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इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण भारत की एकता का निर्माणसरदार पटेल
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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण
मैं आपसे और आपके जरिए मुल्क भर से यह अपील करता हूँ कि हमें अपनी शक्ति को किफायत से बरतना चाहिए। हमें अपने सीमित बल का संचय करना चाहिए, जिससे कि हम उन संकटों का मुकाबला कर सकें, जिनसे हमारे कौमी अस्तित्व को भी खतरा है। अपने राष्ट्र को सच्चे और स्वस्थ ढंग पर बढ़ाना हमारा कर्तव्य है। जो राष्ट्रीय एकता हमने इतनी कठिनाई से प्राप्त की है, पहले उसे हम संगठित और एकरूप तो कर लें, उसके बाद हम और विभिन्नताओं की बात करें। हम उन्हीं बातों पर ध्यान दें, जिनसे कि एकता पैदा होती हुँ, न कि उन पर जो हमें अलग-अलग करती हैं। हालत ऐसी है और समस्याएँ इतनी विशाल और पेचीदा हैं कि जो कुछ हमने कर लिया है, उसी पर सन्तोष करके हम बैठ नहीं सकते। आजादी के पहले वर्ष में हमने जो कुछ करने की कोशिश की है-विदेशों में दूतावास, लीगेशन, कांस्युलेट आदि स्थापित करना, विदेशी मामलों में हमारा भाग लेना, रियासतों को समस्त राष्ट्र का अंग बनाना और उनको प्रजातान्त्रिक रूप देना, शासन और रक्षा की सर्विसों का पुनर्निर्माण, अपनी आन्तरिक सुरक्षा को मजबूत बनाना, उन्नति की अनेक योजनाओं को तैयार करना और उन पर अमल करना, शरणार्थियों को लाना, और उनको फिर से बसाना-यह सब असल में उन बड़े कामों की शुरुआत हैं जिनको अभी अपने हाथ में लेना है।
कोई भी विदेशी नीति, चाहे वह कितनी भी अच्छी तरह सोची हुई क्यों न हो, विदेशों में हमारी कोई संस्था, चाहे वह कितनी भी कुशल क्यों न हो, कोई विशेष असर नहीं डाल सकती, जब तक कि उसके पीछे एक ठोस शक्ति न हो। आज की अन्तर्राष्ट्रीय सभाओं में किसी मामले की विजय केवल इसी कारण नहीं होती है, कि वह सच्चा है और उसमें नैतिक बल है। किसी सच्चे और बलवान मामले को भी उसे प्रस्तुत करनेवाले देश की शक्ति और साख का समर्थन प्राप्त होना चाहिए। विदेशी मामलों में हिन्द को एक काफ़ी बड़े क्षेत्र में अनेक अवसर प्राप्त हैं। एशिया में उसका सब से ऊँचा स्थान है और आज की परिस्थितियों में इस विशाल महाद्वीप में अकेला यही देश अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों को स्थिर करनेवाला बन सकता है। इस प्रदेश में हिन्द को पर्याप्त और उचित मात्रा में काम करना चाहिए। हमारी बचाव की सेनाएँ पूरी तरह कुशल हैं। वे असरदार ढंग से काम कर सकें, इसके लिए उनके पीछे एक महान औद्योगिक प्रयत्न होना जरूरी है। अगर हमको बचाव के जरूरी सामान के लिए विदेशों के आसरे रहना पड़ा, तो हमारे अस्तित्व के लिए भी संकट पैदा हो जाएगा।
संसार की वर्तमान आर्थिक व्यवस्था में हमें विदेशी मुद्रा को किफायत से काम में लाना चाहिए। हमें विदेशों से आए हुए माल पर बहुत कम निर्भर रहना चाहिए। और अपनी जरूरी चीज़ें, जहाँ तक सम्भव हो, खुद पैदा कर लेनी चाहिए। आज हमें जहाज भी बनाने हैं, जो हमारा माल विदेशों में ले जाएँगे और जरूरी सामान इधर लाएँगे। हमारा समुद्रतट बहुत लम्बा होने के कारण हमारे अस्तित्व के लिए एक मजबूत समुद्री फौज और एक तिजारती बेड़ा होना भी जरूरी है। अगर हमें अपने लोगों का पेट भरना है, तो हमें अपने यहाँ अधिक अनाज पैदा करना चाहिये। अगर हमें अपने सब लोगों को उनकी कम-से-कम जरूरत के लायक कपड़ा भी पहनाना है, तो अब की अपेक्षा हमें कहीं अधिक कपड़ा बनाना होगा। पानी से बिजली निकालने का भी एक विशाल प्रोग्राम हमें हाथ में लेना है, जो साधारण लोगों के जीवन-स्तर को ऊँचा करने का साधन बनेगा। दामोदर घाटी बाँध, हीरा कुद वांध, भाखड़ा बांध, और इसी तरह चंबल, कोसी, तुंगभद्रा, गोदावरी, नर्मदा और ताप्ती की बहुउद्देशी योजनाएँ इस बड़े प्रोग्राम के कुछ उदाहरण हैं। हमें देश की छिपी हुई दौलत से लाभ उठाना है। पेट्रोलियम, कोयला, लोहा, वाक्साइट, और दूसरे खनिज जो इस मुल्क में बहुतायत से पाए जाते हैं, परन्तु अनुभवी आदमियों और कारीगरों की कमी और पर्याप्त पूंजी के अभाव के कारण उनकी ओर हम ध्यान नहीं दे सके थे। अब उधर भी हमें काम करना है।
पर यह सब करके भी हम अपनी विशाल आजादी के एक छोटे-से भाग को ही छू सकेंगे। हमारा देश कृषि प्रधान है और हमारे सामने खेती के मजदूरों की एक बहुत बड़ी संख्या की भी समस्या है, जो साल में काफी समय के लिए खाली रहते हैं। उनके लिए और उन पर आश्रित उनके परिवारों के लिए हमें को-आपरेटिव ढंग पर घरेलू धंधों की एक कुशल और सुसंगठिक व्यवस्था बनानी है और उसको बढ़ाना है। हमें एक ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा की बुनियाद भी रखनी है, जो हमारे लोगों की प्रकृति, उनकी जरूरतों और उनकी विशेष योग्यता के अनुकूल हो। हमें स्वस्थ बुद्धि और स्वस्थ शरीरों के आधार पर एक स्वस्थ और सबल राष्ट्र बनाना है।
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- वक्तव्य
- कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
- लखनऊ - 18 जनवरी 1948
- बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
- बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
- दिल्ली - 18 फरवरी 1948
- पटियाला - 15 जुलाई 1948
- नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
- गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
- बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
- नागपुर - 3 नवम्बर 1948
- नागपुर - 4 नवम्बर 1948
- दिल्ली - 20 जनवरी 1949
- इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
- जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
- हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
- हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
- मैसूर - 25 फरवरी 1949
- अम्बाला - 5 मार्च 1949
- जयपुर - 30 मार्च 1949
- इन्दौर - 7 मई 1949
- दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
- बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
- कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
- दिल्ली - 29 जनवरी 1950
- हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950








