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इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण भारत की एकता का निर्माणसरदार पटेल
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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण
अब रियासतों को लीजिए। जिस सफल ढंग से रियासतों को राष्ट्र का अंग बना लिया गया है और उन्हें प्रजातान्त्रिक रूप देने की कार्रवाई की जा सकी है, उसके लिए मुझे बहुत-सी बधाइयाँ और मानपत्र दिए गए हैं और मेरी बहुत प्रशंसा की गई है। मगर जैसा मैंने अपने नागपुर के भाषण में कहा था, कि अगर मैं इन सब का अधिकारी भी हूं तब भी अभी बधाई देने का समय नहीं आया। असली काम तो अब शुरू हुआ है। वह यह है कि सदियों से जो कुछ हमने खोया है, 'उसको पूरा किया जाए और रियासतों में एक ऐसी शासन-व्यवस्था बनाई जाए, जो एकदम मजबूत और कुशल हो। हमें इस बात का पक्का प्रबन्ध करना है कि पुराने और नये को मिलाकर एक ऐसा सुन्दर चित्रं बनाया जाए, जो कुल हिन्द के नक्शे में ठीक बैठ जाए। आप इस बात का ध्यान रखें कि बहुत-सी रियासतों में जनतन्त्र-शासन के प्रारम्भिक साधन भी नहीं थे और बहुत-सी रियासतों में स्थानीय पंचायतें आदि भी नहीं थीं और अगर कहीं थी भी, तो वे अपनी शैशव अवस्था में ही थीं। इस सम्बन्ध में वे बाकी भारत से बहुत अधिक पिछड़ी हुई थीं। इन रियासतों में भी हमने करीब-करीब रातों-रात में आधुनिक शासन व्यवस्था का भवन खड़ा कर दिया है। इसके लिए प्रेरणा और बढ़ावा हमें ऊपर से मिला है, नीचे से नहीं। यह पौधा बाहर से लाकर वहाँ लगाया गया है और जब तक यह वहाँ की धरती में जड़ नहीं पकड़ता, तब तक इसके गिर जाने का खतरा है।
कुछ ऐसे विशेष उत्साही लोग भी हैं, जो यह समझते हैं कि रियासतों की समस्या हल हो गई है। ये लोग अभी से आगे बढ़ने को उतावले हैं। मैं उन लोगों से रियासतों की समस्या के इस चित्र पर शान्ति से विचार करने को कहूँगा, जो अभी मैंने आप के सामने खींचा है। असलियत को न देखना मूर्खता होगी। अगर कहीं तथ्यों को सचाई के साथ देखने से इंकार कर दिया जाता है, तो वे अपना बदला लेते हैं।
मैंने अब तक आपके सामने उन कठिन और भारी जिम्मेवारियों का चित्र रखा है, जो उन लोगों पर पड़ी हैं, जिन्हें इस देश के भावी शासन का निर्माण करना है। मुझे विश्वास है कि आप मुझसे सहमत होंगे कि इन जिम्मेवारियों का परिणाम ऐसा है कि, जो हमारा सारा ध्यान अपनी ओर मांगता है। आज हमारे पास तुच्छ झगड़ों में नष्ट करने के लिए जरा भी समय नहीं है। यह समय दलबन्दियों और निजी प्रतिद्वन्द्विता का नहीं है। अगर आज़ादी की लड़ाई के लिए हमें भरपूर बलिदान देने और कष्ट सहन करने की आवश्यकता थी, तो राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के काम में भी पूरी कोशिश और पक्के इरादे से काम करने की जरूरत है। बल्कि देश के हित में निःस्वार्थ भाव से जुट जाने की ज़रूरत आज आजादी की लड़ाई के जमाने से भी ज्यादा है। यह हमारे अस्तित्व का प्रश्न है और इसी प्रश्न को हल कर हम अपनी आज़ादी की रक्षा कर सकते हैं जिस आज़ादी को कीमत देकर हमने प्राप्त किया है। हमें उन भारी जिम्मेदारियों को समझना चाहिए, जो आज़ादी के साथ हम पर आई हैं। जो कीमती विरासत हमे अपने महान नेता की तपस्या से और अपने शहीदों के बलिदान से मिली है, उसे हमें फेंक नहीं देना है। अगर हम इस मौके पर ऊपर नहीं उठें और राष्ट्रीय पुनरुत्थान के इस पवित्र काम में हमने अपने-अपने क्षेत्र में अपनी शक्ति के अनुसार भाग नहीं लिया तो इतिहास और आगे आनेवाली हमारी सन्तानें हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी।
