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इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण भारत की एकता का निर्माणसरदार पटेल
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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण
मैं यह सिर्फ़ बात ही नहीं करता। यह हमें अमल में करके दिखाना है। यह परमात्मा के सामने हमारा दायित्व है। यह हैदराबाद के दो करोड़ निवासियों के भविष्य का सवाल है। इसमें चन्द आदमी आ करके धोखाबाजी करते हैं, एक प्रकार टैररिज्म (आतंक) फैलाते हैं कि यहाँ कोई काम न करने दो। वह सब अब नहीं चलेगा। जब अत लड़ते थे, तो उसमें भले बुरे सभी शामिल हो जाते थे। वह अब चल नहीं सकता। यदि कांग्रेसमैन यहाँ खुद उनको बन्दूक से मारता है, तो ऐसी हालत में अच्छा यह है कि तुम गाड़ी मत चलाओ। इस तरह से मैं आपके हाथ जिम्मेवारी दूंगा नहीं क्योंकि मैं हिन्दुस्तान की हुकूमत की तरफ से आप लोगों को सलाह देने के लिए आया हूँ। पूरी जिम्मेवारी के साथ मैं आपको यह सलाह देता हूँ कि पिछली सब बातों को भूल जाओ, क्योंकि हमें जल्दी ही आगे चलना है। हैदराबाद हिन्दुस्तान के पेट के समान है। हिन्दुस्तान के जिगर में, हिन्द के पेट में, यदि ट्यूमर (पेट का फोड़ा) पड़ा है, तो हिन्दुस्तान तन्दुरुस्त नहीं रह सकता। तो जो पुरानी हुकुमत यहां थी, वह तो हट गई। परन्तु उसी से हमारा रोग चला गया, या ट्यूमर मिट गया, ऐसा नहीं हो सकता। जब तक आप लोग स्वच्छ न हो जाएं, आप लोग सावधान न हो जायँ और आप लोग आपस में मिल न जाएँ, तब तक इस रोग का इलाज नहीं होगा। तो हमारी रियासत में जितने लोग हैं, उनको पिछली बातें भूल जानी चाहिए। हिन्दू हों, मुसलमान हों, हरिजन हों, किसी भी कौम के लोग हों, सबको आपस में एक दूसरे का भय निकाल देना है और एक दूसरे के साथ अविश्वास को निकाल देना है। सबको यह समझना चाहिए कि वह पुरानी रात चली गई है, और अब नई सुबह आई है। प्रातःकाल के बाद पिछली रात के दुःस्वप्न को हमें याद नहीं करना चाहिए। जिन लोगों को इधर रहना है, उन सबको एक हो जाना चाहिए। जिसमें एक होने की शक्ति न हो, उनको मैं अभी से सलाह देता हूँ कि वे जल्दी-से-जल्दी हैदराबाद को छोड़कर चले जाएँ।
मैं आपसे यह भी कहना चाहता हूँ कि रियासत में जो भी सरकार बनेगी, वह लोकमत से बनेगी। हमें सबको मौका देना है। लेकिन जिनकी यहाँ महान ताकत है और बड़ी जमात है, उनको यहाँ बड़ा हिस्सा मिलने ही वाला है। उसको कोई रोक नहीं सकता। क्योंकि डेमोक्रेसी (प्रजातन्त्र) की यह नीति है कि जो मेजोरिटी (बहुमत) है, उनको ज्यादा हिस्सा मिलता ही है। लेकिन यहां जो माइनोरिटी (अल्पमत) है, उसके दिल में भी यह विश्वास पैदा हो जाना चाहिए कि यदि हम हैदराबाद के प्रति वफादार रहेंगे, तो हमें कोई खतरा नहीं है। उनको भी मौका मिलेगा, जैसे सब को मिलता है। जिस प्रकार की डेमोक्रसी सारे हिन्दुस्तान में है, उसी प्रकार की डेमोक्रेसी हैदराबाद में भी होगी। तो आप जल्दी से अपना उत्तरदायित्व सम्भालने की तैयारी करें। पिछले डेढ़-दो सालों में जो काम यहाँ किया गया, वह सब उल्टा हुआ और उससे बहुत नुकसान हुआ। उसने हैदराबाद की हालत बिगाड़ दी। इतना ही नहीं, बल्कि हैदराबाद में कोई काम ही नहीं होने दियां। यहाँ ऐसे लोग हुकूमत कर रहे थे, जो एक तरफ हमारे साथ समझौता कर रहे थे और दूसरी तरफ पाकिस्तान को लोन (कर्ज) देने की कोशिश कर रहे थे। क्या मैं भी उन चीजों को याद करना नहीं चाहता? मुझे ऐसी चीज की याद करने से दुख होता है। लेकिन अभी भी वहाँ से सामान आता है। क्या हैदराबाद का भी दिमाग उन लोगों में पड़ा है?
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- वक्तव्य
- कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
- लखनऊ - 18 जनवरी 1948
- बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
- बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
- दिल्ली - 18 फरवरी 1948
- पटियाला - 15 जुलाई 1948
- नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
- गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
- बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
- नागपुर - 3 नवम्बर 1948
- नागपुर - 4 नवम्बर 1948
- दिल्ली - 20 जनवरी 1949
- इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
- जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
- हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
- हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
- मैसूर - 25 फरवरी 1949
- अम्बाला - 5 मार्च 1949
- जयपुर - 30 मार्च 1949
- इन्दौर - 7 मई 1949
- दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
- बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
- कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
- दिल्ली - 29 जनवरी 1950
- हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950








