|
पौराणिक >> अभिज्ञान अभिज्ञाननरेन्द्र कोहली
|
10 पाठक हैं |
||||||
कृष्ण-सुदामा की मनोहारी कथा...
"मुझे किसी को प्यार देने में कठिनाई नहीं हुई। मेरा प्यार मेरी आवश्यकता नहीं है, मेरा स्वार्थ नहीं है। वह मेरी करुणा से उत्पन्न हुआ है और करुणा की कोई सीमा नहीं होती। जिन्हें मेरी आवश्यकता है, मैं उन सबका हूं। जो मुझे प्यार करते हैं, मैं उन सबसे प्यार कर सकता हूं। मैं किसी के प्यार का तिरस्कार नहीं करता। वह पाप है।"
"और वे सोलह हज़ार रानियां?' सुदामा के स्वर में चुहल थी।
"हां, उनकी चर्चाओं ने मुझे बहुत विलासी प्रमाणित किया है। इसमें कुछ मेरे शत्रुओं का योगदान है और कुछ मेरे भक्तों का।" कृष्ण मुस्करा रहे थे, "मैंने जब भौमासुर की हत्या की तो उसके अन्तःपुर में सहस्रों स्त्रियां बन्दिनी पायी गयीं। उनमें से अनेक का अपहरण स्वयं भौमासुर ने किया था, कुछ को उसने अन्य अपहरणकर्ताओं से खरीदा था। जाने वह क्यों उनका संग्रह कर रहा था...अपने विलास के लिए...या उनके व्यापार के लिए। वह तो मर गया, फिर कौन बताता?' कृष्ण ने रुककर सुदामा को देखा, "उनकी मुक्ति के पश्चात् समस्या यह उठ खड़ी हुई कि उनका भविष्य क्या है? उन अपहृत स्त्रियों को न उनके पिता स्वीकार करते, न पति। कहां जायें वे? उनका भरण-पोषण कौन करे? उनकी सामाजिक स्थिति क्या हो? तब मुझे एक ही मार्ग सूझा कि उस गरल को मैं ही पियूं। यदि अन्य कोई पुरुष उन्हें स्वीकार करता भी तो कदाचित् जीवन में अनेक बार यह घटना उनकी यातना का कारण बनती।...अन्ततः उनकी सहमति पाकर, उनसे मैंने सामूहिक विवाह कर लिया। अब उनके भरण-पोषण के लिए कोई अभाव नहीं है। उनकी सामाजिक स्थिति, कृष्ण की रानियों की है। उन्हें पति का प्यार तो क्या दे पाऊंगा; हां, उन्हें सुहाग अवश्य दिया है। अब वे भौमासुर द्वारा अपहृत अथवा हाट में बेची गयी अपमानित नारियां नहीं हैं; वे कृष्ण की पत्नियां हैं।" कृष्ण ने पुनः हंसकर सुदामा को देखा, "यदि कोई अन्य पुरुष उनमें से किसी को भी प्रेम और सम्मान के साथ अंगीकार करने का साहस करता तो कृष्ण को बड़ी प्रसन्नता होती।"
यद्यपि यह सुदामा का स्वभाव नहीं था; फिर भी जाने क्यों कृष्ण के सन्दर्भ में और विवाह के प्रसंगों ने, सुदामा के मन में एक चुहल जगा दी थी; पर कृष्ण का वक्तव्य तो उस लालित्य को ही सोख गया। सुदामा के सम्मुख भ्रमर-प्रवृत्ति का रसिक नहीं, सामाजिक मर्यादा की रक्षा करने वाला तथा एक नयी नैतिकता की स्थापना करने वाला एक साहसी गम्भीर पुरुष बैठा था। सुदामा का अपना जीवन. इन सारे प्रसंगों से सर्वथा शून्य था। न उनकी कोई सखी थी, न प्रिया। उनका जीवन तो वेदों के शुष्क चिन्तन और ब्रह्मचर्य के कठोर संयम में बीता था। सशीला तो उन्हें धर्मपत्नी के रूप में मिली थी। वह कृष्ण को और ही प्रकार का रसिक...वन्दावन की गोपियों के विषय में पूछने का साहस सुदामा को नहीं हुआ...
|
|||||
- अभिज्ञान