जरूरत की इस घड़ी में देश सेवा की खास जिम्मेवारी आप लोगों पर है। पुरानी पीढ़ी के हम लोगों के जीवन का अब सायंकाल आ रहा है। हमें ती सूर्यास्त और सन्ध्या के तारे की प्रतीक्षा है। हमारे दिन अब बीत गए हैं, और हमें गर्व है कि अपनी जिन्दगी में ही हमने देश की आजादी हासिल कर ली। हम अपने को सौभाग्यशाली समझते हैं कि हमको कुछ वर्ष ऐसे भी मिल गए हैं, उनमें इस आज़ादी को संगठित करने की यथाशक्ति कुछ सेवा भी कर सके। देश के नेतृत्व का वीड़ा जल्दी ही आपको उठाना पड़ेगा और सार्वजनिक कामों का संचालन करना होगा। आप अपने जीवन की उस अवस्था पर हैं, जब मनुष्य का वास्तविक निर्माण होता है। आप विश्व-विद्यालय को छोड़कर जा रहे है और अपने व्यावहारिक तथा सांसारिक जीवन के द्वार पर खड़े हैं। अपने-अपने व्यवसायों में आपको मातृभूमि की सेवा करने के बहुत-से मौके मिलेंगे। आपमें से जो अभी पढ़ाई जारी रक्खेंगे, या जो अपनी पढ़ाई समाप्त कर जीवन के महान विश्वविद्यालय में दाखिल हो जाएँगे वे सब भविष्य के लोग हैं। आप को अपनी बुद्धि, आत्मा और शरीर को उन कामों के योग्य बनाना है, जो आपके सामने हैं। हमने आपको वह सब से कीमती उपहार दिया, जो हम दे सकते थे। जिन जंजीरों और बेड़ियों से हमारी भारत माता के हाथ पैर जकड़े हुए थे, वे आज तोड़ दी गई हैं। हिन्द अब आजाद लोगों का देश है। अब आपको गुलामों की तरह व्यवहार नहीं करना पड़ेगा, जैसा कि पहले किसी समय में करना पड़ता था। आजाद लोगों की हैसियत से अब आपको अपना मस्तक ऊँचा रखना है। आपको अपनी आज़ादी की इज्जत और उसका नाम बनाए रखना है। जब हम गुलाम थे, तो हम अपनी कमियों और बुराइयों के लिये बहाने ढूंढ़ सकते थे। तब हमारे पास दोष धरने के लिए बने-बनाये पात्र मौजूद थे और अपनी सभी कमियों के लिए हम अपनी परतन्त्रता का नाम ले सकते थे। परन्तु अब हम इस अयोग्यता की बिना पर दूसरों से सहानुभूति या अनुकम्पा नहीं प्राप्त कर सकते। अब अपने भाग्य के निर्माता हम ही हैं और इसे जैसा हम चाहे वैसा बना सकते हैं।
इसलिए मैं आपसे अपील करता हूँ कि जो समस्याएँ मैंने आपके सामने रखी हैं, उन पर आप रचनात्मक रूप से विचार कीजिए। याद रखिए कि विध्वंस करना आसान है, परन्तु निर्माण के काम में असीम शान्ति और मेहनत की जरूरत होती है। पुरानी इमारत ढाने से पहले अपने नये भवन का रूप निश्चित कर लो। उन लोगों के बहकाने में मत आओ, जिनकी विध्वंस वृत्ति, उस पेड़ की जड़ तक काट डालने में संकोच नहीं करती, जो उन्हें छाया और आश्रय देता है। आपको धोखे में आकर किसी नयी विचारधारा को नहीं अपनाना चाहिए। जब तक कि आपका निश्चित मत न हो जाए तब तक किसी नई विचारधारा के अनुसार आपको आचरण नहीं करना चाहिए। और आज तो आपके सामने एक ही मापदण्ड होना चाहिए, वह यह है कि जो कुछ आप कर रहे हैं उससे राष्ट्र की समस्याओं को सुलझाने में कोई रचनात्मक मदद मिलेगी या नहीं। अधसोचे हल पहले-पहल किसी को भले ही आकर्षक लगें, पर अन्त में उनसे हानि और विनाश ही होता है। आज हमारे पास तजर्बे करने के लिए भी समय नहीं है। जितना समय हमारे पास है, वह सब-का-सब हमें अपनी आर्थिक व्यवस्था ठीक करने में, अपने साधनों को बढ़ाने के काम में लगाना है, ताकि उन लोगों की बढ़ती हुई माँगें पूरी की जा सकें, जो काफी समय से बेहद गरीबी की हालत में पड़े हुए हैं। आपको पूरी ज़िम्मेदारी और विवेक की भावना से काम करना है। मेरा कथन है कि जीवन का निचोड़ अनुशासन है। अनुशासन के बिना मनुष्य समाज या राष्ट्र उन्नति नहीं कर सकते, अनुशासन आपकी जमातों में और खेल के मैदानों में भी उतना ही जरूरी है, जितना वह आपके भावी व्यवसाय में है।
