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इतिहास और राजनीति >> ताजमहल मन्दिर भवन है ताजमहल मन्दिर भवन हैपुरुषोत्तम नागेश ओक
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पी एन ओक की शोघपूर्ण रचना जिसने इतिहास-जगत में तहलका मचा दिया...
किस प्रकार, अनेक शताब्दियों से निर्बाध चला आ रहा असीम आग्रहात्मक प्रचार सामान्य जनों, इतिहास और वास्तुकला के विद्वानों की पीढ़ियों को भ्रमित करनेवाला तथा उन्हें यह विश्वास दिलाने में सफल हुआ है कि विशाल एवं भव्य मध्यकालीन स्मारक मुस्लिम हैं, यद्यपि वे मुस्लिम काल के पूर्ववर्ती हैं, यह तथ्य स्लीमन के अनुभव से स्पष्ट किया जा सकता है। अपनी पुस्तक के अध्याय ४ के पृष्ठ २९ पर, आगरा-स्थित स्मारकों के भ्रमण का वर्णन करते हुए लेखक कहता है-"मैं एतमाद-उद-दौला का मकबरा देखने के लिए एक दिन प्रात:काल यमुना नदी पार कर गया। वापस होते हुए मैंने एक नाविक, जो मेरी नाव चला रहा था, से पूछा, 'किले के अन्दर जो एक नया-सा मकबरा मुझे दिखाई दिया वह किसने बनाया?'"
'किसी बादशाह ने ही।' उसने कहा।
तुम यह किस आधार पर कहते हो?'
"क्योंकि ऐसी वस्तुएँ केवल बादशाह ही बनवाते हैं।' उसने बड़ी शान्ति से उत्तर दिया।
'ठीक, बिल्कुल ठीक।' मेरा अनुसरण करने के उद्देश्य से उतरनेवाले एक वृद्ध मुसलमान ने विषाद से अपना सिर हिलाते हुए कहा, 'ठीक ही तो है! बादशाह के अतिरिक्त कौन इन जैसी वस्तुओं का निर्माण करा सकता है?''
"उससे उत्साहित होकर नाविक कहने लगा, 'जाट और मराठों ने जब यहाँ अपना अभिशप्त राज्य स्थापित किया तो भवनों को गिराने और नष्ट करने के अतिरिक्त उन्होंने कुछ किया ही नहीं'
उपरिलिखित उद्धरण में हमें यह सूत्र हस्तगत होता है जिससे पश्चिमी विद्वान् और पर्यटकों को निहित स्वार्थी व्यक्तियों के प्रलाप से भ्रमित किया जाता रहा है। मराठों तथा जाटों पर आरोपित अभियोग प्रत्यक्षतया कितना भद्दा है यह तो ताज और एतमाद-उद-दौला के तथाकथित मकबरे को विद्यमानता से देखा ही जा सकता है। यह नहीं कि वे मूलतया मुस्लिम भवन थे किन्तु जब से उनको मुस्लिम मकबरों के रूप में प्रयुक्त करना आरम्भ किया गया तब से जाट और मराठों ने उन पर एक खरोंच भी नहीं लगाई, किन्तु किसी प्रकार यह प्रचार अपने उद्देश्य में सफल हो गया कि लोग इस गलत बात पर विश्वास करने लगे कि मध्यकालीन स्मारक मुस्लिम मूल के हैं।
हमारा स्वयं का भी स्लीमन की भाँति एक अनुभव है।
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