन जी का उपहार है।"

"भेंट कहाँ हुई ?" प्रेम ने पूछा।

"किसी काम से इनके पिताजी के पास आये थे, कोमल जी वहाँ विराजमान थीं, बस जो आपस में छिड़ी, कामधाम भूल गये। आठ वर्ष अमेरिका रह कर आये हैं, पहले सकुचाये कि भारतीय महिला से कैसे पेश आया जाये, फिर एक दिन रास्ते में भेंट हो गयी। कोमल जी ने चाय पीने का सुझाव रख दिया। फिर क्या था ? लगूना में बैठ कर दिल की कह गये और अगले दिन अंगूठी लेकर हाज़िर कि हाँ कहो, वरना यहीं बैठां हूँ। फँस गयीं कोमल जी।"

बात एक तरह से कोमल की कही हुई थी, भाषा रानी की ज़रूर थी। हाँ, अंगूठी कोमल ने स्वयं ख़रीदी थी।

जब उसकी सबसे छोटी बहन की शादी की बातचीत चली तो माँ ने कहा, "एक बार कोमल से भी पूछ लेना चाहिए, छब्बीस पार कर चुकी है।"

सचमुच कोमल छब्बीस पार कर चुकी थी। रोमांस की प्रतीक्षा, प्रतीक्षा बनी हुई थी। तब तक न वह किसी पुरुष की ओर आकर्षित हुई थी, न कोई पुरुष उसकी ओर। क्षणिक रूप से हुए होंगे पर चिनगारी भड़क नहीं पायी थी। अब माँ की नज़र में सुपात्र जुट गया था। कोमल से उन्होंने कहा, "लड़का आठ साल अमेरिका रह कर आया है। न्यूक्लियर फिज़िसिस्ट है, ट्रॉम्बे में काम कर रहा है, शायद वापस अमेरिका चला जाये। स्वतंत्र विचारों का है। मिलने में क्या आपत्ति है ?" फिर कुछ सकुचा कर यह भी जोड़ा था, "सुंदर है, लंबा-चौड़ा।"

कोमल ने कह दिया था, "ठीक है, यह सर्कस भी हो जाये।"

पहली बार उस तीस वर्षीय सुंदर युवक से घर पर भेंट हुई। मदन वाक़ई आकर्षक था। आकर्षण था पौरुष का, साफ़ त्वचा, चौड़ा माथा, कांतिमय नेत्र, ठोड़ी के बीच गदगदा, सजी-संवरी मूंछें, भारी काले चमकदार केश और ऊँचा, भरा-पूरा शरीर। चौड़े माथे पर संवरे भारी केश चेहरे को लावण्य दे रहे थे। सूट के नीचे उसकी माँस-पेशियां रह-रह कर फड़क उठती थीं। कोमल ने देखा और शारीरिक पुलक अनुभव की। चाय-पानी हुआ। जैसा वहाँ से लौटे लोगों के साथ आमतौर पर होता है, बातचीत अमेरिका के बारे में हो रही थी। वहाँ की ज़िंदादिली, यहाँ का आलसीपन; वहाँ की आधुनिकता, यहाँ की पुरातन-भक्ति। बीच-बीच में कोमल व्यंग्य कस देती पर जो उत्तर मिलता, उसमें उसको कम, परख ज्यादा होती।

"अच्छा, यहाँ से लोग अमेरिका जा कर अमेरिकनों की तरह क्यों बोलने लगते हैं ?" कोमल ने पूछा।

मदन का अंग्रेज़ी उच्चारण अमेरिकन छाप लिये हुए था।

"शायद इसलिए कि अंग्रेज़ी हमारी अपनी भाषा नहीं है। हम उसे दूसरों की तरह बोलने की कोशिश करते हैं, जो भी नक़ल करने को मिल जाये, अंग्रेज़ या अमेरिकन, "मदन ने कहा।

यानी ज़रा ठेस नहीं लगी थी।

चाय के बाद कोमल के पिता ने कहा, "तुम लोग बैठो, हम एक रिसेप्शन में जा रहे हैं, पौने घंटे तक लौट आयेंगे।" वे और माँ चले गये थे।

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