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इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण भारत की एकता का निर्माणसरदार पटेल
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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण
दूसरा गान्धी जी ने शुरू ही से कहा था कि यदि हिन्दुस्तान को सच्चा स्वतन्त्रता चाहिए, तो हमारे मुल्क में अस्पृश्यता जैसी चीज़ बाकी नहीं रहनी चाहिए। देश भर में कोई अछूत नहीं होना चाहिए। ऊँच-नीच का भेद भाव नहीं होना चाहिए। कौम-कौम के बीच जिस प्रकार के छोटे-मोटे बाड़े बने हैं, वह नहीं रहना चाहिए। हमारे मुल्क में यह जो बहुत बड़ा ऐब है, इसको निकाल देना चाहिए। परन्तु आज भी वह चीज़ गई नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि गुलामी की जड़ हमारे इतना भीतर चली गई है कि उसके मूल उसमें से निकलते ही नहीं। तो यदि हमें सच्चा स्वराज चाहिए, तो हमें गान्धीजी की बताई हुई समाज-रचना करनी पड़ेगी। इसलिए मैं पुकार-पुकार कर सब जगह कह रहा हूँ कि आप गलत रास्ते पर चल रहे हैं। हम सबको मिलकर, जैसे हम पहले स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए काम कर रहे थे, उसे भी ज्यादा काम करने की जरूरत है। नहीं तो हमारा काम नहीं चलेगा। देश में गान्धी जी के स्वप्न का रामराज्य स्थापित नहीं होगा।
अब मैसूर राज्य आजाद है, लेकिन यदि मध्यस्थ सरकार से आप लोगों को पूरा अनाज नहीं मिलेगा, तो आपको बड़ी मुसीबत का सामना करना होगा। क्योंकि आपको जितना खाना चाहिए, उतना इधर पैदा नहीं होता। इसका नाम स्वराज नहीं है। वह तो हमें दूसरों पर अवलम्बित रहना पड़ रहा है। तो हमारे मैसूर स्टेट मैं जितनी खुराक चाहिए, उतनी यहीं पैदा होना चाहिए, जितना कपड़ा हमारे लिए चाहिए, उतना यहां ही पैदा होना चाहिए। गांधी जी ने तो बार-बार यही बात कही और मरते दम तक वह अपना चरखा कातते रहे। उनके मरने से पहले, आखिरी समय पर, मैं ही उनसे मिला था। उस वख्त भी वह चरखा चला रहे थे, और मुझ से बातचीत करते जाते थे। अब वह दृश्य मेरे सामने रोज खड़ा होता है। तो सारे हिन्दुस्तान में घूम-घूम कर उन्होंने कहा कि अपना कपड़ा खुद बनाओ। लेकिन हमने यह काम नहीं किया। आज तो दुनिया की ऐसी हालत हो गई है कि हम बनाना चाहें, तो भी मुश्किल पड़ेगा। क्योंकि अब मिलवाले भी कहते हैं कि हमारे मुल्क में जितनी रुई चाहिए, उतनी यहाँ पैदा नहीं होती। बाहर से भी उतनी रुई नहीं आती। हर मुल्क को आज यही शिकायत है। अब हमारे मुल्क का टुकड़ा हुआ। पाकिस्तान से बहुत रुई आती थी, अब वह नहीं आती। और वह जिस से ज्यादा पैसा मिल जाएगा, उसी को बेच डालेगा। तो हमें अनाज भी चाहिए और कपड़ा भी चाहिए। दोनों के लिए हमारे मुल्क को स्वतन्त्र होना चाहिए। उसके लिए जितनी कोशिश हमें करनी चाहिए, उतनी हम न करें, तो इस आज़ादी से हमें क्या लाभ होगा? इस स्वतन्त्रता को हम क्या करेंगे? जिस प्रकार हम आज चल रहे हैं, इसी तरह से आगे भी चलते रहेंगे, तो कुछ दिनों के बाद लोग कहने लगेगे कि इस से तो अंग्रेजों का राज अच्छा था। तब कम-से-कम खाना तो मिलता था।
मैं यह बात जो हर जगह पर बार-बार कह रहा हूँ, उसका मतलब यह है कि हमें बहुत सावधान रहना चाहिए। साथ ही हमें घबराने की भी जरूरत नहीं है। क्योंकि हमारे मुल्क में जगह की भी कमी नहीं है और हमारी धरती के भीतर में धन भी बहुत गड़ा है। यदि आज हम समझ जाएँ, तो जितना चाहिए उतना अनाज हम पैदा कर सकते हैं। उससे ज्यादा भी पैदा कर सकते हैं। लेकिन मैंने यह भी कहा कि हमारे मुल्क में सात फीसदी शार्टेज (कमी) है। इसे पूरा करना क्या बड़ी बात है? यदि हमारे पास सात फीसदी अनाज कम है, तो हम आसानी से उसका बन्दोवस्त कर सकते हैं। बाहर से इतना अनाज मंगवाने में जो तकलीफ उठानी पड़ती है, और जो रुपया देना पड़ता है, वह हम क्यों करें? उससे तो हमारी आर्थिक स्थिति ही बरबाद हो जाती है। आज हम एक सौ तीस (१३०) करोड़ रुपये का अनाज बाहर से मँगवाते हैं और साथ ही हमें एक सौ साठ करोड़ (१६०) रुपया अपनी फौज पर खर्च करना पड़ता है। इतना रुपया हम कहाँ से लाएँ? हमारे जो नौजवान मजदूरों में काम करते हैं, वे उन्हें कहते हैं कि ज्यादा तनख्वाह मांगो और न मिले, तो रेलवे में हड़ताल कर दो। वे कहते हैं कि आज कारखाने बन्द कराएँगे। एक तरफ खर्चा बढ़ाओ और दूसरी तरफ कारखाने बन्द कर दो। हमारे सरकारी कर्मचारी भी माँगते हैं कि हमको ज्यादा तनख्वाह दो। कम में हमारा काम नहीं चलता। उधर बेचारा स्कूल मास्टर तो रोता ही रहता हें। उसका तो कोई नाम भी नहीं लेता। वह कहता है कि झाड़ निकालनेवाले भंगी को भी हम से ज्यादा तनख्वाह मिलती है। इस तरह से सब जगह ज्यादा तनख्वाह मांगते हैं। दूसरी तरफ हमारे पास फालतू पैसा है नहीं। तो कैसे काम चलेगा?
