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रोमांचक विज्ञान कथाएँ

जयंत विष्णु नारलीकर

प्रकाशक : विद्या विहार प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :166
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3321
आईएसबीएन :81-88140-65-1

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सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एवं विज्ञान लेखक श्री जयंत विष्णु नारलीकर द्वारा लिखित ये विज्ञान कथाएँ रहस्य, रोमांच एवं अदभुत कल्पनाशीलता से भरी हुई है...


"हिम युग की भविष्यवाणी करनेवाला मेरा वैज्ञानिक सिद्धांत प्रकाशित भाग की बजाय अप्रकाशित भाग में ज्यादा मिलेगा।" वसंत ने सहज भाव से कहा।
'ऐसा क्यों?"

"झूठी वास्तविकता के कारण, हर चीज की बारीकी से नुक्ता-चीनी करने और निष्पक्षता के झूठे अहसास के कारण, जिस पर हम वैज्ञानिकों को बहुत गुमान है।" वसंत के चेहरे पर व्यंग्य और हताशा के भाव तैर रहे थे। आगे बोलने से पहले फिर उसका चेहरा निर्विकार हो गया, "आम लोग सोचते हैं कि हम वैज्ञानिक प्रकांड विद्वान् होते हैं, जो ईर्ष्या और लालच से परे केवल ज्ञान की खोज में लगे रहते हैं। पर ये सब बकवास है। हम वैज्ञानिक भी आखिर मनुष्य हैं। मानवीय स्वभाव की सभी कमजोरियाँ हमारे भीतर भी होती हैं। अगर वैज्ञानिक व्यवस्था को नई खोजें हजम नहीं होती तो उसके पुरोधा लोग इन खोजों को दबाने के लिए सबकुछ करेंगे। मुझे भी अपने सिद्धांतों और भविष्यवाणियों के स्वर को मंदा कर देना पड़ा, ताकि मेरे विचार प्रकाशित हो सकें। और अन्य हाथ से लिखे विचार, जो आप देख रहे हैं, उन्हें प्रकाशन के लिए कुछ ज्यादा ही अव्यावहारिक और फूहड़ माना गया।"

"मुझे क्षमा करें, प्रो. चिटनिस।"
'मुझे वसंत कहो।" प्रोफेसर ने बीच में ही कहा।

धन्यवाद, वसंत! लेकिन आप जो कुछ कह रहे हैं, उसमें कॉपरनिकस और गैलीलियो के दिनों से गजब की समानता दिखती है। अगर मुझे ठीक-ठीक याद है तो कॉपरनिकस ने अपनी पुस्तक में जो प्रस्तावना लिखी थी उसे प्रकाशक ने पूरी तरह बदल डाला, ताकि पुस्तक को धार्मिक संस्थानों की तरफ से प्रतिरोध न झेलना पड़े।" राजीव ने बातचीत रिकॉर्ड करने के लिए टेप रिकॉर्डर चालू कर दिया था। इस बीच उत्तर देने से पहले वसंत ने अपने विचारों को कुछ व्यवस्थित कर लिया था।

"उन दिनों धार्मिक व्यवस्था थी, जो वैज्ञानिकों को हतोत्साहित करती थी। आज वैज्ञानिक नौकरशाही है, जो हम वैज्ञानिकों के सिर पर बैठी है। वे समझदार लोग ही तय करते हैं कि क्या चीज प्रकाशन योग्य है और क्या नहीं। और यदि (चीज) यह वास्तविक विज्ञान है तो इसे दिन की रोशनी भी नसीब न हो। पाँच सदी पहलेवाली धार्मिक व्यवस्था की जगह ये आज वैज्ञानिक जगत् के धर्माधिकारी बन बैठे हैं।

माफ करना, अगर मैं कुछ ज्यादा ही कड़वा बोल गया हूँ तो।"

'बेशक वसंत, तुम इस पूरी व्यवस्था पर ही टिप्पणी कर रहे हो। व्यवस्था जैसी भी हो, तुम अपने निजी अनुभव के आधार पर इसे कोस रहे हो। लेकिन अगर मुझे इसका पक्ष लेना होता तो मैं यही कहता कि अपने पूरे कैरियर के दौरान वैज्ञानिकों को सैकड़ों अजीबो-गरीब और अधकचरे विचार सूझते। लेकिन इन सबको परखने का वक्त किसके पास है ? इसलिए अगर वे किसी नई लीक से हटकर विचार से बचने की कोशिश करते हैं तो..."

