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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आन्तरिक कायाकल्प का सरल किन्तु सुनिश्चित विधान आन्तरिक कायाकल्प का सरल किन्तु सुनिश्चित विधानश्रीराम शर्मा आचार्य
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आन्तरिक कायाकल्प का सरल विधान....
दूध कच्चा, धीमी आँच पर एक उफान तक गरम कर ठण्डा किया हुआ, कुकर में भाप से गरम किया अथवा मन्द आँच पर धीरे-धीरे गरम किया हो सकता है। दुग्धकाल में कभी-कभी कच्चे दूध का आंशिक या पूर्ण प्रयोग किया जाता है। शास्त्रीय पद्धति के अनुसार दूध को मिट्टी के पात्र में रखकर कपड़े से लपेट कर गीली मिट्टी में रखते हैंं। यदि उनमें स्वच्छता आदि की सम्भावना न हो तो गरम कर लेना ही हितकर है। धारोष्ण का कच्चा दुध श्रेष्ठ माना गया है। जिनका पेट ठीक है, आँव अथवा पतले दस्त नहीं होते, आदतें नियमित है-उन्हें इसी का सेवन करना चाहिए। इसमें विटामिन 'सी' पूर्णतः सुरक्षित रहता है। एक उफान पर गरम किए दूध में विटामिन 'सी' तो कम हो जाता है पर 'ए' मलाई की तह के नीचे पूर्णतः सुरक्षित रहता है। भाप से गरम किया दूध अधिक पोषक होता है, कब्ज नहीं करता। दुग्ध कल्प प्रयोजन हेतु उपयुक्त नहीं। यदि दही बनाकर मक्खन निकालना हो तो भी दूध को मन्द आँच पर गरम किया जाय।
दुग्ध कल्प के कुछ साधारण नियम इस प्रकार है-(१) दुग्ध चिकित्सा आरम्भ करने के पूर्व कम से कम एक दिन उपवास अवश्य कर लिया जाय। पेट संस्थान की पूर्ण शुद्धि होने पर पाचन शक्ति यथेष्ट मात्रा में बढ़ जाती है। (२) एक बार कल्प आरम्भ करने पर अपनी क्षमतानुसार २४ घण्टे की मात्रा स्वयं निर्धारित कर लेना चाहिए। इस बीच पानी कम से कम लें। एक बार में 20 ग्राम दूध से अधिक न लें। जो भी पियें, यथा सम्भव चीनी रहित हो, एवं धीरे-धीरे चम्मच से स्वाद लेकर पीयें। आजकल की स्थिति को देखते हुए २४ घण्टे में दो या तीन लीटर की मात्रा अधिकतम है। (३) पहले दिन कम से आरम्भ कर मात्रा को धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए। केवल दिन-दिन के १२ घण्टे में पीना चाहिए। रात्रि का समय पूर्णतः उपवास युक्त हो। (४) कुछ लोगों को आरम्भ में पेट में वायु अधिक बनने से गुड़-गुड़ाहट अधिक होती है, डकारें आती हैं, ऐसे में एक दिन उपवास कर लेना अधिक श्रेष्ठ है। (५) कब्ज की स्थिति में शुद्ध पानी का एक एनिमा ले लेना ठीक रहता है।
किसी भी एक आहार का कल्प करने में एकरसता की स्थिति आ जाती है। ऐसे में यह जरूरी है कि मन प्रसन्न हल्का-फुल्का रखा जाय। प्रसन्नता, उत्साह, चिकित्सा के प्रति श्रद्धा से जठराग्नि प्रबल होती है। हमेशा यही भावना करनी चाहिए कि "मेरा जो भी इलाज हो रहा है, उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। कोई भी मानसिक अवरोध या पुराने संस्कार मुझे इस निश्चय से विचलित नहीं कर सकते।"
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