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इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण भारत की एकता का निर्माणसरदार पटेल
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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण
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कांग्रेस विषय समिति, जयपुर
१७ दिसम्बर, १९४8
सदर साहब, जो प्रस्ताव आपके सामने रखा गया है, उस पर बहुत-से संशोधन भी रखे गए हैं। प्रश्न बड़ा विकट है, इससे इसपर बहुत बहस हुई है। दूसरे इस विषय पर दिल खोलकर बोलने से तकलीफ होती है। फिर भी अगर चन्द बातें मैं आपके सामने न रखूं, तो मैं शरणार्थियों की कुसेवा करूँगा। इस बात में हमारा मतभेद नहीं है कि शरणार्थियों की पूरी मदद की जाए। मतभेद इसमें होता है कि जो कुछ किया गया है, उसकी थोड़ी-सी तारीफ तो छोड़ दो। तब मुझे कुछ तकलीफ नहीं होगी। आज आपकी गवर्नमेंट है। वह अपना कर्तव्य पालन नहीं करती है, तो उसे उठा क्यों नहीं देते? चाहे कोई भी गवर्नमेंट बनाओ, इस मामले में वह कोई पूरा सन्तोष नहीं दे सकेगी, यह इतनी कठिन समस्या है। साथ-साथ जो मुसीबत हम पर आई, उसका भी सामना हमें करना है। केवल प्रस्ताव और संशोधन पास करने से मकान नहीं बन जाते। हर एक आदमी अलग-अलग राय बताता है। मकान तो तब बनेगा, जब उसके लिए जरूरी सामान मिलेगा। कौन ऐसा मूर्ख होगा, निष्ठुर होगा, जिसकी सहानुभूति शरणार्थियों से न होगी।
लेकिन इस सहानुभूति से शरणार्थी के पेट को कुछ नहीं मिलेगा। इस प्रस्ताव में हमें ऐसी भाषा का उपयोग नहीं करना चाहिए, जिससे शरणार्थी का दिमाग उलटा चले। आपका मकसद दूसरा हो, तो अलग बात है।
आप लोगों से मैं यह कहना चाहता हूँ कि गुस्से में आकर जो लोग बोलते हैं, उस से आपको क्रोध में बह नहीं जाना चाहिये। आप को देखना चाहिए कि जो लोग उस प्रश्न पर काम कर रहे हैं वे क्या करते हैं और क्यों करते हैं।
देश भर पर टैक्स डाल दो, यह कहना तो आसान है। हमारी कुछ गलती हो तो हमारे पास आओ, हम से बहस करो, हमें समझाओ। मगर कोई आकर कहते हैं कि नहीं करोगे, तो शान्ति नहीं रहेगी। मैं कहता हूँ कोई भी कुछ भी धमकी दे, मुल्क में अशान्ति नहीं होगी। आपको दुख है, तो वह क्रोध की आग बढ़ाने से कम नहीं होगा। मैं अनुभव से कहता हूँ कि आपके लिए देश भर में पूरी सहानुभूति थी। मगर आप जिस तरह से काम करते हैं, सहानुभूति कम होती जाती है। यह कठिन प्रश्न हल करने के लिए दिमाग ठण्डा रख कर जो कुछ भी हो सके, वह हमें करना है। हमारी गवर्नमेंट में कोई भी ऐसा नहीं है, जिसे शरणार्थियों से पूरी सहानुभूति न हो। फिर भी अगर यों ही गवर्नमेंट पर हल्ला किया जाएगा, तो उसका बुरा परिणाम आएगा। हमने रिफ्यूजी मिनिस्टरी बनाई, इसी काम के लिए केबिनेट की कमेटी बनाई। मगर गवर्नमेंट पर हल्ला करने से शरणार्थियों को नुकसान होगा। शरणार्थियों को अगर आप बहका दें और मुल्क में अशान्ति करवाएँ, तो उसकी जिम्मेवारी आप पर होगी। अगर कांग्रेस जिन्दा नहीं है, तो मुरदे के पास चिल्लाने से क्या फायदा?
