आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
महात्मा गान्धी ने अपने एक मित्र को लिखा था-"राम नाम मेरे लिये जीवन अवलम्बन है जो हर विपत्ति से पार करता है।" जब तुम्हारी वासनायें तुम पर सवार हो रही हों तो नम्रता पूर्वक भगवान को सहायता के लिये पुकारो, तुम्हें सहायता मिलेगी।
जब मन दुर्बल हो रहा हो-मनोविकार बढ़ रहे हों और लगता हो कि पैर अब फिसला तब फिसला। तो सच्चे मन से प्रभु को पुकारना चाहिए। गज को ग्राह के चंगुल से छुड़ाने वाले भगवानपतन से परित्राण पाने के लिये व्याकुल आर्त भक्त की पुकार अनसुनी नहीं करते हैं और उस मनोबल रूप में अन्तःकरण में उतरते हैं जिसे गरुड़ कह सकते हैं और जो पतनोन्मुख दुष्प्रवृत्तियों के सर्पो को उदरस्थ करते रहने का अभ्यासी है।
भगवान को आत्म-समर्पण करने की स्थिति में जीव कहता है-तस्यैवाहम् (मैं उसी का हूँ) तवैवाहम् (मैं तो तेरा ही हूँ) यह कहने पर उसी में इतना तन्मय हो जाता है-इतना घुल-मिल जाता है कि अपने आपको विसर्जन, विस्मरण ही कर बैठता है और अपने को परमात्मा का स्वरूप ही समझने लगता है। तब वह कहता है- त्वमेवाहम् (मैं ही तू हूँ) शिवोहम् (मैं ही शिव हूँ) ब्रह्मास्मि (मैं ही ब्रह्म हूँ)।
भगवान को अपने में और अपने को भगवान में समाया होने की अनुभूति की जब इतनी प्रबलता उत्पन्न हो जाय कि उसे कार्य रूप में परिणत किये बिना रहा ही न जा सके तो समझना चाहिए कि समर्पण का भाव सचमुच सजग हो उठा। ऐसी शरणागति व्यक्ति को द्रुतगति से देवत्व की ओर अग्रसर करती है और यह गतिशीलता इतनी प्रभावकारी होती है कि भगवान को अपनी समस्त दिव्यता समेत भक्त के चरणों में शरणागत होना पड़ता है। यों बड़ा तो भगवान ही है पर जहाँ प्रार्थना, समर्पण और शरणागति की साधनात्मक प्रक्रिया का सम्बन्ध है इस क्षेत्र में भक्त को बड़ा और भगवान को छोटा माना जायेगा क्योंकि अक्सर भक्त के संकेतों पर भगवान को चलते हुए देखा गया है। प्रार्थना का मतलब चाहे जो माँगना नहीं है
इंगलिश में एक जगह कहा गया है कि-"जो तुम माँगते हो सो पाते नहीं-क्योंकि तुम गलत माँगते हो।" सचमुच माँगना भी एक कला है और उसमें भी समझदारी की आवश्यकता है। अन्यथा बिना विचार किये गये अन्य कामों की तरह हमारी प्रार्थना याचना भी निष्फल चली जायेगी। यदि माँगना ही हो तो पहले यह देख लेना चाहिए और किस शर्त पर माँगना चाहिए। डाकखाने में जाकर आप जलेबी माँगे तो उपहास के अलावा क्या हाथ लगेगा। दर्जी की दुकान पर किताबें माँगी जायें तो निराश ही होना पड़ेगा। भिक्षुओं को याचना के साथ कारण बताना पड़ता है। शारीरिक असमर्थता या किसी आकस्मिक विपत्ति की चर्चा न की जाय और कोई तन्दुरुस्त व्यक्ति ऐसे ही भिखा माँगने लगे तो उसे कोई बिरला ही कुछ देगा।
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