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इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण भारत की एकता का निर्माणसरदार पटेल
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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण
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मैसूर म्यूनिसिपैलिटी के अभिनन्दनोत्सव में
25 फरवरी, १९४९
मैसूर म्यूनिसिपैलिटी के अध्यक्ष और म्यूनिसिपैलिटी के सभ्यगण,
आप लोगों ने मुझे जो मानपत्र दिया, उसके लिए मैं आपका आभार मानता हूँ। मैं इधर कोई दस-बारह साल के बाद आया हूँ। इस बीच में दुनिया बहुत उलट-पलट हो गई है। हिन्दुस्तान में भी उलट-पलट हुई है और आपके यहाँ भी काफी उलट-पुलट हुई है। देश में कुछ अच्छी और कुछ बुरी बातें हुई हैं, लेकिन ईश्वर की कृपा से आपके यहाँ कोई बुराई नहीं हुई, और ठीक शान्ति से मैसूर राज्य की प्रगति हो रही है।
दुनिया में आज सभी जगह अशान्ति है। आज दुनिया में जो एक प्रकार की बाहर की शान्ति दिखाई पड़ती है, वह असल में शान्ति नहीं है। हर मुल्क में बहुत सी तकलीफ़ें हैं, बहुत बेचैनी है। यूरोप, एशिया जहाँ कहीं देखें, जिस प्रकार का अमन और शान्ति होनी चाहिए, वैसी नहीं है। हिन्दुस्तान में हम लोगों की इच्छा थी कि हम हिन्दुस्तान को आज़ाद कर दें, वह इच्छा एक तरह से पूरी हुई। दूसरी तरह से जो उम्मीद रखी थी, वह पूरी नहीं हुई। एक तरफ तो हमने विदेशी राज को हिन्दुस्तान से हटाया। दूसरी तरफ हमने जिस प्रकार आपस में मार पीट की, गुण्डागर्दी की और दुनिया के सामने जो प्रदर्शन किया, वह हमारी संस्कृति के खिलाफ और महात्मा गान्धी के शिक्षण बिलकुल विरुद्ध था। उससे गांधी जी को बहुत कष्ट हुआ। उनकी तपस्या से हमको आज़ादी तो मिल गई, लेकिन हमने उनका खुद का प्राण लिया। यह बहुत ही बुरा हुआ। इससे दुनिया में हमारी बदनामी हुई, बेइज्जती हुई। लेकिन उनके मरने के बाद हमने कुछ शान्ति पैदा कर ली है। एक से मुल्क में अब कोई खतरा नहीं है। छोटी-मोटी बातें होती हैं, कभी-कभी हमें अपने नवजवानों को जेल में भेजना पड़ता है और दण्ड का उपयोग करना पड़ता है, पुलिस से काम लेना पड़ता है। इससे हमें कष्ट होता है। लेकिन एक तरह से यह जो छोटी-मोटी बातें हो रही हैं, इनसे मुल्क को कोई खतरा नहीं है। इसी प्रकार मुल्क पर बाहर से आक्रमण का भी कोई खतरा नहीं है। तो भी जो पिछला महान युद्ध हुआ, उसकी जो प्रसादी दुनिया भर को मिली, वह बहुत बुरी है। उसमें से हम बचे नहीं है, और यदि हम सावधान न रहें और जिस तरह काम करना चाहिए, उस तरह न करें, तो उससे हमें बहुत बड़ा खतरा है।
आप जानते हैं कि हमारे मुल्क में जब राज्य पलटा और हमने सत्ता अपने हाथ में ली, तब, जैसा आपने मानपत्र में बयान किया है, हिन्दुस्तान में छोटी-छोटी करीब-करीब पाँच-छः सौ रियासतें थीं। उनका क्या किया जाए, यह एक बहुत बड़ा विकट प्रश्न था। लेकिन एक बड़ी बात यह हो गई कि सब राजा-महाराजाओं ने बहुत सोच-समझ कर मुल्क का साथ देने का निश्चय किया। मैं बार-बार इन लोगों को इस स्वदेशाभिमान के लिए मुबारकबाद देता आया हूँ। इस मौके पर आज भी मैं यह कहना चाहता हूँ कि राजाओं ने अगर समय को पहचान न लिया होता और देशभक्ति का प्रदर्शन न किया होता, तो उससे देश को बहुत तकलीफ होती। हमारे मुल्क के दो टुकड़े तो हुए ही थे, उससे और भी अनेक टुकड़े हो जाने का बहुत बड़ा खतरा था। और इस प्रकार टुकड़े करने की पूरी कोशिश भी जारी थी। आपने देखा होगा कि जब हमने राज्यों का संगठन करना शुरू किया, तो उससे पहले ही जूनागढ़ में गड़बड़ शुरू हो गई थी। आप को मालूम ही है कि हिन्दुस्तान में जितनी रियासतें थी उसकी आधी रियासतें तो अकेले काठियावाड़ में पड़ी हुई थीं। उन्हीं में एक जूनागढ़ स्टेट भी थी। पाकिस्तान ने उसे अपने साथ लेने की कोशिश की और उसका दस्तखत भी ले लिया।
तब से हमको एक प्रकार का नोटिस मिल गया कि हमें सावधान रहने की कितनी जरूरत है। इसके बाद का इतिहास आप जानते ही हैं। आप के पड़ोस में ही जो एक बहुत बड़ी रियासत, देश की सबसे बड़ी रियासत, है, उसने क्या किया, वह भी आप जानते हैं। उस सबका इतिहास बताने की मुझे कोई जरूरत नहीं है। लेकिन यदि उस समय पर हिन्दुस्तान की और रियासतों ने भी यही सोच लिया होता कि हमें भी हिन्दुस्तान से अलग अपना अड्डा बनाना है, तो उससे हमको बहुत नुकसान होता। हमारी उन्नति रुक जाती। बहुत दिनों से आप लोग अपना राजतन्त्र लेने की कोशिश कर रहे थे। हम और आप उसके लिए एक साथ लड़ाई कर रहे थे। और, जैसा कि आपने कहा, एक समय पर मैं आप लोगों के नेतागणों को मिलने के लिए बैंगलोर के जेल में आया भी था। उस समय में और आज के समय में बहुत फर्क आ गया है।
