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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4164
आईएसबीएन :0000

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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग


दशरथ जी ने श्रवण कुमार को क्यों मारा-मृतक के पिता ने शाप दिया कि मेरे पुत्र को मारने वाले को इसी प्रकार पुत्र के शोक में बिलख कर मरना पड़ेगा। दशरथ जी की मृत्यु उसी प्रकार हुई। भगवान राम अपने पिताजी को कर्मफल भोगने की अनिवार्यता से छुटकारा न दिला सके। त्रेता में रामचन्द्र जी ने छिपकर बालि को बाण मारा-द्वापर में बालि ने बहेलिया बनकर भगवान कृष्ण के पैर में तीर मारा। मृत्यु के समय कृष्ण जी ने कर्मफल की अनिवार्यता का इस घटना को प्रमाण बताया। अर्जुन पुत्र-अभिमन्यु श्रीकृष्ण की बहिन का पुत्र था, मृत्यु का विधान और प्रारब्ध को टाल सकने की अपनी असमर्थता को ही भगवान व्यक्त करते रहे। उन्होंने, कर्म प्रधान विश्व करि राखा की उक्ति को विश्व के व्यवस्था, संचालन का प्रधान तथ्य माना है। सो उसे प्रार्थना के बदले रिआयत के रूप में भी टाला जा सकना सम्भव नहीं है। भगवान की भक्ति और प्रार्थना का स्वरूप व्यावहारिक जीवन में कर्मनिष्ठा के रूप में होना चाहिए। उन सत्प्रवृत्तियों को विकसित करने के रूप में होना चाहिए जो परिस्थितियों को बदलने या उनका धैर्य और साहस के साथ सामना करने की क्षमता प्रदान करती है। वह विवेक प्रार्थना का उपहार ही कहा जायेगा जो हर परिस्थिति में हँसते-मुस्कराते हुए हलका फुलका जीवन जी सकने की क्षमता प्रदान करता है।

कुछ तो कामनायें ही ऐसी ऐसी होती हैं जिनकी कोई उपयोगिता नहीं, फिर भी उन्हें अकारण चाहते हैं। जैसे संतान का न होना आज की परिस्थिति में भारत जैसे गरीब देश में एक सौभाग्य ही है, पर कितने ही बुद्धिहीन लोग इस सौभाग्य को भी दुर्भाय मानते हैं और दुःखी रहते तथा उस दुर्भाग्य की याचना के लिए प्रार्थना करते हैं। ऐसे लोग न प्रार्थना का स्वरूप समझते हैं और न उपयोग। जो भी जी में आया सो मुफ्त की लूट, मानकर माँगने के लिए हाथ पसारने लगे। ऐसे लोगों की कामनायें यदि भगवान यों ही स्तुति, प्रार्थना से प्रभावित होकर पूरी करने लगें तो फिर इस संसार में कर्म, का मिलन संयोग पुरुषार्थ-पात्रता और विवेकशीलता की कुछ आवश्यकता ही न रह जायेगी फिर यहाँ अन्धेर नगरी बेबुझ राजा की उक्ति ही सर्वत्र चरितार्थ होती दिखाई देगी। वस्तुत: ऐसा होता नहीं, न हो ही सकता है। उपलब्धियों के लिए पात्रता आवश्यक है। पात्रता की अभिवृद्धि के लिए आत्मबल प्राप्त करना ही प्रार्थना का प्रयोजन है। ऐसी सार्थक प्रार्थना ही सफल होती है और उन्हें ही सफल होना भी चाहिए।



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    अनुक्रम

  1. सर्वशक्तिमान् परमेश्वर और उसका सान्निध्य

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