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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4164
आईएसबीएन :0000

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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग


पुरुषार्थ की प्रखरता में उपासना अत्यधिक सहायक होती है, उसे समय नष्ट करने वाली बाधा नहीं माना जाना चाहिए। पारलौकिक पुरुषार्थों में अधिक उत्कृष्टता लाने के लिये अपने समय का एक अंश उपासना में नियत रूप से लगाना चाहिए। धुले कपड़े पर टिनोपाल लगा देने से-लोहा करने से और भी सुन्दरता आ जाती है। निर्मल और उजवल जीवन क्रम रहते हुये यदि उपासना का अवलम्बन ग्रहण किया जायेगा तो उसमें लगे हुए समय की कहीं अधिक सुन्दर सुव्यवस्था जीवन क्रम में विकसित होगी। शर्त यही है कि उपासना मात्र कर्मकाण्ड होकर न रह जाय उसमें भावना के समन्वय की प्राण प्रतिष्ठा अनिवार्य रूप से जुडी रहे।

हर विचारशील को समझाया जाय कि यह समय की बर्बादी नहीं वरन् उसके श्रेष्ठतम सदुपयोग की महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।

अधिक प्रभावशाली साधनायें-तपश्चर्यायें अनेक हैं। उन्हें कार्यान्वित एवं फलित करने की सम्भावना तभी रहेगी जब प्रारम्भिक उपासनाक्रम ठीक से चलने जमने लगे। एक दम उछल कर चक्र वेधन, कुण्डलिनी जागरण, समाधि, ईश्वर दर्शन जैसे प्रसंगों के लिये लालायित होना व्यर्थ है। यह उछलकर चढ़ने का नहीं क्रमिक रूप से मंजिल पार करने का राजमार्ग है। यदि ऐसा न होता तो स्वयं गुरुदेव को क्यों पैतालीस वर्ष पापड़ बेलने पड़ते और अब इस वृद्धावस्था में भी क्यों अपने को इस तरह धुनते। कोई जादू ही तुर्तफुर्त चमत्कार दिखा सकता है, पर यह ध्यान रखना चाहिए कि वह जल्दबाजी का जादू अस्थिर होता है। बाजीगर दस मिनट में झोली में से गुठली से आम का पौधा और उस पौधे पर फल लगा देता है पर यह छलावा भर होता है यदि वह बात वास्तविक होती तो बाजीगर पैसे-पैसे को हाथ न फैलाता-अब तक आमों का विशाल व्यापार करके लखपति करोड़पति बन गया होता। भले ही आप अपनी पूजा विधि के बाहरी स्वरूप को अपनी रुचि और परम्परा के अनुसार बनाये रहे पर उसमें भावना का प्राण अवश्य जोड़ें। अनेक मतान्तरों की पूजा प्रक्रिया भिन्न हो सकती है। पर उनके भीतर भावनात्मक तथ्य तो समुचित मात्रा में रहना ही चाहिये।

उपासना क्रम के अभ्यासियों को उच्चस्तरीय अनुदान भी साधना क्षेत्र में मिल सकते हैं। सम्भव है अगले दिनों उन्हें अपने तप अंश का कुछ प्रत्यावर्तन जीवन्त आत्माओं में करना पड़े इस बीज बोने का ठीक परिणाम निकले। इसके लिये यह आवश्यक है कि भूमि जोतने और उसमें नमी रखने का प्रयास पहले से ही चलता रहा हो। जो भूमि न जोती गई है-न जिसमें खाद पानी की मात्रा है उसमें बहुमूल्य बीज या पौधे का आरोपण भी निरर्थक चला जायगा। इसलिये आवश्यक है कि इस दिशा में प्रगति की सच्चे मन से आकांक्षा करने वाले अपने नित्य कर्म में उपासना की प्रक्रिया को सम्मलित करलें।



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    अनुक्रम

  1. सर्वशक्तिमान् परमेश्वर और उसका सान्निध्य

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