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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आन्तरिक कायाकल्प का सरल किन्तु सुनिश्चित विधान आन्तरिक कायाकल्प का सरल किन्तु सुनिश्चित विधानश्रीराम शर्मा आचार्य
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आन्तरिक कायाकल्प का सरल विधान....
कल्पकाल की अति फलदायी ऐच्छिक साधनायें
कल्प की अवधि में साधक को प्रायश्चित एवं तपश्चर्या के अतिरिक्त अपनी प्रकृति के अनुरूप विशिष्ट साधनायें भी करनी होती हैं। ये ऐच्छिक हैं एवं उस अनिवार्य साधना क्रम के अतिरिक्त हैं जो साधक को व्यक्तिगत रूप से करनी है। कौन सी किसे अनुकूल पड़ेगी, इसका निर्धारण मनःस्थिति का पर्यवक्षण करने पर मार्गदर्शक ही सुझा सकते हैंं। इस ऐच्छिक साधना क्रम में विभिन्न साधनायें इस प्रकार है-
(१) प्राणाकर्षण प्राणायाम- इस सृष्टि में सतत विभिन्न स्तर के प्राण प्रवाहों का स्पन्दन चल रहा है। साधक अपने पुरुषार्थ से इन्हें सहज ही प्राप्त व धारण कर सकता है। प्राणाकर्षण प्रयोग में अन्तरिक्ष के असीम प्राण भण्डार से अनुदान प्राप्त किये जाते हैंं। इनका प्रयोग इस प्रकार है :-
पूर्वाभिमुख हो पालथी मारकर बैठे। दोनों हाथ घुटनों पर, मेरुदण्ड सीधा, आँखें बन्द। ध्यान करें कि अखिल आकाश प्राण तत्व से व्याप्त है। सूर्य के प्रकाश में चमकते बादलों की शक्ल के प्राण का उफान हमारे चारों ओर उमड़ता चला आ रहा है। नासिका के दोनों छिद्रों से साँस खींचते हुए यह भावना कीजिए कि प्राण तत्व के उफनते हुए बादलों को हम अपने अन्दर खींच रहे हैं। यह प्राण हमारे विभिन्न अवयवों में प्रवेश कर रहा है। जितनी देर आसानी से रोक सकें साँस को भीतर रोकें, भावना करें कि प्राण तत्व में सम्मिलित चैतन्य, बल, तेज, साहस, पराक्रम जैसे घटक हमारे अंग-प्रत्यंगों में स्थिर हो रहे है। इसके बाद साँस धीरे-धीरे बाहर निकालें, साथ ही चिन्तन कीजिए कि प्राण का सार तत्व हमारे अंग-प्रत्यंगों द्वारा पूरी तरह सोख लिया गया है। थोड़ी देर तक बिना साँस के रहें व भावना करें कि जो दोष बाहर निकाले गये हैं, वे हमसे बहुत दूर चले जा रहे हैं व उन्हें अब अन्दर प्रवेश नहीं होने देना है। इस पूरी प्रक्रिया को पाँच प्राणायामों तक ही सीमित रखा जाय।
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