आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
बालबुद्धि, उतावले और अदूरदर्शी लोग ही उपासना को जादूगरी, बाजीगरी जैसी कोई चीज मानकर चलते हैं। उनकी कल्पना किन्हीं ऐसे देवताओं की होती है जो स्तुति, जप, पूजा, प्रसाद के तनिक से प्रलोभन पर ललचाये जा सकते हैं और उनसे इन नगण्य उपहारों के बदले मन चाहे लाभ उठाये जा सकते हैं। अधिकांश पूजा, उपासना में संलग्न लोगों की मनोभूमि बच्चों जैसे स्तर की होती है। वे विधि विधानों, कर्मकाण्डों या उपहारों का तानाबाना बुनते रहते हैं और उसी टंटघंट से अपना उल्लू सीधा करने की तरकीबें भिड़ाते रहते हैं। तथाकथित भक्तों की मण्डली इसी स्तर की होती है वे तिलक छापे लगाकर अपनी भक्ति का प्रमाण भगवान के सामने प्रस्तुत करते हैं या कुछ और खेल खड़ा करके भगवान की आँखों में धूलि झोंककर अपने असली स्वरूप को छिपाते हुए भक्त को मिलने वाले लाभ प्राप्त करना चाहते हैं। वस्तुतः न भगवान इतने भोले हैं न कोई मन्त्र ऐसा है जिसे कुछ बार जप, रटकर मनचाहा लाभ उठाया जा सके। उपासना का एक सर्वाङ्गपूर्ण विज्ञान है। अध्यात्म विद्या को एक समग्र साइंस ही कहना चाहिये। उसके नियम और प्रयोजनों को समझ कर-तदनुकूल चलने से ही लाभान्वित हुआ जा सकता है। यदि यह तथ्य लोगों ने समझा होता तो अध्यात्म मार्ग की देहरी पर पैर रखते ही पहला प्रयोग अपने अन्तरङ्ग में मूर्छित, पद दलित, विभुक्षित, मलिन पड़े हुए इष्टदेव को सँभालने सँजोने का प्रयत्न किया होता। उन्हें समर्थ और बलवान बनाया होता। इस प्रथम प्रयोजन को पूरा करने के बाद मन्त्र, जप, उपासना, पूजा स्तोत्र आदि का चमत्कार देखने का दूसरा कदम उठाया गया होता तो निस्सन्देह हर उपासक को आशाजनक सफलता मिली होती और किसी को भी निराश होने अविश्वासी बनने या असमंजस में पड़ने का अवसर न आता। 'उपासना' की सफलता 'साधना' पर निर्भर है।
आत्मिक प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ा व्यवधान उन कुसंस्कारों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है जो दुर्भावों और दुष्कर्मों के रूप में मनोभूमि पर छाये रहते हैं। आकाश में बादल छाये हों तो फिर मध्यान्ह काल का सूर्य यथावत् उदय रहते हुए भी अन्धकार ही छाया रहेगा। जप-तप करते हुए भी आध्यात्मिक सफलता न मिलने का कारण एक ही है-मनोभूमि का कुसंस्कारी होना। साधना का थोड़ा-सा गङ्गाजल इस गन्दे नाले में गिरकर अपनी महत्ता खो बैठता है-नाले को शुद्ध कर सकना सम्भव नहीं होता बेशक तीव्र गङ्गा प्रवाह में थोड़ी-सी गन्दगी भी शुद्धता में परिणत हो जाती है। पर साथ ही यह भी सच है कि सँडाद भरी गन्दी गटर को थोडा सा गङ्गाजल शुद्ध कर सकने में असमर्थ-असफल रहेगा।
साधना की अपनी महिमा और महत्ता है उसे गङ्गाजल से कम नहीं अधिक ही महत्व दिया जा सकता है पर साथ ही साथ यह भी समझ लेना चाहिए कि वह सर्व समर्थ नहीं है। गङ्गाजल से बनी हुई मदिरा अथवा गंगा जल में पकाया हुआ माँस नहीं गिने जायेंगे। शौचालय में प्रयुक्त होने के उपरान्त गङ्गा का जल भरा पात्र देव प्रतिमा पर चढ़ाने योग्य न रहेगा। गङ्गा जल की शास्त्र प्रतिपादित महत्ता यथावत् बनी रहे इसके लिये यह नितान्त आवश्यक है कि उसके संग्रह, उपकरण एवं स्थान की पवित्रता भी अक्षुण्य बनी रहे।
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