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इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण भारत की एकता का निर्माणसरदार पटेल
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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण
हमें अब यह सोचना चाहिए कि हमें किस रास्ते पर चलना है। हैदराबाद रियासत में यदि हमें जल्दी से राष्ट्रीय और आर्थिक उन्नति करनी है, तो हमारा कर्तव्य हो जाता है कि हम जल्दी से-जल्दी स्वस्थ हो जाएँ। मैं यह देखने के लिए आया हूँ कि हैदराबाद की हालत क्या है। और मैं खुश हूँ कि आप लोगों ने अब ऊपर की शान्ति तो पैदा कर ली है। लेकिन मैं भीतर की हालत देखना चाहता हूँ। जब तक भीतर की शान्ति ठीक न हो, ऊपर की शान्ति कभी भी टूट जाएगी। यह टूटनी नहीं चाहिए। क्योंकि जब तक पूरी शान्ति न हो जाए, तब तक हमारी प्रगति नहीं चल सकती। तो, हमें यहाँ पूरी शान्ति पैदा करनी है। यह भी आपको देखना है कि आज तक हैदराबाद के राज्य का कारोबार एक साथ में था और इस वजह से यहां की एक कौम में ज्यादा प्रगति नहीं हुई। अब आप लोगों की ख्वाहिश है कि आपको भी उसमें हिस्सा मिले। हिन्दुस्तान में भी यही हालत थी। हम सब लोग उसी कोशिश में थे कि हिन्दुस्तान विदेशियों के हाथ में से छूट जाए। तब जैसी कुर्बानी आप लोगों ने की, हम लोगों ने भी की थी। हमें आजादी मिली, आप लोगों को भी मिली। लेकिन हम लोगों ने सत्ता अपने हाथ में ले ली है, आप लोगों को अभी सत्ता नहीं मिली।
हम लोगों ने जब सत्ता हाथ में ली, तो वहाँ बहुत बिगाड़ हुआ। हमारे न चाहते हुए भी बिगाड़ हुआ और सारी दुनिया में हमारी बदनामी हुई। उसी प्रकार इधर नहीं होना चाहिए। हमारे यहाँ बिगाड़ इसलिए हुआ कि हमें मजबूरी से मुल्क के दो हिस्से करने पड़े। वहाँ पहले ही काफी जहर भरा हुआ था, वह फूट गया। हैदराबाद में भी जहर तो भरा हुआ है, लेकिन इस जहर को हमने फूटने नहीं दिया। अगर यहाँ परदेसी हुकूमत होती, तो उसी तरह से होने वाला था। यहाँ बहुत लोगों ने कोशिश भी की थी कि वैसा ही हो। लेकिन खुदा की मेहरबानी से हम लोग बच गए। अब जब बच गए हैं, तो हमें इस प्रकार काम करना है कि ज्यादा बिगाड़ न हो। इसी में आप सबका हित है। हमारे मुल्क में नौजवान बिगड जाते हैं और गलत रास्ते पर चलते हैं। मैं चाहता हूँ कि उन्हें गलत रास्ते पर चलने का मौका न मिले। इसलिए जितना काम करना है, वह तो हमें करना ही है, लेकिन हमें किसी भी तरह हैदराबाद में लाठी से काम लेने वालों को चलने नहीं देना है। बन्दूक से और लाठी से काम लेना हो तो वह फौज का और पोलीस का काम है, दूसरे का नहीं। वह उनके पास रहनी चाहिए, क्योंकि वह समझते हैं कि कहाँ बन्दूक चलानी है, कहाँ नहीं चलानी। यह दूसरे का काम नहीं है। जिसे कलम से काम लेना है, उसको बन्दूक दे देने से वह अपनी खुदकुशी करेगा, या दूसरे को मार आएगा। तो मैं आपसे अदब से कहना चाहता हूँ कि हमारे मुल्क में, हमारे राज्य में, जब कोई नौजवान गलत रास्ते पर चलते हैं, तो उनको समझाने की कोशिश करना आपका काम है। यह खाली कांग्रेस का ही काम नहीं। यह सबका काम है। यदि कोई गलत रास्ते पर चलना चाहे, हिंसा से काम लेना चाहे, तो उसको वैसा नहीं करने देना चाहिए। उसको पुलिस के सुपुर्द कर देना चाहिए।
कई लोग मुझसे कहते हैं कि पुलिस में या और जगह पर बिना झूठ के काम नहीं चलता। मैं मानता हूं कि नहीं चलता होगा। क्योंकि जहाँ बुराइयों के लिए काफी अवकाश है, वहाँ वे होती ही होंगी। अभी तक तो समय भी बहुत कम हुआ है। अभी तक लोगों में विश्वास पैदा करने का काम नहीं हो पाया है। वह काम खाली अमलदारों से या आफीसरों से नहीं होगा। लोक नियुक्त संस्था कांग्रेस के ऊपर यह बोझ है। उसको यह काम करना है। कांग्रेस का दरवाजा हम खोल दें। उसमें ऐसे सब लोगों को हमें स्थान देना है, जो कांग्रेस का प्रोग्राम कबूल कर लें। अगर उसमें लोग इस ख्याल से आएँगे कि भीतर घुस के कुछ गड़बड़ करेंगे, तो वह कुछ नहीं कर सकेंगे। आप लोगों को घबराने की कोई जरूरत नहीं है। कांग्रेस यदि हैदराबाद की रियासत के लोगों का प्रति-निधित्व करने के लिए तैयार हो, और थोड़ा-सा दरवाजा खोलकर कुछ गिने-चुने लोगों को आने दे, तो उससे काम नहीं चलेगा। अपना दरवाजा खुला रखो, हिम्मत से काम लो और साफ काम करो तो सारी रियासत आपके पीछे चलेगी, कोई भी उसमें रुकावट नहीं डाल सकेगा।
जो चन्द बातें मैंने आपके सामने रखी हैं, उन सबके बारे में आपको सोचना है। मैंने कोई कड़ुवी बात कही हो, तो आपको यह समझना है कि वह दवा है। दवा कडुवी तो होती है, पर बहुत फायदा करने वाली होती है। मैने आपको जो दवा दी है, वह घोलकर अगर आप लोग पी जाएँगे, तो उससे आपको बहुत फायदा होगा और आपकी तबियत ठीक हो जाएगी। आपकी तबियत जल्दी ठीक हो, तो मुझे बहुत बड़ी खुशी होगी, क्योंकि हम लोग अपने सिर का बोझ आपके सिर पर डालना चाहते हैं। आप उसे उठा लीजिए। आपका बोझ हमारे ऊपर ज्यादा दिन नहीं रहना चाहिए। क्योंकि हमको दुख होता है कि कहाँ, तक हम आपका बोझ उठाएँ? तो हम आपसे ज्यादा परेशान हैं।
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- वक्तव्य
- कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
- लखनऊ - 18 जनवरी 1948
- बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
- बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
- दिल्ली - 18 फरवरी 1948
- पटियाला - 15 जुलाई 1948
- नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
- गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
- बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
- नागपुर - 3 नवम्बर 1948
- नागपुर - 4 नवम्बर 1948
- दिल्ली - 20 जनवरी 1949
- इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
- जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
- हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
- हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
- मैसूर - 25 फरवरी 1949
- अम्बाला - 5 मार्च 1949
- जयपुर - 30 मार्च 1949
- इन्दौर - 7 मई 1949
- दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
- बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
- कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
- दिल्ली - 29 जनवरी 1950
- हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950