कोई राजा-महाराजा हो या चोर-डाकू हो या कोई दुखी आदमी हो, मगर किसी को अशान्ति करने का अधिकार नहीं है। सिन्ध, पंजाब, बलूचिस्तान और फ्रंटियर में तो मामला साफ हो गया। वहाँ कोई हिन्दू सिख रहेगा ही नहीं। परन्तु पूर्व बंगाल का मामला कठिन है। वहाँ के हिन्दू नरम और कमजोर लोग हैं। मगर पंजाबी लोग तगड़े हैं। हमारे पास आकर भी वे झगड़ते हैं उनमें इतनी जिन्दगी है। पूर्वं बंगाल के लोगों कीं मुसीबत इसलिए ज्यादा है कि वहां तो लोग खाली भूखे मरते हैं, वहाँ इज्जत का भी सवाल है। इसलिए मैने कहा कि साथ बैठकर फैसला करो। कोई दूसरा रास्ता हो तो मुझे बताइए। मुझे जो बात सूझी, वह मैंने कही। मैं तो हमेशा शान्ति चाहता हूँ। अगर शान्ति नहीं चाहता, तो जिन्दगी भर गान्धी जी के पास कैसे रहता? मेरे दिल में जो बात आती है, कह देता हूँ। हिन्दू को बुरा लगें, मुसलमान को बुरा लगे, इसकी मुझे परवाह नहीं। जिस भाषा में कहना चाहिए, शायद वह मैं नहीं सीखा हूँ। इतनी कमी ज़रूर है। दूसरी जिन्दगी में इस काम के लिए पुनः मुझे गान्धी जी के पास जाना पड़ेगा।
हमने हिन्दुस्तान की जो जवाबदारी ली है, उसे हम छोड़नेवाले नहीं हैं। अगर हमारे बौर्डर (सीमा) पर कोई आए, तो उसके लिए हमारी पूरी तैयारी है। यही मैंने ऐसा कहा था। जो कुछ व्यावहारिक हो, वही करने की नीति से हमारा काम होगा। हमारी उम्मीद तो यह है कि जितने लोग पूर्व बंगाल से आए हैं, उनको वापस जाना ही है। डाक्टर चोइथराम और मेहरचन्द के कहने से हमने हाई पावर कमेटी भी बनाई।
आपको मेरी यही सलाह रहेगी कि शरणार्थी की सेवा करनी हो, तो सरकार की सहानुभूति प्राप्त करो। जो लोग आज पड़े हैं, उन्होंने कभी हाथ पाँव नहीं चलाया। वे शहरों के रहनेवाले हैं। उनका काम कठिन है। केवल प्रान्तों के मन्त्रि-मंडलों से यह काम नहीं होगा। उनको यहाँ रहना है, यहीं धंधा-रोजगार करना है, तो यह सब उनकी सहानुभूति से होगा।
मैंने जो बातें कही हैं, वे सब आपके भले के लिए ही कही हैं। कुछ कड़ी बात भी कही हो, पर बुरे दिल से नहीं कही।
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कांग्रेस के जयपुर अधिवेशन की विषय समिति में शरणार्थियों के बारे में प्रस्ताव पेश करते हुए सरदार पटेल ने १७ दिसम्बर ४८, शुक्रवार की दोपहर दो 12/1/2 बजे यह भाषण दिया था।
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- वक्तव्य
- कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
- लखनऊ - 18 जनवरी 1948
- बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
- बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
- दिल्ली - 18 फरवरी 1948
- पटियाला - 15 जुलाई 1948
- नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
- गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
- बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
- नागपुर - 3 नवम्बर 1948
- नागपुर - 4 नवम्बर 1948
- दिल्ली - 20 जनवरी 1949
- इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
- जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
- हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
- हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
- मैसूर - 25 फरवरी 1949
- अम्बाला - 5 मार्च 1949
- जयपुर - 30 मार्च 1949
- इन्दौर - 7 मई 1949
- दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
- बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
- कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
- दिल्ली - 29 जनवरी 1950
- हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950








