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देवांगना

आचार्य चतुरसेन

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :128
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 9009
आईएसबीएन :9789350642702

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आस्था और प्रेम का धार्मिक कट्टरता और घृणा पर विजय का एक रोचक उपन्यास...

इस समय वृन्दावन में निम्बार्काचार्य कृष्ण का रूप प्रतिपादन कर रहे थे-जी निरन्तर गोपियों से घिरा रहता था। तथा भाँति-भाँति की रासलीला का प्रचार बढ़ता जाता था जिसमें परकीया भावना ही मुख्य रहती थी। निम्बाकाचार्य यद्यपि सुदूर दक्षिण के निवासी थे, पर वृन्दावन में उन्होंने अपना अड्डा बनाया था। उत्तर भारत के बहुत-से नर-नारी उनके शिष्य बनते जा रहे थे।

शैवधर्म की जड़ तो छठी शताब्दी में ही काफी मजबूत हो चुकी थी। थे। भारत के बाहर कम्बोज आदि देशों में भी इस धर्म का बड़ा प्रचार था। इसके अतिरिक्त दक्षिण पूर्वी एशिया के क्षेत्र, बृहतर भारत के अनेक देश इस धर्म से प्रभावित हो चुके थे। जिस प्रकार बौद्धों में वज़यान सम्प्रदाय पनपा था, उसी प्रकार शैवों में पाशुपत और कापालिक सम्प्रदायों का जोर था। वज्रयान के समान शैवधर्म के ये दोनों मार्ग भी सिद्धियों और मन्त्रशक्ति में विश्वास रखते थे तथा सिद्धिप्राप्ति के लिए अनेक, रहस्यमय और गुह्य अनुष्ठान करते थे। सातवीं शताब्दी में जब चीनी यात्री हुएनसांग भारत में आया था तब बिलोचिस्तान तक में पाशुपत सम्प्रदाय की सत्ता थी। काशी में उस समय माहेश्वर की सौ फुट ऊँची ताम्बे की ठोस मूर्ति थी। इस समय वाराणसी पाशुपत आम्नाय का केन्द्र बन रही थी। वहाँ इस समय सैकड़ों मन्दिर थे जिनमें पाशुपत धर्म की विधि से पूजा होती थी।

वज्रयानी की भाँति पाशुपत सम्प्रदाय वाले भी यह मानते थे कि साधक को जान-बूझकर भी वे सब काम करने चाहिए, जिन्हें लोग गर्हित समझते हैं। इसमें उनका यह तक होता था कि इससे साधक कर्तव्य और अकर्तव्य के विवेक से ऊँचा उठ जाता था।

इन्हीं में कापालिक लोगों का एक दल था जो सिद्धि प्राप्त करने के लिए और भी उग्र और बीभत्स कार्य करता था। ये कापालिक चिताभस्म अंग पर लगाए, नर-मुण्डमाल गले में पहिने नर-कपाल में मदिरा पानकर मत बने निर्द्धन्द्ध घूमते, जिसका जो चाहे उठा लेते, जिसे चाहे मार बैठते, इनकी कहीं कोई दाद-फरियाद न थी। प्राय: ये घोर दुराचारी होते थे। गृहस्थ इनके नाम से डरते थे। मारण-मोहन-उच्चाटन का ये पूरा ढोंग रचते थे और सदैव कुत्सित रूप में घूमा करते थे। गुह्य सिद्धियों के लिए ये श्मशान में रहते, मुर्दे की पीठ पर बैठकर मन्त्र जाप करते, और चिताग्नि पर टिक्कड़ सेंक खाते थे।

ऐसा ही उन दिनों शाक्त धर्म था, जिसका पूर्वी बंगाल और आसाम में पूरा जोर था। ये तन्त्र-मन्त्र और गुह्य सिद्धियों के नाम पर मद्य-माँस सेवन करते, नर-बलि तक देते और आदिशक्ति देवी की उपासना रक्त से करते थे। बलि का इनके विधान में प्राधान्य था। ये शाक्तिक जंजाल में लपेटकर वज़यानियों की भाँति बड़े ही आडम्बर से अपने अनैतिक और कुत्सित कर्मों का प्रतिपादन करते थे।

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