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इतिहास और राजनीति >> ताजमहल मन्दिर भवन है ताजमहल मन्दिर भवन हैपुरुषोत्तम नागेश ओक
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पी एन ओक की शोघपूर्ण रचना जिसने इतिहास-जगत में तहलका मचा दिया...
भावी शोधकार ताजमहल के संगमरमर के चबूतरे के पीछे लाल पत्थर के चबूतरे पर जाएँ, वहाँ दोनों छोरों पर उन्हें नीचे उतरने की सीढ़ियाँ दिखाई देंगी, उन दोनों में से किसी भी सीढ़ी के नीचे की मंजिल पर पहुंचा जा सकता है।
इसके भीतर का दृश्य विस्मयकारी है। नदी की ओर पहले २२ राजकीय कक्षों की पंक्ति है जिसकी दीवारों तथा छतों पर आज भी प्राचीन हिन्दू चित्रकला विद्यमान है। नदी की ओर खुलनेवाली बड़ी-बड़ी खिड़कियों को शाहजहाँ द्वारा बेतरतीब ईंट और चूने से बन्द करवा दिया गया है। यह कार्य इतनी बेरुखी से किया गया है कि ईंट और चूने को समतल करने के लिए प्लास्टर भी नहीं किया गया और कहीं-कहीं पर मचान के छिद्र भी विद्यमान हैं। यह दृश्य विपरीतता की चरम सीमा पर है, क्योंकि ३०० लम्बी शताब्दियों तक ऐतिहासिक कल्पना शाहजहाँ को भव्य, स्फटिक श्वेत, कोमल संगमरमर का स्मारक-निर्माता का श्रेय देती आ रही है, किन्तु ये छिपे हुए कक्ष इस बात की पोल खोल देते हैं कि वह क्रूर, लुटेरा और पापी था जो सुन्दर भवन की मंजिलों को भी दीवारों से बन्द करने में नहीं हिचकिचाया, यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि जब भारत विदेशी शासक के अधिकार में था तो किस प्रकार भारतीय इतिहास को उलटा-सीधा किया गया।
कक्षों के आकार-प्रकार १२ से १५ फुट चौड़ा और २० से २२ फुट लम्बा, इस प्रकार अलग-अलग है। ऊँचाई १२ फुट हो सकती है। शाहजहाँ द्वारा विशाल झरोखों को दीवार द्वारा बन्द कर दिए जाने के कारण ये कक्ष अन्धकारयुक्त हो गए हैं। सीढ़ियों के छोरों पर के दो लौह द्वार जब खुलें तभी वहाँ कुछ प्रकाश का प्रवेश हो सकता है।
शाहजहाँ ने इस कार्य में इतनी सावधानी बरती कि लाल पत्थर के चबूतरे की ओर से प्रविष्ट होने पर सीढ़ियों के मुहाने पर लाल पत्थर की शिलाएँ रखकर द्वार बन्द करा दिए। कालान्तर में ब्रिटिश शासन के दिनों में उन शिलाओं को हटा दिया गया। कक्षों की उस पंक्ति की जो नदी के बराबर है लम्बाई लगभग ३०० फुट होगी। भीतर की ओर कक्षों के साथ सटा उतना ही लम्बा बरामदा है जिसे शाहजहाँ की असभ्यता ने अन्धकारयुक्त कर दिया है। वह बरामदा लगभग १० फुट चौड़ा और ३०० फुट लम्बा है। उसका भीतरी किनारा वहाँ पर समाप्त होता है जहाँ पर ऊपर के बरामदे की संगमरमर की चिनाई आरम्भ होती है। उस दीवार पर बरामदे के पूर्वी और पश्चिमी द्वार पर दो द्वार हैं। ये संगमरमर की भूगर्भस्थ मंजिल की ओर जाते हैं। उन दोनों द्वारों को भी बड़ी बेतरतीबी से ईंट और चूने से बिना प्लास्टर के बन्द कर दिया गया है। उनकी बाहरी परत गिरकर ढेर बन गई है, पर चूंकि प्राचीन प्राचीर बड़ी मोटी थी इसलिए कुछ श्रमिकों को लगाकर भराव को हटा छिपाई हुई और बन्द की गई मंजिल का मार्ग खुल सकता है।
मुझे प्रबल सन्देह है कि उन्हीं कक्षों में ताजमहल के हिन्दू मूल के प्रमाण को छिपाकर रखा गया है। यह सम्भव है कि शाहजहाँ ने संस्कृत शब्दों एवं हिन्दू प्रतिमाओं को ताजमहल से उखाड़कर उन निचली मंजिलों में भर दिया हो और इस प्रकार उन प्रमाणों को छिपाकर निचली मंजिलों को बन्द कर दिया हो।
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