देश को इस समय सधे हुए और अनुशासन की शिक्षा प्राप्त युवकों की जरूरत है न कि गैर ज़िम्मेदार उत्पात मचानेवालों की। इस तरह आपके पास दृष्टि भी होनी चाहिए और आदर्श भी। जब तक कि आपके सामने अपनी मातृ-भूमि के भविष्य का यह गौरवमय दृश्य और उसकी महानता और उसके भाग्य की एक आदर्श कल्पना नहीं है, तब तक आप अपने वर्तमान कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को सच्चे रूप में नहीं समझ सकते। पर आपको यह अवश्य ही समझ लेना चाहिए कि अपने जीवन में कुछ कर सकने के लिए आपको अपने पैर हमेशा मजबूती से पृथ्वी पर जमाए रखने चाहिए। केवल दृष्टि और आदर्शवाद से कुछ न हीगा। आपको इन्हें ठोस कार्य के रूप में बदलना होगा और अपने उद्देश्यों का वास्तविकता के कठोर क्षेत्र में पाना होगा। आपको यह याद रखना चाहिए कि अपनी उच्च आकांक्षाओं को अन्य आकांक्षाओं द्वारा ही परास्त कर देना एक बड़ी दर्दनाक घटना है। आप को उस धातु का बनना चाहिए, जो पूर्व निर्धारित भाग्य को चुनौती देकर आपत्तियों पर हँस सकती है। सबसे पहले मातृ-भूमि की सेवा और लगन तथा ध्यान की प्राप्ति होनी चाहिए। आप चाहे किसी भी देश या भू-भाग में जाएँ, आपका कुछ भी व्यवसाय या धन्धा क्यों न हो, आपको सदा अपने देश के हितों का ध्यान रखना चाहिए और अपने दरिद्र देश-वासियों की नैतिक और भौतिक उन्नति को अपना आदर्श बनाना चाहिए। आप ऐसा कोई काम न करें जिससे आपके देश की आज़ादी खतरे में पड़े। बल्कि अपना जीवन देकर भी आप उसकी रक्षा का प्रयत्न कीजिए।
जयहिन्द!
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- वक्तव्य
- कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
- लखनऊ - 18 जनवरी 1948
- बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
- बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
- दिल्ली - 18 फरवरी 1948
- पटियाला - 15 जुलाई 1948
- नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
- गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
- बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
- नागपुर - 3 नवम्बर 1948
- नागपुर - 4 नवम्बर 1948
- दिल्ली - 20 जनवरी 1949
- इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
- जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
- हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
- हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
- मैसूर - 25 फरवरी 1949
- अम्बाला - 5 मार्च 1949
- जयपुर - 30 मार्च 1949
- इन्दौर - 7 मई 1949
- दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
- बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
- कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
- दिल्ली - 29 जनवरी 1950
- हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950








