आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से-आचरण और चिंतन की दृष्टि से यदि मनुष्य उत्कृष्टता और आदर्शवादिता से अपने को सुसम्पन्न कर ले तो उनके कषाय कल्मषों की कालिमा हट सकती है और अन्त:करण तथा व्यक्तित्व शुद्ध, स्वच्छ, पवित्र एवं निर्मल बन सकता है। ऐसा व्यक्ति मन्त्र, उपासना, तपश्चर्या का समुचित लाभ उठा सकता है और देवताओं के अनुग्रह का अधिकारी बन सकता है। जब तक यह पात्रता न हो तब तक उत्कृष्ट वरदान माँगने की दूर-दर्शिता ही उत्पन्न न होगी और साधना के पुरुषार्थ से कुछ भौतिक लाभ भले मिल जाय, देवत्व का एक कण भी उसे प्राप्त न होगा और आसुरी भूमिका पर कोई सिद्धि मिल भी जाय तो अन्ततः उसके लिये घातक ही सिद्ध होगी। असुरों की साधना और उसके आधार पर मिली हुई सिद्धियों से उनका अन्ततः सर्वनाश ही उत्पन्न हुआ। अध्यात्म विज्ञान का समुचित लाभ लेने के लिये साधक का अन्त:करण एवम् व्यक्तित्व जितना निर्मल होगा, उतनी ही उसकी उपासना सफल होगी। धुले कपड़े पर रङ्ग आसानी से चढ़ता है मैले पर नहीं। स्वच्छ व्यक्तित्व सम्पन्न साधक किसी भी पूजा उपासना का आशाजनक लाभ सहज ही प्राप्त कर सकता है।
भगवान और देवता कहाँ है? किस स्थिति में है? उनकी शक्ति कितनी है। इस तथ्य का सही निष्कर्ष यह है कि यह दिव्य चेतन सत्ता निखिल विश्व ब्रह्माण्ड में व्याप्त है और पग-पग पर उनके समक्ष जो अणुगति जैसी व्यस्तता के कार्य प्रस्तुत हैं उन्हें पूरा करने में संलग्न हैं। उनके समक्ष असंख्य कोटि प्राणियों की-जड़ चेतन की बहुमुखी गतिविधियों को संभालने का विशालकाय कार्य पडा है सो वे उसी में लगी रहती हैं। एक व्यवस्थित नियम और क्रम उन्हें इन ग्रह-नक्षत्रों की तरह कार्य संलग्न रखता है। व्यक्तिगत सम्पर्क में घनिष्टता रखना और किसी की भावनाओं के उतार चढ़ाव की बातों पर बहुत ध्यान देना उनके समग्र रूप से सम्भव नहीं। वे ऐसा करती तो हैं पर अपने एकअंश-प्रतिनिधि के द्वारा। दिव्य सत्ताओं ने हर मनुष्य के भीतर उसके स्थूल सूक्ष्म कारण शरीरों में-अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष, आनन्दमय कोष जैसे आवरणों में अपना एक-एक अंश स्थापित किया हुआ है और यह अंश प्रतिनिधि ही उस व्यक्ति की इकाई को देखता सँभालता है। वरदान आदि की व्यवस्था इसी प्रतिनिधि द्वारा सम्पन्न होती है।
व्यक्ति की अपनी निष्ठा, श्रद्धा, भावना के अनुरूप यह देव अंश समर्थ बनते हैं और दुर्बल रहते हैं। एक साधक की निष्ठा में गहनता और व्यक्तित्व में प्रखरता हो तो उसका देवता समुचित पोषण पाकर अत्यन्त समर्थ दृष्टिगोचर होगा और साधक की आशाजनक सहायता करेगा। दूसरा साधक आत्मिक विशेषताओं से रहित हो तो उसके अन्तरङ्ग में अवस्थित देव अंश पोषण के अभाव में भूखा, नङ्गा, रोगी, दुर्बल बनकर एक कोने में कराह रहा होगा। पूजा भी नकली दवा की तरह भावना रहित होने से उस देवता को परिपुष्ट न बना सकेगी और वह विधि पूर्वक मन्त्र जप आदि करते हुये भी समुचित लाभ न उठा सकेगा।
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