"तो किसे दोष दिया जाए? मैं सहमत हूँ, लेकिन अगर लीक से हटकर सोचा गया विचार भी तर्कों पर आधारित हो और उसके पक्ष में सबूत भी हों तो क्या उसकी सुनवाई नहीं होनी चाहिए? निश्चित ही ऐसे किसी ठोस विचार को सैकड़ों अजीबो-गरीब और अधकचरे विचारों से अलग पहचानना कोई कठिन काम नहीं है। खासकर इसे प्रतिपादित करनेवाला वैज्ञानिक अपने क्षेत्र में अच्छी-खासी साख बना चुका हो; लेकिन इन फिजूल की बातों को छोड़कर हमें अपने सिद्धांत पर आना चाहिए।"

ठीक है, वसंत। मुझे अपने सिद्धांत के बारे में बताओ और यह भी बताओ कि यह क्यों भविष्यवाणी करता है?" राजीव ने कहा।

वसंत ने संसार का नक्शा निकाला और उसे राजीव के सामने मेज पर फैला दिया।

'यहाँ देखो, नक्शे में दरशाई गई ठोस जमीन पर गौर करो। इस जमीन ने नक्शे के कुल क्षेत्रफल का लगभग एक-तिहाई भाग घेर रखा है। बाकी सारा भाग पानी है—समुद्रों और महासागरों की शक्ल में। यही महासागर हमारी जलवायु को नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनके ऊपर की गरम हवा ऊपर उठती है और धरती के वायुमंडल में घुल-मिल जाती है तथा दोबारा नीचे आने से पहले चारों ओर फैल जाती है। ठीक?"

"यह सब तो स्कूल की किताबों में भी लिखा है।" राजीव ने कहा।

"पर सूर्य क्या कर रहा है? क्या वह महासागरों को पर्याप्त गरमी नहीं देता?" राजीव ने पूछा।

"ऊष्मा के प्रत्यक्ष स्रोतों के तौर पर सूर्य बहुत ही अप्रभावी है। ध्रुवों पर गरमी के मौसम में चौबीसों घंटे कितनी चमकदार धूप होती है। पर इससे कितनी बर्फ पिघलती है ? इसके बजाय बर्फ धूप को परावर्तित कर देती है और उसकी गरमी को अपने अंदर नहीं आने देती। लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से धूप ज्यादा कारगर साबित हो सकती है और होती है। अगर तुम मेरी प्रयोगशाला चलो तो मैं तुम्हें एक प्रयोग करके दिखाता हूँ।" इतना कहकर वसंत उठ खड़ा हुआ और राजीव को गलियारे के पास स्थित अपनी प्रयोगशाला में ले गया।

वहाँ उसकी मेज पर शीशे का एक बड़ा सा बरतन रखा था। एक उपकरण को चालू करते हुए वसंत ने समझाना शुरू किया, "मैं इस बरतन के अंदर की हवा को धीरे-धीरे ठंडा कर रहा हूँ। इसमें कुछ नमी है, यानी कि जलवाष्प। अगर मैं हवा को ठंडा करने की प्रक्रिया को सावधानी के साथ पूरी करूँ तो इसका तापमान 0 डिग्री से नीचे गिर जाना चाहिए और जलवाष्प को बर्फ में नहीं जमना चाहिए।" तापमान-सूचक नीचे गिर रहा था और जब वह शून्य से भी नीचे चला गया तब भी बर्फ नहीं जमी थी। तब वसंत ने बरतन के आर-पार एक प्रकाश-किरण छोड़ी। समकोण से देखने पर बरतन के भीतर बिलकुल अँधेरा नजर आ रहा था। "ऐसा इसलिए है, क्योंकि प्रकाश इस नम हवा के आर-पार गुजर जाता है।" वसंत ने समझाया, "पर अब मैं तापमान को और कम करूँगा।"

जब तापमान 0 से 40 अंश नीचे तक गया तो बरतन चमकने लगा। यह परिवर्तन एकदम जादू जैसा लग रहा था।

"ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि बरतन के भीतर हवा में मौजूद जलवाष्प अब जम गई है। बर्फ के कण प्रकाश को छितरा देते हैं, जबकि नम हवा ऐसा नहीं कर पाती। यही मुख्य बिंदु है।" वसंत ने कहा।

अपने कमरे में लौटते वक्त वसंत ने बताया, “यही क्रिया ध्रुवीय प्रदेशों में भी होती है। वहाँ पर जब तापमान 0 से 40 अंश तक नीचे गिर जाता है तो हवा में बर्फ के कण बन जाते हैं, जिन्हें हम 'हीरे की धूल' कहते हैं। ये वही बर्फ कण हैं जिन्हें तुमने अभी प्रयोग में देखा था। प्रयोग की तरह ध्रुवों पर भी यह धूल धूप को छितरा देती है। अन्य जगहों पर हमें ऐसा होता नजर नहीं आता, क्योंकि कहीं भी तापमान कभी भी इतना नीचे नहीं गिरता है।"

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