यह किस प्रकार का स्वराज हमको मिला है, यह आपको समझ लेना है। असली हालत को अगर हम अभी से नहीं समझ लेंगे, तो स्वराज में हमें कोई मज़ा नहीं आएगा। इसलिए अभी से हमें तैयारी करनी है। क्योंकि अब शान्ति स्थापित हो गई है। अगर शान्ति न हो, तब तो कोई काम हो नहीं सकता। हमारे हिन्द में शान्ति तो हुई, लेकिन साथ-साथ हमें जितना रचनात्मक काम करना चाहिए, उतना हम नहीं कर सके, तो भी हमारा काम नहीं चलेगा। इसलिए हम सब को मिलकर हर जगह पर समझ-सोच कर काम करना है।
अनाज के लिए हमें पहला यह काम करना है कि जिन लोगों को खाना मिलता है, उन लोगों को अनाज का एक दाना भी बिगाड़ नहीं करना चाहिए। जहां तक हो सके, जितना जरूरी है, इतना ही पकाना, इतना ही खाना चाहिए। बाकी का अनाज बचाना चाहिए। बहुत लोग अपनी बेपरवाही से अनाज को बरबाद करते हैं। वे अपनी जिम्मेवारी नहीं समझते कि इस मुल्क में अनाज की कमी है। दूसरा एक काम हमें यह भी करना चाहिए कि इस मुल्क के जिस प्रान्त में, जिस जगह पर जो अनाज ज्यादा पकता है, उसे अपनी जिम्मेवारी और समझ से बचा कर दूसरे प्रान्त में, जहाँ वह अनाज कम है, देने के लिए गवर्नमेंट को दे देना चाहिए। तीसरा हमारे मुल्क में जिस किसी जगह पर, जहां हम पहुँच सके या कुछ भी खाद्य पैदा कर सकें, वहां उसे जरूर पैदा करना चाहिए। फल, साग, सब्जी, तरकारी, यहां तक कि अनाज भी हम अपने कम्पाउण्ड (चारदीवारी) में पैदा कर सकते हैं, अपने स्टेट में पैदा कर सकते हैं। जहाँ भी कोई (खाली जगह पड़ी हो, वहाँ हमें ये चीजें जरूर पैदा करनी चाहिए। तभी हमारा काम चल सकता है।
हमारे मुल्क में अनाज पैदा करने के लिए और इर्रिगेशन (सिंचाई) के लिए बहुत-सी बड़ी-बड़ी स्कीमें हैं। वह तो जब होंगी, तब होंगी। लेकिन पाँच-सात साल में वे पूरी न हुई तो इस पांच-सात साल के बीच यह जो गढ़ा पड़ जाएगा, उसे हम किसी भी दिन भर नहीं सकेगे। इसलिए हमें यह सब करना है। गान्धी जी ने जो कहा था कि इस रास्ते पर चलते-चलते हम आपस में झगड़ा कम करें, तो उससे पुलिस का और आर्मी (फौज) का खर्च भी कम होगा। साथ ही अगर हम गरीबों और अछूतों से सहानुभूति बता कर उनका साथ दें, और उनके साथ कपड़ा बुनने का काम भी कर सकें, तो उससे देश का कल्याण ही होगा। इस प्रकार के रचनात्मक काम में न लगकर अगर हम सब लोग सिर्फ गवर्नमेंट से ही उम्मीद करेंगे और गवर्नमेंट की शिकायत करते रहेंगे कि उसने यह नहीं किया, वह नहीं किया, तो उससे काम नहीं चलेगा।
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- वक्तव्य
- कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
- लखनऊ - 18 जनवरी 1948
- बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
- बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
- दिल्ली - 18 फरवरी 1948
- पटियाला - 15 जुलाई 1948
- नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
- गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
- बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
- नागपुर - 3 नवम्बर 1948
- नागपुर - 4 नवम्बर 1948
- दिल्ली - 20 जनवरी 1949
- इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
- जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
- हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
- हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
- मैसूर - 25 फरवरी 1949
- अम्बाला - 5 मार्च 1949
- जयपुर - 30 मार्च 1949
- इन्दौर - 7 मई 1949
- दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
- बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
- कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
- दिल्ली - 29 जनवरी 1950
- हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950