मैसूर के महाराजा ने समय की माँग को समझ कर अपनी सत्ता जनता के प्रतिनिधियों को दे दी, और हिन्दुस्तान में मिल जाने की स्वीकृति दे दी। यह बहुत अच्छा हुआ कि एक भी राज्य ऐसा न रहा, जो हमारे साथ मिल नहीं गया। सब आ गए, जो नहीं आए, उनका भी हिसाब पूरा हो गया। अब कोई चीज बाकी नहीं रही। हिन्दुस्तान में एक प्रकार से शान्ति स्थापित हो गई है। लेकिन हिन्दुस्तान में आज भी जो तकलीफ है, उस तकलीफ का अगर हम ख्याल न रखें, तो हमको जो स्वराज मिला, वह स्वराज गान्धी जी की इच्छा का स्वराज नहीं होगा।
हिन्दुस्तान के बदन पर हड्डी और चमड़ी के सिवा कोई चीज़ बाकी नहीं रही। तो यदि भारत को मज़बूत बनाना हो और सच्चा स्वराज हमें पैदा करना हो, तो गान्धी जी ने जो रास्ता हमें बताया था, शुरू से वही रास्ता हमें पकड़ना होगा। हमने जब हिन्दुस्तान में स्वतन्त्रता के लिए युद्ध शुरू किया, आन्दोलन शुरू किया, तब वह दो तरीकों से किया। एक तो परदेशी सल्तनत को इधर से हटाना। उसे हटाने के लिए गान्धीजी के पास एक अद्भुत शस्त्र था, असहयोग और सत्याग्रह। उन्होंने सत्य और अहिंसा द्वारा विदेशी सत्ता को इधर से हटाने के लिए तपस्या शुरू की। उसमें हम लोगों ने भी थोड़ा-बहुत उनका साथ दिया। लेकिन कोई सच्चा साथ दिया, ऐसा किसी को नहीं मानना चाहिए। यदि कोई समझे कि उसकी कुर्बानी से आजादी मिल गई है, तो वह बेवकूफी की बात होगी। एक महान व्यक्ति की तपस्या से ही परदेसी सल्तनत यहाँ से हट गई। लेकिन शुरू ही से उन्होंने कहा था कि यदि हमें सच्चा स्वराज चाहिए, जिसको वह रामराज्य भी कहते थे, तो वह राम-राज्य हमको तब मिलेगा, जब हम खुद ही इस प्रकार का राज बनाएँ। और वैसा राज्य बनाने के लिए उन्होंने एक प्रोग्राम भी रखा था। एक तो यह कि मुल्क में अनेक प्रकार के मज़हब के लोग हैं, हिन्दू, मुसलमान, पारसी, क्रिश्चियन, सिख आदि। जितने मज़हब के लोग हिन्दुस्तान में रहते हैं, उतने और किसी जगह पर नहीं होंगे। तो हम सब लोगों को मिलजुल कर रहना चाहिेए, प्रेम से रहना चाहिए। हमें आपस में लड़ना नहीं चाहिए। मज़हब को पालिटिक्स (राजनीति) से और राष्ट्रीय क्षेत्र से कोई मतलब नहीं है। अपना-अपना धर्म पालन करना प्रत्येक की व्यक्तिगत इच्छा की बात है। उसमें राज्य कोई दखल नहीं दे सकता, न और किसी को दखल देना चाहिए। लेकिन पराई हूकूमत ने इस देश में अपना राज्य सुभीते से चलाने के लिए धर्म को या मजहब को पालिटिक्स में डाल दिया। इससे कौम-कौम के बीच में अन्तर बढ़ गया और इसका नतीजा यह हुआ कि आखिर हमारे मुल्क के दो हिस्से करने पड़े। लेकिन जब गान्धी जी ने आन्दोलन शुरू किया था, तभी से कहा था कि सच्चा स्वराज तो हमको तभी मिलेगा, जब हम दोनों कौमें, बल्कि देश की सब कौमें, आपस में मिल जाएँगी और दिल-से-दिल मिला लेंगी। उनकी यह इच्छा पूरी हुई नहीं। इससे जिस प्रकार का स्वराज हम चाहते थे और वह चाहते थे, उस प्रकार का स्वराज हमें नहीं मिला।
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- वक्तव्य
- कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
- लखनऊ - 18 जनवरी 1948
- बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
- बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
- दिल्ली - 18 फरवरी 1948
- पटियाला - 15 जुलाई 1948
- नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
- गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
- बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
- नागपुर - 3 नवम्बर 1948
- नागपुर - 4 नवम्बर 1948
- दिल्ली - 20 जनवरी 1949
- इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
- जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
- हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
- हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
- मैसूर - 25 फरवरी 1949
- अम्बाला - 5 मार्च 1949
- जयपुर - 30 मार्च 1949
- इन्दौर - 7 मई 1949
- दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
- बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
- कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
- दिल्ली - 29 जनवरी 1950
- हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950








