जीवन कथाएँ >> लज्जा लज्जातसलीमा नसरीन
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प्रस्तुत उपन्यास में बांग्लादेश की हिन्दू विरोधी साम्प्रदायिकता पर प्रहार करती उस नरक का अत्यन्त मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया गया है...
'दरअसल जानते हो, जो दंगा कर रहे हैं, क्या वे धर्म मानकर कर रहे हैं? उनका असली मकसद तो है लूटपाट करना। मिठाई की दुकानों को क्यों लूटा जाता है, मेरी तो समझ में नहीं आता। मिठाई के लोभ में? सोने की दुकानों को लूटा जाता है, सोने के लालच में। गुण्डे-बदमाशों का दल यह सब कर रहा है। दरअसल, यहाँ सम्प्रदायों में कोई मतभेद नहीं है। जितने शान्ति-जुलूस निकल रहे हैं, उससे लग रहा है कि कोई-न-कोई समाधान अवश्य होगा। नब्बे में जो इरशाद का पतन हुआ था, इसी वजह से ही तो! अच्छा सुरो, इरशाद ने कहा था हिन्दुओं को क्षतिपूर्ति देगा, दी है?'
'आप क्या पागल हो गये हैं, पिताजी?'
'क्या पता! आजकल तो कुछ याद भी नहीं रहता? निदाराबाद के हत्याकाण्ड के मुजरिमों की फाँसी होगी, जानते हो?'
सुरंजन समझ रहा था कि सुधामय समझाना चाहते हैं कि इस देश में भी हिन्दुओं को न्याय मिलता है। ब्राह्मणबाड़िया कि निदाराबाद गाँव के बिरजाबाला देवनाथ और उसकी पाँच सन्तानों नियतिबाला, सुभाष देवनाथ, मिनतीबाला, सुमन देवनाथ और सुरंजन देवनाथ को धोपाजुड़ी नाले में ले जाकर खस्सी काटने वाली कटारी से काट दिया गया था। बाद में उनको एक ड्रम में भरकर ऊपर से चूना और नमक डालकर बंद करके धोपाजुड़ी नाले में डुबो दिया गया। दूसरे दिन वह ड्रम पानी के ऊपर तैरने लगा। बिरजा के पति शशांक देवनाथ की तीन एकड़ चौंतीस छटांक जमीन हड़पने और शशांक हत्याकाण्ड से बचने के लिए यह खून किया गया था। हत्याकाण्ड के मुजरिम ताजुल इस्लाम और चोरा बादशाह को सुप्रीम कोर्ट से फाँसी का हुक्म हुआ था। इस घटना को हुए भी चार महीने हो गये। नये सिरे से इस घटना का जिक्र करके क्या सुधामय सांत्वना पाना चाह रहे हैं। सोचना चाह रहे हैं हिन्दुओं को इस देश में बहुत न्याय मिलता है। इस देश में हिन्दू-मुसलमान को समान मर्यादा मिलती है। हिन्दू इस देश के द्वितीय श्रेणी के नागरिक नहीं हैं।
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