|
इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण भारत की एकता का निर्माणसरदार पटेल
|
|
||||||
स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण
तो मैं कहना चाहता हूँ कि हैदराबाद का सवाल हैदराबाद को हल करना है। इसके लिए कोई बाहर से आने वाला नहीं है, कोई और बाहर से सलाह नहीं दे सकता। हैदराबाद को हिन्दोस्तान कभी छोड़ भी नहीं सकता और न कभी उसको नेगलेक्ट (उपेक्षित) कर सकता है। तो हमारे ऊपर एक जिम्मेवारी है कि हम हैदराबाद को जल्दी-से-जल्दी ठीक कर लें। इसमें मुझे कोई सलाह देने की जरूरत नहीं है। अगर यहाँ बोझे उठाने के लिए कोई लोग तैयार हों, और दूसरे सब कोई उन्हें मदद देने के लिए तैयार हों तो उन्हें उत्तरदायित्व देने में जितनी मदद बन सकेगी मैं दूंगा। लेकिन मेरे हाथ से कोई मैला काम नहीं होगा। क्योंकि मैं हिन्दुस्तान की तरफ से जिम्मेदारी से बोल रहा हूँ। में सबसे पुनः कहूँगा कि यदि कोई पुराना पाप अपने दिल में रखेगा, या पुराना जहर बाहर निकालेगा तो वह हैदराबाद का नुकसान करेगा और खुद अपना भी नुकसान करेगा। पिछली बातों को भूल जाओ और जल्दी से हैदराबाद की आबोहवा साफ कर दो। साफ करने का मतलब यह है कि हम एक दूसरे के साथ मिलकर हैदराबाद की आर्थिक और राष्ट्रीय स्थिति ठीक करने में लग जाएँ। यहाँ जो साम्यवादी या कम्युनिस्ट लोग हैं, जो नौजवान कम्युनिस्ट बनके इधर हैदराबाद में बढ़ आए हैं, उनमें कई लोग तो सिर्फ उत्पात करने के लिए इधर आए हैं, क्योंकि इस तरह उन्हें काफी पैसा मिलता है। मैं उनसे कहता हूँ कि हैदराबाद को छोड़ दो, दूसरी जगह पर जाओ, क्योंकि हैदराबाद में एक कम्युनिस्ट को भी मैं सहन नहीं करूँगा। (तालियाँ)
मेरी बात का मतलब यह है कि हैदराबाद में जो जहर फैल रहा है, वह सारे हिन्दुस्तान का काम बिगाड़ रहा है। इसीलिए इन लोगों को हैदराबाद छोड़ कर बाहर चले जाने की सलाह मैं दे रहा हूँ। तो बहुत से लोग आस-पास से आ कर इधर पड़े हैं। जितने कम्युनिस्ट यहाँ पकडे जाते हैं, वह बाहर से आए हैं। वह बाहर से क्यों आए? इसीसे मैं उनसे कहता हूँ कि तुम बाहर जाओ, जहाँ तुम्हारे लोग हैं, वहाँ जाओ। तुम इधर क्यों आए? जब इस तरफ हैदराबाद की आजादी की लड़ाई चलती थी, तब कुछ-न-कुछ बहाना निकाल कर वे इधर आ गए। उसमें उन्होंने क्या काम किया, वह मैं कहना नहीं चाहता। भला किया बुरा किया, रुकावट की, वह सब कुछ मैं कहना नहीं चाहता। लेकिन मैं यह जरूर कहना चाहता हूँ कि अब काम बिगाड़ने का समय नहीं रहा। कोई कहता है कि इन लोगों ने अच्छा काम किया। ठीक है, अच्छा किया होगा। लेकिन अच्छा और बुरा दोनों को मिलाने से नतीजा जो निकलता है, वह बुराई का ही होता है। आज हैदराबाद का सारा काम इसीलिए रुक रहा है। देखिए, हमें अब चुनाव का काम करना है। तो यदि यहां मतपत्रक बन जाए, इलेक्टोरल रोल बन जाए तब तो हमारा काम आगे चले। और इलेक्टोरल रोल बनाने के लिए हमें बाहर से आफिसर ला के रखने हैं। यह कम्युनिस्ट लोग वहाँ भी पहुँच गए हैं और इलेक्टोरल रोल बनाने के काम में भी रुकावट डालते हैं।
साथ-ही-साथ एक और काम भी आप को करना है। हमारे मुल्क में, जैसा कई और जगहों पर है, हजारों लोग अस्पृश्य माने जाते हैं। उनकी हालत बहुत बुरी है। इन अस्पृश्य लोगों की सेवा भी आज हमें करनी है। हम कोई ऐसा काम न करें, जिसकी वजह से उनके दिल में ऐसी भावना पैदा हो जाए कि हैदराबाद तो आजाद हुआ, लेकिन हमारी आजादी अभी नहीं आई। जैसी गुलामी पहले थी, वैसी गुलामी अब भी है। हमने सारे हिन्दुस्तान में से अस्पृश्यता को नष्ट करने के लिए आन्दोलन शुरू किया है, कानूनों से हमने अस्पृश्यता को बन्द किया है। यहाँ की कांग्रेस का यह भी कर्तव्य हो जाता है। हमें अपनी सारी ताकत इन लोगों को उठाने के लिए खर्च करनी है।
दूसरा काम मजदूरों का है। हैदराबाद में जो कारखाने चलते हैं, जो इण्डस्ट्रीज चलती हैं, उनमें मजदूरों को क्या वेतन मिलता है? यह आज तक कुछ भी चला हो, लेकिन अब इस तरह से नहीं चल सकता। हिन्दुस्तान में मजदूरों के लिए जो कानून है, हिन्दुस्तान में उन्हें जो वेतन मिलता है और जिस प्रकार उनका संगठन बनता है, वह सब हमें यहाँ भी करना है। इस प्रकार मजदूर को राहत मिलनी चाहिए और उसको उत्तेजना मिलनी चाहिए, ताकि वह ज्यादा से ज्यादा काम करे। लेकिन यह जो कम्युनिस्ट लोग यहाँ आए हैं, और जो हमारे यहाँ फले-फूले हैं, उसका कारण हम भी तो हैं, कि हमने मजदूरों और गरीबों को दबा रखा है। हमने किसानों को भी इसी तरह दबाया, मजदूरों को इसी तरह से दबाया और उससे कम्युनिस्टों को उनमें काम करने का मौका मिला। तो जिस प्रकार मछली को पानी में घूमने की जगह मिलती है, मौज मिलती है, उस प्रकार कम्युनिस्ट लोगों को इधर मौज मिल गई।
|
|||||
- वक्तव्य
- कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
- लखनऊ - 18 जनवरी 1948
- बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
- बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
- दिल्ली - 18 फरवरी 1948
- पटियाला - 15 जुलाई 1948
- नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
- गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
- बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
- नागपुर - 3 नवम्बर 1948
- नागपुर - 4 नवम्बर 1948
- दिल्ली - 20 जनवरी 1949
- इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
- जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
- हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
- हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
- मैसूर - 25 फरवरी 1949
- अम्बाला - 5 मार्च 1949
- जयपुर - 30 मार्च 1949
- इन्दौर - 7 मई 1949
- दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
- बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
- कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
- दिल्ली - 29 जनवरी 1950
- हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950








