आचार्य श्रीराम शर्मा >> आन्तरिक कायाकल्प का सरल किन्तु सुनिश्चित विधान आन्तरिक कायाकल्प का सरल किन्तु सुनिश्चित विधानश्रीराम शर्मा आचार्य
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आन्तरिक कायाकल्प का सरल विधान....
रोगों के दो वर्ग हैं एक आधि दसरा व्याधि। व्याधि शारीरिक रोगों को और आधि मानसिक रोगों को कहते हैंं। ज्वर, खाँसी, दमा, दर्द, अपच, मधुमेह, रक्तचाप आदि को शारीरिक रोग में गिना जाता है और उन्माद, सनक, मूर्खता, विस्मृति, विसंगतियाँ, उलझन आदि की मानसिक रोगों में गणना होती है। मस्तिष्कीय रोगों की चिकित्सा पागलखाने के डाक्टर करते हैं और मनःचिकित्सक पूछताछ करके अंतरंग में जमी कुण्ठाओं को उगलवाने और सत्परामर्श देने के उपायों का सहारा लेते हैंं। शरीर विज्ञानी उपचार औषध शल्य कर्म आदि के द्वारा करते हैंं। इनमें आंशिक सफलता भी मिलती है, पर प्रयत्न फिर भी अधूरा ही रह जाता है। वैसा लाभ नहीं मिलता जैसा अभीष्ट है। इस अधूरेपन को दूर करने के लिए मन की उस गहराई तक जाना होगा जहाँ से कि शरीर और मन को प्रभावित करने वाले प्रवाहों को उभारने और काम करने की प्रेरणा मिलती है। कुँए में जो पानी भरा दीखता है वह उसकी तली में जल फेंकने वाले स्रोतों से आता है। इसी प्रकार मस्तिष्कीय अस्त-व्यस्ततायें चेतना की मूल प्रवृत्ति के मर्मस्थल में से उभरती है। मनुष्य के गहन अन्तराल में कुछ आस्थायें जैसी होती हैं। व्यक्तित्व का मूल स्रोत उन्हीं में सन्निहित है।
पौराणिक प्रतिपादन है कि देवता स्वर्ग में ऊर्बलोक में रहते हैंं और दानव भूमि से नीचे पाताल में-पतितावस्था में रहते हैंं। देवताओं का स्वर्ग लोक आकाश में ऊँचाई पर है। इन्हें उत्कृष्टता और निकृष्टता का लोक कह सकते हैंं। लोकों का वर्णन किया गया तो इस प्रकार है मानो ये कोई देश क्षेत्र हों, पर वस्तुतः वे मनोभूमियों पर हैं और उन्हें दृष्टिकोण भी कहा जा सकता है। स्वर्ग में सुख-सम्पदायें भरी पड़ी है और नरक में यातनाएँ ही यातनाएँ है। यह यातनाएँ मरने के बाद ही मिलती हों ऐसी बात नहीं है। उनका अनुभव इसी जीवन में, इसी शरीर में भी किया
जाता है। शारीरिक व्याधियाँ और मानसिक आधियों को इसी रूप में लिया जा सकता है।
अन्तःकरण की आस्थाएँ ही है जो मनुष्य को ऊपर उठने एवं नीचे गिरने की प्रेरणा देती है। उसी की प्रतिक्रिया व्यक्तित्व को समुन्नत एवं पतित बनाकर रख देती हैं। इसी आन्तरिक उत्थान-पतन के आधार पर मनुष्य स्वर्गीय एवं नारकीय दृष्टिकोण विनिर्मित करता है और तदनुसार अनेक प्रकार के शारीरिक, मानसिक कष्टों को सहन करना पड़ता है। इतना ही नहीं जीवन के अन्य क्षेत्र भी ऐसी विषम परिस्थितियों से भर जाते हैं जिनमें रहने वाला अपने को पग-पग पर असफल, उपेक्षित, तिरस्कृत, दरिद्र और दुर्भाग्यग्रस्त अनुभव करता है।
डॉ. ब्राउन, डॉ. पीले मैगडुगल, हेडफील्ड और डॉ. जंग आदि अनेक प्रसिद्ध मनोविज्ञान शास्त्रियों ने यह माना है कि फोड़े-फुन्सी से लेकर टी. बी. और कैन्सर तक की बीमारियों के पीछे कोई दूषित संस्कार ही कारण होते हैंं। मनुष्य बाहर से ईश्वर परायण, सत्यभाषी, मधुर-व्यवहार करने वाला दिखाई देता है। पर सच बात यह होती है कि यदि अन्तर्मन की नैतिकता को दबाकर केवल दिखावे के लिए कुछ किया जाता है तो उसका मन भीतर ही भीतर अन्तर्द्वन्द्व करता है। उस अतद्वन्द्व के फलस्वरूप ही उसमें रोग पैदा होते हैंं। कई बार यह संस्कार बहुत पुराने हो जाते हैंं, तब बीमारी फूटती है। पर यह निश्चय है कि बीमारियों का पदार्पण बाहर से नहीं व्यक्ति के मन से ही होता है।
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